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कोचों के अभाव में हुनर बेदम
Hardoi
Updated Tue, 16 Sep 2014 05:31 AM IST
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हरदोई। कोई और जिला भले ही सचिन तेंदुलकर या फिर महेश भूपति जैसी खेल प्रतिभाआें का विकल्प तैयार करने में कामयाब हो जाएं, पर खेल प्रतिभाओं के धनी इस जिले के जिम्मेदारों की यह बस की बात नहीं। जिले में करोड़ों व अरबों के संसाधन मौजूद हैं, खेल प्रतिभाएं भी अपने सीखने को लालायित हैं, पर जिले के पास इनमें निखार लाने को द्रोणाचार्य सरीखे कोच ही नहीं है। क्रिकेट व टेनिस जैसे खेलों में नाम कमाने वाली प्रतिभाओं को बाहरी जिलों की खाक छाननी पड़ रही है।
शहर का अरविंद क्रिकेट का शौकीन है। बचपन से ही वह इस खेल में कुछ करना चाहता है। कुछ सीखने की आस लेकर वह स्टेडियम तो गया, पर वहां पर कोई सिखाने वाला तो दूर उसे बताना वाला भी नहीं मिला। पूछताछ करने पर पता चला कि कुछ क्रिकेट को लेकर सीखना है, तो लखनऊ जाओ यहां कुछ नहीं है। अरविंद ही नहीं कई ऐसे होनहार हैं, जो अपनी प्रतिभाओं को या तो कोचों के अभाव में जिले में ही दफन कर दे रहे या फिर बाहरी जिलों मेें जाकर निखार लाने का प्रयास कर रहे हैं। दुख की बात यह है कि जिले के स्पोर्ट्स स्टेडियम में कई खेलों को लेकर संसाधन तो मौजूद हैं, पर प्रतिभाओं को सिखाने को कोई भी कोच मौजूद नहीं है। बताया गया कि स्पोर्ट्स स्टेडियम में जूडो, वालीबाल व वेटलिफ्टिंग के ही कोच मौजूद है।
ये कोच खिलाड़ियों को बुलाकर उनको प्रशिक्षित कर स्पोर्ट्स स्टेडियम को आबाद रखने का प्रयास कर रहे हैं। शेष खेलों जैसे फुटबाल, टेनिस, क्रिकेट आदि को लेकर कोचों का टोटा है। खास बात यह है कि इन खेलों को लेकर सीखने का जज्बा लेकर यहां पहुंचने वालों की संख्या ज्यादा है, पर इसके बाद भी उनको यहां से निराश होकर ही लौटना पड़ रहा है। यदि यह कहा जाए कि भले ही खेल प्रतिभाओं में निखार लाने को करोड़ों व अरबाें रुपये लगा दिए जाएं, पर कोचों के अभाव में सचिन व महेश भूपति जैसी प्रतिभाओं के विकल्पों को तैयार नहीं किया जा सकता। उधर, जिले में डीएम के पद पर रहे स्पोर्ट्स स्टेडियम के लिए बहुत कुछ करने वाले भुवनेश कुमार मौजूदा समय में सचिव खेलकूद का दायित्व संभाल रहे हैं।
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निश्चित रूप से उनकी निगाहों में कहीं न कहीं जिले का स्पोर्ट्स स्टेडियम व यहां की गतिविधियां रहती होगी। इसके अलावा अब तो खिलाड़ी भी स्वयं कहने लगे कि अब उन तक यहां की स्थितियों को लेकर बात पहुंचाए ताकि जिले के स्पोर्ट्स स्टेडियम को कम से कम कोच ही मिल सके। खिलाड़ियों का कहना है कि उनके द्वारा फैक्स से कोचों की कमी के बारे में सचिव को अवगत भी कराया गया है।
इंसेट---
सिर्फ यह कोच जिले में हैं मौजूद---
जूडो-अनिमेष सक्सेना, वालीबाल-अब्दुल हफीज, वेटलिफ्टिंग-पूनम तिवारी
इंसेट---
विदेशों तक धमक, पर बुनियादी जरूरतों का टोटा
हरदोई। खिलाड़ियों व खेल प्रेमियों का कहना है कि जिन खेलों के जिले में कोच हैं, उनके खिलाड़ियों ने अपने हुनर की बदौलत विदेशों तक में अपने हुनर के झंडे लगा दिए हैं। यहां तक कि जिले का मान विदेशों में चमकाया है, पर शायद ही लोग जानते हैं जिले के स्टेडियम में बुनियादी जरूरताें का ही टोटा है। जब कोच ही नहीं होंगे, तो हुनर किस तरह से अपनी प्रतिभा को तराश पाएंगे। खेल प्रेमियों का कहना है कि यदि क्रिकेट व हाकी के कोच जिले में आ जाएं, तो शायद इन खेलों से भी देश को कोई होनहार मिल जाएं।
इंसेट---
‘ऐसा नहीं है कि वह इस संबंध में प्रयास नहीं कर रहे। जितना हाथ पैर मार सकते हैं वह मार रहे हैं। लगातार निदेशालय से वह कोचों को लेकर मांग कर रहे हैं।’ अनिमेष सक्सेना, जिला क्रीड़ाधिकारी
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शहर का अरविंद क्रिकेट का शौकीन है। बचपन से ही वह इस खेल में कुछ करना चाहता है। कुछ सीखने की आस लेकर वह स्टेडियम तो गया, पर वहां पर कोई सिखाने वाला तो दूर उसे बताना वाला भी नहीं मिला। पूछताछ करने पर पता चला कि कुछ क्रिकेट को लेकर सीखना है, तो लखनऊ जाओ यहां कुछ नहीं है। अरविंद ही नहीं कई ऐसे होनहार हैं, जो अपनी प्रतिभाओं को या तो कोचों के अभाव में जिले में ही दफन कर दे रहे या फिर बाहरी जिलों मेें जाकर निखार लाने का प्रयास कर रहे हैं। दुख की बात यह है कि जिले के स्पोर्ट्स स्टेडियम में कई खेलों को लेकर संसाधन तो मौजूद हैं, पर प्रतिभाओं को सिखाने को कोई भी कोच मौजूद नहीं है। बताया गया कि स्पोर्ट्स स्टेडियम में जूडो, वालीबाल व वेटलिफ्टिंग के ही कोच मौजूद है।
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ये कोच खिलाड़ियों को बुलाकर उनको प्रशिक्षित कर स्पोर्ट्स स्टेडियम को आबाद रखने का प्रयास कर रहे हैं। शेष खेलों जैसे फुटबाल, टेनिस, क्रिकेट आदि को लेकर कोचों का टोटा है। खास बात यह है कि इन खेलों को लेकर सीखने का जज्बा लेकर यहां पहुंचने वालों की संख्या ज्यादा है, पर इसके बाद भी उनको यहां से निराश होकर ही लौटना पड़ रहा है। यदि यह कहा जाए कि भले ही खेल प्रतिभाओं में निखार लाने को करोड़ों व अरबाें रुपये लगा दिए जाएं, पर कोचों के अभाव में सचिन व महेश भूपति जैसी प्रतिभाओं के विकल्पों को तैयार नहीं किया जा सकता। उधर, जिले में डीएम के पद पर रहे स्पोर्ट्स स्टेडियम के लिए बहुत कुछ करने वाले भुवनेश कुमार मौजूदा समय में सचिव खेलकूद का दायित्व संभाल रहे हैं।
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निश्चित रूप से उनकी निगाहों में कहीं न कहीं जिले का स्पोर्ट्स स्टेडियम व यहां की गतिविधियां रहती होगी। इसके अलावा अब तो खिलाड़ी भी स्वयं कहने लगे कि अब उन तक यहां की स्थितियों को लेकर बात पहुंचाए ताकि जिले के स्पोर्ट्स स्टेडियम को कम से कम कोच ही मिल सके। खिलाड़ियों का कहना है कि उनके द्वारा फैक्स से कोचों की कमी के बारे में सचिव को अवगत भी कराया गया है।
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सिर्फ यह कोच जिले में हैं मौजूद---
जूडो-अनिमेष सक्सेना, वालीबाल-अब्दुल हफीज, वेटलिफ्टिंग-पूनम तिवारी
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विदेशों तक धमक, पर बुनियादी जरूरतों का टोटा
हरदोई। खिलाड़ियों व खेल प्रेमियों का कहना है कि जिन खेलों के जिले में कोच हैं, उनके खिलाड़ियों ने अपने हुनर की बदौलत विदेशों तक में अपने हुनर के झंडे लगा दिए हैं। यहां तक कि जिले का मान विदेशों में चमकाया है, पर शायद ही लोग जानते हैं जिले के स्टेडियम में बुनियादी जरूरताें का ही टोटा है। जब कोच ही नहीं होंगे, तो हुनर किस तरह से अपनी प्रतिभा को तराश पाएंगे। खेल प्रेमियों का कहना है कि यदि क्रिकेट व हाकी के कोच जिले में आ जाएं, तो शायद इन खेलों से भी देश को कोई होनहार मिल जाएं।
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‘ऐसा नहीं है कि वह इस संबंध में प्रयास नहीं कर रहे। जितना हाथ पैर मार सकते हैं वह मार रहे हैं। लगातार निदेशालय से वह कोचों को लेकर मांग कर रहे हैं।’ अनिमेष सक्सेना, जिला क्रीड़ाधिकारी