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मदर्स डे नहीं अब तो वाइफ-डे मनाते हैं बेटे!
Hapur
Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
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कहते हैं कि पूत कपूत सुने हैं पर न माता सुनी कुमाता। ममता कहीं भी रहे उसके भाव नहीं बदलते। ममता औलाद की खुशियों के लिए बराबर दुआ करती है। एक मां ही है जो परिवार की खुशियों के लिए घर में चिराग की तरह जलती है, लेकिन जब वृद्धावस्था में बच्चे मां का साथ छोड़ दें, मां पे क्या गुजरती है, शायद ही नये दौर की ये पीढ़ी समझ सके। पवित्र एहसास देखिए, बच्चों ने तो मां को वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ दिया, लेकिन ममता अभी भी बच्चों के लिए दुआ कर रही है और अपने जिस्म के टुकड़ों की राह देख रही है। शायद यही कह रही है कि आने की आस नहीं है, मेरा बेटा मेरे पास नहीं है...
d मुलित त्यागी
गढ़मुक्तेश्वर। रविवार को पूरे विश्व में भले ही नई युवा पीढ़ी ने धूमधाम से मदर्स-डे मनाया, लेकिन हकीकत अभी और भी है। कुछ ऐसी माताएं भी हैं, जिन्होंने जिन बच्चों को उंगली पकड़ कर दुनिया के अच्छे बुरे रास्तों पर चलने की सीख दी, उन्हीं बच्चों ने वृद्धावस्था में मां के बुढ़ापे की डंगोरी बनने की जगह उसे वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ दिया। कुछ ऐसी माताएं उम्र के इस पड़ाव में अपने बच्चों की राह देख रही हैं। मदर्स-डे पर अमर उजाला टीम ने लीक से हटकर उनके दर्द से पर्दा उठाने की कोशिश की। इनकी मानें तो बेटे अब मदर्स-डे नहीं वाइफ-डे ही मनाते हैं।
दोपहर करीब एक बजे ब्रजघाट स्थित श्री श्रीराम महाराजा अग्रसेन वृद्धाश्रम में वृद्ध बैठे हुए हैं, जबकि कुछ वृद्ध महिलाएं आपस में बातें कर रही थीं। उनको मालूम नहीं कि मदर्स-डे है हालांकि कुछ पढ़ी लिखी माताएं इस दिन के महत्व के बारे में जानती हैं। गाजियाबाद की प्रेमलता ने कहा कि अगर कुछ कहा तो अखबार पढ़कर बेटे नाराज होंगे। कहती हैं कि दो बेटे हैं जो व्यापारी हैं, लेकिन वे कभी आते नहीं हैं। एक वर्ष हो गया कोई बेटा उनके पास नहीं आया है। उन्होंने कहा कि काहे का मदर्स-डे बेटे बहु के कहे में चलते हैं, कोई सुनने वाला नहीं।
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बिजनौर की शीतला का अपना ही दर्द है। उसने बताया कि 6 वर्ष से यहां रहती हूं, कभी-कभी आ जाते हैं बेटे, क्योंकि तीनों बेटे कारोबारी हैं। मदर्स-डे का उनको कोई ध्यान नहीं है क्योंकि औलाद तो उनके लिए सपना बनकर रह गई है। उनकी अपनी खुशियां हैं, वह उनकी खुशी में भी रोड़ा नहीं बनना चाहतीं। आगरा की विमला देवी ने बताया कि तीन वर्ष से यहां रहती हैं, बेटा एक बड़ा अधिकारी है, लेकिन किसी को उसकी परवाह नहीं है। बल्लभगढ़ निवासी हेमलता के दो बेटे हैं जिसकी शादी करने के बाद वह वृद्धाश्रम चली आई हैं। बेटे ट्रांसपोर्टर है, लेकिन 6 वर्ष से यही रह रही है।
इस वृद्धाश्रम में न जाने और ऐसे कितने ही चेहरे हैं जिनके माथे पर पड़ी लकीरें अपनी कहानी कहती हैं। औलाद की राह देख रही ये माताएं अब भी एक ही बात कह रही हैं कि हम चाहे किसी भी हाल में रह रही हैं, बच्चे खुश रहें, सुखी रहें, उनपर कोई आंच न आए। अपना हाल बताती हुईं कुछ माताएं तो ये भी कह रही थीं कि बच्चे अखबार में पढ़ेंगे तो उनसे नाराज होंगे।
(पारिवारिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए जिन माताओं से बात की गई है, उनके नाम बदल दिए गए हैं)
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d मुलित त्यागी
गढ़मुक्तेश्वर। रविवार को पूरे विश्व में भले ही नई युवा पीढ़ी ने धूमधाम से मदर्स-डे मनाया, लेकिन हकीकत अभी और भी है। कुछ ऐसी माताएं भी हैं, जिन्होंने जिन बच्चों को उंगली पकड़ कर दुनिया के अच्छे बुरे रास्तों पर चलने की सीख दी, उन्हीं बच्चों ने वृद्धावस्था में मां के बुढ़ापे की डंगोरी बनने की जगह उसे वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ दिया। कुछ ऐसी माताएं उम्र के इस पड़ाव में अपने बच्चों की राह देख रही हैं। मदर्स-डे पर अमर उजाला टीम ने लीक से हटकर उनके दर्द से पर्दा उठाने की कोशिश की। इनकी मानें तो बेटे अब मदर्स-डे नहीं वाइफ-डे ही मनाते हैं।
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दोपहर करीब एक बजे ब्रजघाट स्थित श्री श्रीराम महाराजा अग्रसेन वृद्धाश्रम में वृद्ध बैठे हुए हैं, जबकि कुछ वृद्ध महिलाएं आपस में बातें कर रही थीं। उनको मालूम नहीं कि मदर्स-डे है हालांकि कुछ पढ़ी लिखी माताएं इस दिन के महत्व के बारे में जानती हैं। गाजियाबाद की प्रेमलता ने कहा कि अगर कुछ कहा तो अखबार पढ़कर बेटे नाराज होंगे। कहती हैं कि दो बेटे हैं जो व्यापारी हैं, लेकिन वे कभी आते नहीं हैं। एक वर्ष हो गया कोई बेटा उनके पास नहीं आया है। उन्होंने कहा कि काहे का मदर्स-डे बेटे बहु के कहे में चलते हैं, कोई सुनने वाला नहीं।
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बिजनौर की शीतला का अपना ही दर्द है। उसने बताया कि 6 वर्ष से यहां रहती हूं, कभी-कभी आ जाते हैं बेटे, क्योंकि तीनों बेटे कारोबारी हैं। मदर्स-डे का उनको कोई ध्यान नहीं है क्योंकि औलाद तो उनके लिए सपना बनकर रह गई है। उनकी अपनी खुशियां हैं, वह उनकी खुशी में भी रोड़ा नहीं बनना चाहतीं। आगरा की विमला देवी ने बताया कि तीन वर्ष से यहां रहती हैं, बेटा एक बड़ा अधिकारी है, लेकिन किसी को उसकी परवाह नहीं है। बल्लभगढ़ निवासी हेमलता के दो बेटे हैं जिसकी शादी करने के बाद वह वृद्धाश्रम चली आई हैं। बेटे ट्रांसपोर्टर है, लेकिन 6 वर्ष से यही रह रही है।
इस वृद्धाश्रम में न जाने और ऐसे कितने ही चेहरे हैं जिनके माथे पर पड़ी लकीरें अपनी कहानी कहती हैं। औलाद की राह देख रही ये माताएं अब भी एक ही बात कह रही हैं कि हम चाहे किसी भी हाल में रह रही हैं, बच्चे खुश रहें, सुखी रहें, उनपर कोई आंच न आए। अपना हाल बताती हुईं कुछ माताएं तो ये भी कह रही थीं कि बच्चे अखबार में पढ़ेंगे तो उनसे नाराज होंगे।
(पारिवारिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए जिन माताओं से बात की गई है, उनके नाम बदल दिए गए हैं)