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‘ ताते कुछ गुण दोस बखाने, संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने’
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चंपा देवी पार्क में राम कथा कहने के दौरान विभिन्न मुद्राओं में मोरारी बापू।
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‘ ताते कुछ गुण दोस बखाने, संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने’
गोरखपुर। चंपा देवी पार्क में चल रही मोरारी बापू की रामकथा के तीसरे दिन हरि नाम के जयकारे से पंडाल गूंज उठे। कथा के केंद्र में राम जीवन दर्शन, आज का युवा, मातृशक्ति, गुरु-शिष्य परंपरा, गुरु कृपा, याज्ञवल्यक एवं महर्षि भारद्वाज संवाद जैसे प्रकरण रहें। उन्होंने आज सर्वधर्म सद्भाव और विश्व कल्याण की कामना के साथ युवा शक्ति का आह्वान किया।
कहा, मेरा युवाओं को निमंत्रण है कि कथा में जब भी आओ बिल्कुल प्रखर एवं चैतन्य हो कर आओ। ये अत्यंत अनमोल घड़ी है कही ये यूं ही बीत न जाए। गोस्वामी जी ने मानस में कहा है ‘ताते कुछ गुण दोस बखाने, संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने’।
अर्थात संत-असंत मनुष्यों की सभी जातियों, देशों, संप्रदायों तथा सभी सामाजिक, धार्मिक वर्णों, आश्रमों में शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार के तत्व पाए जाते हैं। सज्जनों को पहचान कर उनका सहयोग करें और दुर्जनों से सावधान रहें। जिस परम शक्ति ने हमें सब कुछ दिया हम थोड़ी सी ज्यादा प्रसिद्धि, लोभ-लालच के चक्कर में प्रभु श्रीराम को भी भूला देते हैं।
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बापू ने कहा कि हमारे जीवन से सब कुछ चला जाए पर योगी न जाए, इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए। सुंदर कांड हृदय है, लंका कांड मस्तक और उत्तर कांड मां जानकी की दी हुई प्रज्ञा है। घट से मानस न जाए क्योंकि ये धड़कता हुआ हृदय है। अगर हृदय का धड़कना बंद हुआ तो मानवता का अंत हो जाता है।
बापू ने कहा मानस में कुछ भी अशुद्ध है ही नहीं, सब कुछ शुभ ही शुभ है। यदि मानस में राक्षस का वर्णन मिले तो वह भी शुद्ध है। अशुभ और राक्षस में हम राम-सीता तब देख सकते हैं। श्रीमदभागवद में श्रीकृष्ण कहते हैं कि तपस्वियों से अधिक मूल्यवान योगी है। ज्ञानियों से अधिक मूल्यवान योगी है। इसलिए हे अर्जुन तू योगी बन।
बापू ने कहा जिस प्रकार एक वातानुकूलित कमरे में बैठने मात्र से ही शीतलता का अनुभव होता है। वैसे ही किसी सिद्ध संत महात्मा के सत्संग में जाने मात्र से ही दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। जीवन का समस्त अंधकार मिट जाता है। यहां सत्संग से आशय सिद्ध पुरुष के सानिध्य धारण करने से है। सत्संग का अर्थ केवल कथा, भजन, कीर्तन नहीं है बल्कि बुद्ध एवं सिद्ध पुरुष के समीप बैठकर चिंतन करने से है।
रामकथा में मोहम्मद के प्रसंग को जोड़ा
बापू ने कहा कि नाथ संप्रदाय ने मोहम्मद की भी चर्चा की है। गोरक्षनाथ ने स्वयं कहा है। मोहम्मद के हाथ में जो छड़ी है, वो छड़ी नहीं प्रेम का तार है। इससे वो तेरे हृदय (सबके हृदय) में संगीत को बिठा देंगे। उनकी कथा मंडली में एक इस्लाम को मानने वाले व्यक्ति भी हैं। जो वर्षों से लगातार रामकथा मेें भागीदार बन रहे हैं । मैं प्रतिक्षण प्रभु श्रीराम की भक्ति एवं आध्यात्मिक चेतना में डूबा हुआ हूं।
बापू के एटीएम ने गुदगुदाया
बापू ने कहा मेरा एटीएम अर्थात अमृत, त्रिभुवन, मुरारी बापू सदैव मेरे साथ रहता है। इससे कि मैं जरूरतमंदो, दीन-दुखियों की सहायता करता हूं। बापू ने पितृपक्ष पर चर्चा करते हुए कहा कि नारद भक्ति स्त्रोत में वर्णित है। पितरों को कुछ अर्पण करना है तो उनके लिए मानस गायन राम कथा का अर्पण करो।
बापू ने कहा कि रामदर्शन मात्र से ही शांति मिलती है, परंतु साधना शुद्ध होनी चाहिए। शूपर्णखा भी राम के पास गई, परंतु उन्हें विनाश मिला क्योंकि उसकी साधना शुद्ध नहीं थी। महात्मा गांधी ने भी साधना की शुद्धता पर जोर दिया है। महात्मा गांधी ने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहा है कि ‘हे प्रभु तुम मुझे मिलो न मिलो’ परंतु एक साधु जो तुम्हें मानता हो उसकी संगति और सत्संग मुझे जरूर दे देना।
गुरु कृपा के अभाव में 12 सालों तक रहा अकाल
बापू ने गोरक्षनाथ की एक कथा के माध्यम से गुरु कृपा के अभाव में पड़ने वाले अकाल को समझाया। एक बार गुरु गोरक्षनाथ नेपाल नरेश के यहां पधारे। वहां किसी बात पर क्रोधित होकर वे समाधि पर बैठ गए। इससे संसार में गुरु कृपा का अकाल पड़ गया।
नेपाल नरेश चिंतित हो उठे और अपने पुरोहित से इसका समाधान पूछा। पुरोहित ने कहा कि यदि इनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ यहां आ जाएं तभी इनकी समाधि समाप्त हो सकती है। जब गुरु मत्स्येन्द्रनाथ वहां पहुंचे तभी गोरक्षनाथ अपनी 12 वर्षों से चल रही समाधि को समाप्त कर उठ खड़े हुए। उन्हें महिमा का भान था। इस प्रकार समस्त संसार पर दोबारा कृपा दृष्टि बरसने लगी और गुरु कृपा रूपी अकाल समाप्त हो गया।
सिर कलम करने के आदेश के बाद भी मुस्कुराता रहा युवक
एक बार यूनानी बादशाह बीमार हुआ। बड़े-बड़े वैद्य-हकीम भी उनका इलाज नहीं कर सके तो एक सिद्ध वैद्य ने बताया कि सदोगुण, स्वस्थ्य एवं सुशील जैसे निश्चित गुणों वाले एक युवा का कलेजा काट कर राजा को खिलाए तो वह स्वस्थ हो जाएंगे। 6 माह के परिश्रम के बाद एक ऐसा युवा मिला जिसके पिता ने निर्धनता से तंग आकर अपने बेटे को बेच दिया। धर्म गुरुओं ने राजा का जीवन बचाने के लिए उसकी मृत्यु का फतवा जारी कर दिया।
राजा ने भी उसकी हत्या का आदेश दे दिया। इस क्षण का तमाशा देखने के लिए दुनिया भर से लोग उपस्थित हो गए। जल्लाद को आदेश हुआ कि युवक का सिर धड़ से अलग कर दे। परंतु वह युवक वहा खड़ा हंसता रहा। जब राजा ने उसके हंसने का कारण पूछा तो उसने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, मैंने सबको देख लिया। मेरे परिवार ने धन के लोभ में मुझे बेच दिया।
राजगुरुओं ने राजा के लाभ में यह आदेश जारी कर दिया की ऐसी हत्या पाप नहीं, जिससे राजा और प्रजा को लाभ हो। आप ने भी अपने रोग-विकार से बचने के लोभ में मेरी हत्या का आदेश दे दिया। अब मुझे देखना है कि मेरा प्रभु क्या करता है। तभी जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गई। राजा उस युवा के चरण में गिर पड़ा और क्षमा प्रार्थना करने लगा।
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गोरखपुर। चंपा देवी पार्क में चल रही मोरारी बापू की रामकथा के तीसरे दिन हरि नाम के जयकारे से पंडाल गूंज उठे। कथा के केंद्र में राम जीवन दर्शन, आज का युवा, मातृशक्ति, गुरु-शिष्य परंपरा, गुरु कृपा, याज्ञवल्यक एवं महर्षि भारद्वाज संवाद जैसे प्रकरण रहें। उन्होंने आज सर्वधर्म सद्भाव और विश्व कल्याण की कामना के साथ युवा शक्ति का आह्वान किया।
कहा, मेरा युवाओं को निमंत्रण है कि कथा में जब भी आओ बिल्कुल प्रखर एवं चैतन्य हो कर आओ। ये अत्यंत अनमोल घड़ी है कही ये यूं ही बीत न जाए। गोस्वामी जी ने मानस में कहा है ‘ताते कुछ गुण दोस बखाने, संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने’।
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अर्थात संत-असंत मनुष्यों की सभी जातियों, देशों, संप्रदायों तथा सभी सामाजिक, धार्मिक वर्णों, आश्रमों में शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार के तत्व पाए जाते हैं। सज्जनों को पहचान कर उनका सहयोग करें और दुर्जनों से सावधान रहें। जिस परम शक्ति ने हमें सब कुछ दिया हम थोड़ी सी ज्यादा प्रसिद्धि, लोभ-लालच के चक्कर में प्रभु श्रीराम को भी भूला देते हैं।
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बापू ने कहा कि हमारे जीवन से सब कुछ चला जाए पर योगी न जाए, इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए। सुंदर कांड हृदय है, लंका कांड मस्तक और उत्तर कांड मां जानकी की दी हुई प्रज्ञा है। घट से मानस न जाए क्योंकि ये धड़कता हुआ हृदय है। अगर हृदय का धड़कना बंद हुआ तो मानवता का अंत हो जाता है।
बापू ने कहा मानस में कुछ भी अशुद्ध है ही नहीं, सब कुछ शुभ ही शुभ है। यदि मानस में राक्षस का वर्णन मिले तो वह भी शुद्ध है। अशुभ और राक्षस में हम राम-सीता तब देख सकते हैं। श्रीमदभागवद में श्रीकृष्ण कहते हैं कि तपस्वियों से अधिक मूल्यवान योगी है। ज्ञानियों से अधिक मूल्यवान योगी है। इसलिए हे अर्जुन तू योगी बन।
बापू ने कहा जिस प्रकार एक वातानुकूलित कमरे में बैठने मात्र से ही शीतलता का अनुभव होता है। वैसे ही किसी सिद्ध संत महात्मा के सत्संग में जाने मात्र से ही दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। जीवन का समस्त अंधकार मिट जाता है। यहां सत्संग से आशय सिद्ध पुरुष के सानिध्य धारण करने से है। सत्संग का अर्थ केवल कथा, भजन, कीर्तन नहीं है बल्कि बुद्ध एवं सिद्ध पुरुष के समीप बैठकर चिंतन करने से है।
रामकथा में मोहम्मद के प्रसंग को जोड़ा
बापू ने कहा कि नाथ संप्रदाय ने मोहम्मद की भी चर्चा की है। गोरक्षनाथ ने स्वयं कहा है। मोहम्मद के हाथ में जो छड़ी है, वो छड़ी नहीं प्रेम का तार है। इससे वो तेरे हृदय (सबके हृदय) में संगीत को बिठा देंगे। उनकी कथा मंडली में एक इस्लाम को मानने वाले व्यक्ति भी हैं। जो वर्षों से लगातार रामकथा मेें भागीदार बन रहे हैं । मैं प्रतिक्षण प्रभु श्रीराम की भक्ति एवं आध्यात्मिक चेतना में डूबा हुआ हूं।
बापू के एटीएम ने गुदगुदाया
बापू ने कहा मेरा एटीएम अर्थात अमृत, त्रिभुवन, मुरारी बापू सदैव मेरे साथ रहता है। इससे कि मैं जरूरतमंदो, दीन-दुखियों की सहायता करता हूं। बापू ने पितृपक्ष पर चर्चा करते हुए कहा कि नारद भक्ति स्त्रोत में वर्णित है। पितरों को कुछ अर्पण करना है तो उनके लिए मानस गायन राम कथा का अर्पण करो।
बापू ने कहा कि रामदर्शन मात्र से ही शांति मिलती है, परंतु साधना शुद्ध होनी चाहिए। शूपर्णखा भी राम के पास गई, परंतु उन्हें विनाश मिला क्योंकि उसकी साधना शुद्ध नहीं थी। महात्मा गांधी ने भी साधना की शुद्धता पर जोर दिया है। महात्मा गांधी ने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहा है कि ‘हे प्रभु तुम मुझे मिलो न मिलो’ परंतु एक साधु जो तुम्हें मानता हो उसकी संगति और सत्संग मुझे जरूर दे देना।
गुरु कृपा के अभाव में 12 सालों तक रहा अकाल
बापू ने गोरक्षनाथ की एक कथा के माध्यम से गुरु कृपा के अभाव में पड़ने वाले अकाल को समझाया। एक बार गुरु गोरक्षनाथ नेपाल नरेश के यहां पधारे। वहां किसी बात पर क्रोधित होकर वे समाधि पर बैठ गए। इससे संसार में गुरु कृपा का अकाल पड़ गया।
नेपाल नरेश चिंतित हो उठे और अपने पुरोहित से इसका समाधान पूछा। पुरोहित ने कहा कि यदि इनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ यहां आ जाएं तभी इनकी समाधि समाप्त हो सकती है। जब गुरु मत्स्येन्द्रनाथ वहां पहुंचे तभी गोरक्षनाथ अपनी 12 वर्षों से चल रही समाधि को समाप्त कर उठ खड़े हुए। उन्हें महिमा का भान था। इस प्रकार समस्त संसार पर दोबारा कृपा दृष्टि बरसने लगी और गुरु कृपा रूपी अकाल समाप्त हो गया।
सिर कलम करने के आदेश के बाद भी मुस्कुराता रहा युवक
एक बार यूनानी बादशाह बीमार हुआ। बड़े-बड़े वैद्य-हकीम भी उनका इलाज नहीं कर सके तो एक सिद्ध वैद्य ने बताया कि सदोगुण, स्वस्थ्य एवं सुशील जैसे निश्चित गुणों वाले एक युवा का कलेजा काट कर राजा को खिलाए तो वह स्वस्थ हो जाएंगे। 6 माह के परिश्रम के बाद एक ऐसा युवा मिला जिसके पिता ने निर्धनता से तंग आकर अपने बेटे को बेच दिया। धर्म गुरुओं ने राजा का जीवन बचाने के लिए उसकी मृत्यु का फतवा जारी कर दिया।
राजा ने भी उसकी हत्या का आदेश दे दिया। इस क्षण का तमाशा देखने के लिए दुनिया भर से लोग उपस्थित हो गए। जल्लाद को आदेश हुआ कि युवक का सिर धड़ से अलग कर दे। परंतु वह युवक वहा खड़ा हंसता रहा। जब राजा ने उसके हंसने का कारण पूछा तो उसने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, मैंने सबको देख लिया। मेरे परिवार ने धन के लोभ में मुझे बेच दिया।
राजगुरुओं ने राजा के लाभ में यह आदेश जारी कर दिया की ऐसी हत्या पाप नहीं, जिससे राजा और प्रजा को लाभ हो। आप ने भी अपने रोग-विकार से बचने के लोभ में मेरी हत्या का आदेश दे दिया। अब मुझे देखना है कि मेरा प्रभु क्या करता है। तभी जल्लाद के हाथ से तलवार गिर गई। राजा उस युवा के चरण में गिर पड़ा और क्षमा प्रार्थना करने लगा।