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‘लाल’ बना रहे खाकी को दागदार

Mon, 09 Oct 2017 01:03 AM IST
Updated Mon, 09 Oct 2017 01:03 AM IST
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‘लाल’ बना रहे खाकी को दागदार

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शिवम सिंह
गोरखपुर।
अपराध पर लगाम कसने की जिम्मेदारी उठाने वाले पुलिस अफसर, कर्मचारियों के ‘लाल’ ही उनकी वर्दी को दागदार बना रहे हैं। सितंबर से अब तक गोरखपुर में इस तरह के चार मामले सामने आ चुके हैं। बड़ा अपराध करने वाले वर्दीधारी के बच्चों को गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया है। जेल प्रशासन की मानें तो पहले भी कई वर्दीधारी के बच्चे जेल लाए गए हैं। कुछ मामलों में चार्जशीट भी दाखिल की गई। ट्रायल चल रहा है। मनोविज्ञानी और समाजशास्त्री इस चलन को खतरनाक बताते हैं। वे कहते हैं कि लूट जैसे अपराध में दरोगा के बेटे का शामिल होना व्यवस्था को चुनौती है। ये लोग कानून को नजदीक से जानते और समझते हैं। इसका बड़ा दुरुपयोग संभव है।

केस एक
पादरीबाजार के पास बुजुर्ग महिला से सितंबर में एक लाख रुपये लूटे गए। पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज किया। इस बीच पुलिस ने आसपास की सीसीटीवी फुटेज खंगाली और प्रवीन त्रिपाठी को आरोपी बनाया। प्रवीन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। छानबीन आगे बढ़ी तो पता चला कि प्रवीन के पिता दरोगा हैं। उनकी गोरखपुर में ही तैनाती है। बेटे का नाम अपराध में आने से दरोगा परेशान हैं। वह कह रहे हैं कि गलती सुधारने का एक मौका मिल जाए।
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केस दो
संगम चौक शाहपुर में 7 अक्तूबर को जुए का अड्डा पकड़ा गया। इस मामले बर्खास्त दरोगा सोनू के साथ ही गोंडा में तैनात एक दरोगा के बेटे ट्ंिवकल को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का आरोप है कि ट्विंकल जमीन कब्जाने में संलिप्त रहा है। अब जुए का अड्डा चलाने में पकड़ा गया। उसके और भी आपराधिक इतिहास खंगाले जा रहे हैं।
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केस तीन
खोराबार के रानीडीहा में रहने वाले दरोगा के बेटे को छेड़खानी और लूट के आरोप में जेल भेजा गया। दरोगा ने बदनामी का हवाला दिया और माफीनामा देकर अफसरों से बेटे को छुड़ाने की गुजारिश की लेकिन मामला उलटा पड़ गया। बेटे को जेल जाना ही पड़ा। इसी तरह शाहपुर में पॉलीटेक्निक की छात्रा से छेड़छाड़ में एक वर्दीधारी के बेटे का नाम सामने आया। पुलिस ने मुकदमा कर आरोपी को जेल भेज दिया। यह मामला भी सितंबर 2017 का है।

एक्सपर्ट की बात
समाज को नियंत्रित करने वाले तंत्र को खाकी वर्दी वालों के बच्चे नजदीक से जान लेते हैं। मानसिक रूप से मान लेते हैं कि उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए कानून तोड़ते हैं। मन बढ़ता चला जाता है और फिर वे जरूरतें पूरी करने के लिए अपराध करने लगते हैं। पुलिस की नौकरी ऐसी है कि घर और दफ्तर का माहौल एक जैसा होता है। गालीगलौज का सिलसिला घर पर भी चलता है। पैरवी पर मुल्जिमों को छोड़ने की लंबी बहस होती है। इसका बड़ा असर बच्चों पर पड़ता है। वह गालीगलौज को अच्छाई के तौर पर लेने लगते हैं। यह भी खतरनाक होता है।

- डॉ. गोपाल अग्रवाल, मनोचिकित्सक

पुलिस वालों की ड्यूटी लंबी होती है। वह घर, परिवार को ज्यादा समय नहीं दे पाते। बच्चे गलती करते हैं, जिसे घर, परिवार नजरअंदाज करता है। इससे गलती करने का सिलसिला बढ़ जाता है। बच्चे को विश्वास हो जाता है कि बड़ी गलती भी नजरअंदाज की जाएगी। यही विश्वास बड़ा अपराध करने के लिए प्रेरित करता है। इस तरह के तमाम मामले भी सामने आए हैं। कई बार ऐसा होता है कि छोटे मामलों में पिता मददगार बन जाते हैं। यह स्थिति ज्यादा खतरनाक होती है। इसका फायदा उठाने का बार-बार मन करता है। गलत रास्ते पर आगे बढ़ने को प्रेरित करता है।
- प्रो. कृति पांडेय, समाजशास्त्र विभाग, गोरखपुर यूनिवर्सिटी
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