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मौसम की बेरुखी, किसान दुखी
गोंडा/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 26 Jul 2015 10:55 PM IST
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जिले के प्रसिद्ध कवि घाघ ने कहा है कि दिन भर बद्दर रात निबद्दर, चले पुरवइया झब्बर-झब्बर। घाघ कहैं कुछ होनी होई, कुआं के पानी से धोबी धोई। यानि जब दिन में बदली हो और पुरवा हवा चले तथा रात होते ही आसमान में तारे निकल आएं तो समझो सूखे का संकेत है।
वर्षा विज्ञान में मर्मज्ञ माने जाने वाले घाघ की ये पंक्तियां इस समय बिल्कुल सटीक बैठ रही हैं। मलमास को यदि छोड़ दें तो मौजूदा समय सावन समाप्ति की ओर है। ऐसे में किसानों के आधे खेत बिना फसल के पड़े रह जाएं तो इससे बड़ा अनर्थ और नहीं हो सकता है।
धान की जो फसल लगी है, वह भी सूखने लगी है। स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि किसान भी अब बड़े पशोपेश में हैं। बरसात कम होने के कारण अब कृषि विशेषज्ञ भी हैरान नजर आ रहे हैं। धान रोपाई का उचित समय 31 जुलाई तक ही माना जाता है।
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जुलाई समाप्त होने वाला है और करीब 40 प्रतिशत किसान धान की रोपाई नहीं कर सके हैं। जिले भर में करीब एक लाख 40 हजार हेक्टेयर में धान की रोपाई होती है। लेकिन अभी 80 हजार हेक्टेयर में ही धान की रोपाई हो पायी है। इनमें भी करीब 50 प्रतिशत धान की फसल सूखने लगी है।
जिले में सामान्य वर्षा 1000 मिलीमीटर मानी जाती है। इसमें जून में करीब 200 मिलीमीटर, जुलाई में करीब 350 मिलीमीटर तथा अगस्त में भी 350 मिलीमीटर वर्षा होना सामान्य माना जाता है। लेकिन इस बार जून में 70 मिलीमीटर तथा जुलाई में 60 मिलीमीटर वर्षा ही हुई है। ऐसे में धान की खेती के लिए बहुत कम बरसात मानी जा रही है।
जिले में पिछले चार साल में ह़ुई बारिश पर एक नजर
वर्ष - मिली मीटर में
2011 - 1271.1
2012 - 1378.4
2013 - 1620.8
2014 - 979.8
वर्ष 2015 में अब तक हुई कुल बारिश
माह मिली मीटर में
मई - 64.6
जून - 70.0
जुलाई - 60.0
जिले में खरीफ की फसलों को नहर व नलकूपों ने भी गच्चा दे दिया है। नहरों में पानी न आने व नलकूपों में किसी न किसी तरह की गड़बड़ी के चलते आखिरी छोर तक पानी पहुंचना तो दूर आसपास भी सिंचाई करना संभव नहीं है। नहरों के माइनर सूखे पड़े हैं। विभाग अभी तक नहरों के गैप तक को नहीं भरवा सका है। ऐसे में तमाम क्षेत्र में नहरों व नहरों के माइनर का किसानों को फायदा तो नहीं हुआ, नुकसान काफी उठाना पड़ा है। राजकीय नलकूप बने हैं। उसमें कही बिजली, तो कहीं यांत्रिक दोष से वे बंद पड़े हैं। खेत तक पानी नहीं पहुंच रहा है।
बोले किसान : अब तो टूट रही कमर
बारिश न होने से किसानों में हाहाकार मचा है। किसानों को इस बार मौसम को देखकर अपनी फसल बचाने की चिंता सता रही है। जिन किसानों ने धान की रोपाई नहीं की है, उन्हें बारिश होने का इंतजार है। जबकि जिन किसानों ने पंपिंग सेट से खेत में पानी भरवा कर धान की रोपाई कर दी थी, वह अब बारिश न होने के अभाव में सूख रही है।
किसान शीतला प्रसाद मिश्र ने बताया कि दस बीघा धान की फसल की रोपाई पंपसेट से पानी भर कराई थी। विश्वास था कि आगे चलकर पानी बरसेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दो बार सिंचाई करायी गई है। इसी में कमर टूट गई। आगे क्या होगा यह तो ईश्वर हीजानें। निबिहा के किसान राकेश ओझा ने बताया कि जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है, वहां धान की रोपाई पिछड़ रही है। 10 दिन बारिश और न हुई धान की रोपाई करने से किसानों की घर की पूूंजी भी चली जाएगी।
इस समय बारिश का पीक समय चल रहा है। लेकिन बारिश का न होना चिंता का विषय है। मौसम के विक्षोभ में परिवर्तन होने का असर बारिश पर पड़ रहा है। ऐसे थोड़े समय तक और रहा तो करीब 40 से 50 फीसदी तक खरीफ फसलों के उत्पादन प्रभावित होने की संभावना बन जाएगी। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे अपने धान की फसलों में पानी भरवाते रहें, ताकि धान के पौधे मरने न पाएं। सिंचाई के बाद यूरिया की हल्की टाप ड्रेसिंग कर दें। - डॉ. उपेन्द्र नाथ सिंह, कृषि विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केन्द्र गोंडा
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वर्षा विज्ञान में मर्मज्ञ माने जाने वाले घाघ की ये पंक्तियां इस समय बिल्कुल सटीक बैठ रही हैं। मलमास को यदि छोड़ दें तो मौजूदा समय सावन समाप्ति की ओर है। ऐसे में किसानों के आधे खेत बिना फसल के पड़े रह जाएं तो इससे बड़ा अनर्थ और नहीं हो सकता है।
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धान की जो फसल लगी है, वह भी सूखने लगी है। स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि किसान भी अब बड़े पशोपेश में हैं। बरसात कम होने के कारण अब कृषि विशेषज्ञ भी हैरान नजर आ रहे हैं। धान रोपाई का उचित समय 31 जुलाई तक ही माना जाता है।
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जुलाई समाप्त होने वाला है और करीब 40 प्रतिशत किसान धान की रोपाई नहीं कर सके हैं। जिले भर में करीब एक लाख 40 हजार हेक्टेयर में धान की रोपाई होती है। लेकिन अभी 80 हजार हेक्टेयर में ही धान की रोपाई हो पायी है। इनमें भी करीब 50 प्रतिशत धान की फसल सूखने लगी है।
जिले में सामान्य वर्षा 1000 मिलीमीटर मानी जाती है। इसमें जून में करीब 200 मिलीमीटर, जुलाई में करीब 350 मिलीमीटर तथा अगस्त में भी 350 मिलीमीटर वर्षा होना सामान्य माना जाता है। लेकिन इस बार जून में 70 मिलीमीटर तथा जुलाई में 60 मिलीमीटर वर्षा ही हुई है। ऐसे में धान की खेती के लिए बहुत कम बरसात मानी जा रही है।
जिले में पिछले चार साल में ह़ुई बारिश पर एक नजर
वर्ष - मिली मीटर में
2011 - 1271.1
2012 - 1378.4
2013 - 1620.8
2014 - 979.8
वर्ष 2015 में अब तक हुई कुल बारिश
माह मिली मीटर में
मई - 64.6
जून - 70.0
जुलाई - 60.0
जिले में खरीफ की फसलों को नहर व नलकूपों ने भी गच्चा दे दिया है। नहरों में पानी न आने व नलकूपों में किसी न किसी तरह की गड़बड़ी के चलते आखिरी छोर तक पानी पहुंचना तो दूर आसपास भी सिंचाई करना संभव नहीं है। नहरों के माइनर सूखे पड़े हैं। विभाग अभी तक नहरों के गैप तक को नहीं भरवा सका है। ऐसे में तमाम क्षेत्र में नहरों व नहरों के माइनर का किसानों को फायदा तो नहीं हुआ, नुकसान काफी उठाना पड़ा है। राजकीय नलकूप बने हैं। उसमें कही बिजली, तो कहीं यांत्रिक दोष से वे बंद पड़े हैं। खेत तक पानी नहीं पहुंच रहा है।
बोले किसान : अब तो टूट रही कमर
बारिश न होने से किसानों में हाहाकार मचा है। किसानों को इस बार मौसम को देखकर अपनी फसल बचाने की चिंता सता रही है। जिन किसानों ने धान की रोपाई नहीं की है, उन्हें बारिश होने का इंतजार है। जबकि जिन किसानों ने पंपिंग सेट से खेत में पानी भरवा कर धान की रोपाई कर दी थी, वह अब बारिश न होने के अभाव में सूख रही है।
किसान शीतला प्रसाद मिश्र ने बताया कि दस बीघा धान की फसल की रोपाई पंपसेट से पानी भर कराई थी। विश्वास था कि आगे चलकर पानी बरसेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दो बार सिंचाई करायी गई है। इसी में कमर टूट गई। आगे क्या होगा यह तो ईश्वर हीजानें। निबिहा के किसान राकेश ओझा ने बताया कि जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है, वहां धान की रोपाई पिछड़ रही है। 10 दिन बारिश और न हुई धान की रोपाई करने से किसानों की घर की पूूंजी भी चली जाएगी।
इस समय बारिश का पीक समय चल रहा है। लेकिन बारिश का न होना चिंता का विषय है। मौसम के विक्षोभ में परिवर्तन होने का असर बारिश पर पड़ रहा है। ऐसे थोड़े समय तक और रहा तो करीब 40 से 50 फीसदी तक खरीफ फसलों के उत्पादन प्रभावित होने की संभावना बन जाएगी। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे अपने धान की फसलों में पानी भरवाते रहें, ताकि धान के पौधे मरने न पाएं। सिंचाई के बाद यूरिया की हल्की टाप ड्रेसिंग कर दें। - डॉ. उपेन्द्र नाथ सिंह, कृषि विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केन्द्र गोंडा