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एक हजार देवी प्रतिमाओं से पटी सरयू, गंदगी का अंबार
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गोंडा। एक तरफ पूरे देश में स्वच्छता अभियान तो दूसरी ओर सरयू नदी के अस्तित्व पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। पवित्र सरयू नदी की आस्था पर हर वर्ष सैकड़ों मूर्तियों के विसर्जन से नदी की गहराई कम होने के साथ ही प्रदूषण व गंदगी भारी पड़ रही है। लगातार अलग-अलग सामाजिक संगठनों द्वारा चलाई गई सरयू नदी की सफाई अभियान की मुहिम मात्र एक दिन में फेल हो गई।
शनिवार को दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद सरयू नदी एक बार फिर गंदगी से पट गई। सरयू की स्वच्छता के लिए प्रशासन या धार्मिक संगठनों ने खामोशी अख्तियार कर ली है। जीवन दायिनी सरयू का अस्तित्व अब खतरे में है। भारी-भरकम खर-फूस, मिट्टी, प्लास्टर आफ पेरिस व केमिकल युक्त रंगों से बनीं मूर्तियों के हर वर्ष हो रहे विसर्जन से सरयू नदी का अस्तित्व खतरों में पड़ गया है।
यहां प्रति वर्ष सैकड़ों प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। गत वर्ष करीब 340 प्रतिमाओं का विसर्जन सरयू नदीं में हुआ था। इस वर्ष भी करीब 350 से अधिक प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ।
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एक स्थान की एक प्रतिमा के साथ कम से कम 4 प्रतिमाएं अलग-अलग देवी देवताओं की होती हैं। इस तरह छोटी-बडी़ मूर्तियों की संख्या करीब एक हजार हो जाती है, जो सरयू नदी में विसर्जित होती हैं।
इन मूर्तियों को खर-फूस व चिकनी मिट्टी एवं प्लास्टर आफ पेरिस के लेपन, सुतली, लकड़ी के प्रयोग से बनाई जाती हैं। ऊपर से मूर्तियों की सुंदरता के लिए रंगों का भी प्रयोग होता है। ये मूर्तियां नदी में विसर्जित की जाती हैं तथा उसकी मिट्टी एवं रंग सरयू के जल में घुल जाने के बाद फूस व लकड़ियां जल में ऊपर तैरने लगती हैं। लकड़ियों को लोग जलाने के लिए उठा ले जाते हैं।
नदी का जल प्रदूषित हो जाता है तथा नदी की गहराई भी लगातार कम होती जा रही है। आने वाले दिनों में यही स्थिती रही तो सरयू का अस्तित्व भी समाप्त हो सकता है। चूंकि सरयू घाट के आसपास नदी की गहराई कम होने के साथ ही पानी कम हो रहा है या पट चुकी है।
सरयू के जल में बहाव भी नहीं है कि उसकी गंदगी बह सके, जबकि प्रति दिन सैकड़ों व वर्ष में छह मेंलों का आयोजन होता है जिसमें लाखों श्रद्धालु स्नान करते हैं। गंदगी को लेकर प्रशासनिक अक्षमता के चलते नदी का अस्तित्व खतरे में है। एसडीएम हीरालाल कहते हैं कि इसके लिए धार्मिक व सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए।
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शनिवार को दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद सरयू नदी एक बार फिर गंदगी से पट गई। सरयू की स्वच्छता के लिए प्रशासन या धार्मिक संगठनों ने खामोशी अख्तियार कर ली है। जीवन दायिनी सरयू का अस्तित्व अब खतरे में है। भारी-भरकम खर-फूस, मिट्टी, प्लास्टर आफ पेरिस व केमिकल युक्त रंगों से बनीं मूर्तियों के हर वर्ष हो रहे विसर्जन से सरयू नदी का अस्तित्व खतरों में पड़ गया है।
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यहां प्रति वर्ष सैकड़ों प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। गत वर्ष करीब 340 प्रतिमाओं का विसर्जन सरयू नदीं में हुआ था। इस वर्ष भी करीब 350 से अधिक प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ।
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एक स्थान की एक प्रतिमा के साथ कम से कम 4 प्रतिमाएं अलग-अलग देवी देवताओं की होती हैं। इस तरह छोटी-बडी़ मूर्तियों की संख्या करीब एक हजार हो जाती है, जो सरयू नदी में विसर्जित होती हैं।
इन मूर्तियों को खर-फूस व चिकनी मिट्टी एवं प्लास्टर आफ पेरिस के लेपन, सुतली, लकड़ी के प्रयोग से बनाई जाती हैं। ऊपर से मूर्तियों की सुंदरता के लिए रंगों का भी प्रयोग होता है। ये मूर्तियां नदी में विसर्जित की जाती हैं तथा उसकी मिट्टी एवं रंग सरयू के जल में घुल जाने के बाद फूस व लकड़ियां जल में ऊपर तैरने लगती हैं। लकड़ियों को लोग जलाने के लिए उठा ले जाते हैं।
नदी का जल प्रदूषित हो जाता है तथा नदी की गहराई भी लगातार कम होती जा रही है। आने वाले दिनों में यही स्थिती रही तो सरयू का अस्तित्व भी समाप्त हो सकता है। चूंकि सरयू घाट के आसपास नदी की गहराई कम होने के साथ ही पानी कम हो रहा है या पट चुकी है।
सरयू के जल में बहाव भी नहीं है कि उसकी गंदगी बह सके, जबकि प्रति दिन सैकड़ों व वर्ष में छह मेंलों का आयोजन होता है जिसमें लाखों श्रद्धालु स्नान करते हैं। गंदगी को लेकर प्रशासनिक अक्षमता के चलते नदी का अस्तित्व खतरे में है। एसडीएम हीरालाल कहते हैं कि इसके लिए धार्मिक व सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए।