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हमारा शहर देश में सबसे गंदा
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 04 May 2017 11:12 PM IST
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हम सबसे गंदे शहर में रहते हैं... इसका खुलासा गुरुवार को जारी केंद्र सरकार की स्वच्छता सर्वेक्षण रिपोर्ट ने कर दिया है। 434 शहरों व नगरों में हुए सर्वेक्षण में गोंडा सबसे आखिरी पायदान पर है।
सिर्फ कागजों में घोड़े दौड़ाने वाले जिले के आला अधिकारियों के लिए ये रिपोर्ट बेहद शर्मनाक है। बीते पांच साल में शहर को सजाने-संवारने के नाम पर 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर दिए गए। पर शहर की सूरत नहीं बदल सकी। इतना बड़ा बजट कहां खर्च हो गया, इसे जिम्मेदार नहीं बता पा रहे हैं।
शहर के लगभग सभी मोहल्लों में नाली चोक है, तो कहीं नाले का ही पता नहीं है। शहर में न तो कचरे के भंडारण की कोई जगह है और न ही उसके निस्तारण की व्यवस्था। यह हाल सिर्फ शहर के 27 वार्डों की जिम्मेदारी संभाल रही नगर पालिका का ही नहीं है, बल्कि इससे खराब स्थिति तो यहां के स्वास्थ्य महकमे की है।
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आज तक अस्पताली कचरे के निस्तारण की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं की जा सकी है। शहर से गंदे पानी की निकासी के लिए जिस सीवर लाइन का जिक्र बीते पांच वर्षों से हो रहा है, उसका भी कोई अता-पता नहीं है। जबकि यह पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश का ड्रीम प्रोजेक्ट था।
नगर पालिका गोंडा में तैनात सफाईकर्मियों के वेतन पर हर महीने तकरीबन 66 लाख रुपये खर्च होते हैं। बावजूद इसके शहर की साफ-सफाई की व्यवस्था लोगों को मुंह चिढ़ाती नजर आती है।
नगर पालिका में जहां 204 नियमित सफाईकर्मियों की तैनाती है, वहीं 168 सफाईकर्मी ठेके पर काम कर रहे हैं। बावजूद इसके स्थिति जस की तस बनी हुई है। इन सफाईकर्मियों में 50 से ऊपर ऐसे भी है, जो अफसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने से लेकर खाना बनाने तक का काम करते हैं।
शहर के सभी 27 वार्डों को साफ-सुथरा रखने के लिए प्रशासनिक स्तर से कई बार अफसरों की ड्यूटी भी वार्डों में लगाई गई। लेकिन उन्होंने मोहल्लों की बेहतर साफ-सफाई के लिए जो भी रिपोर्ट बनाकर अधिकारियों को दी, उसे हर बार कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया।
स्थानीय निकाय के बीते दो कार्यकालों के दौरान 10 में से 8 साल तक नगर पालिका की जिम्मेदारी बतौर प्रशासक एडीएम के ही हाथ में रही है। इस दौरान नगर विकास के जो भी फैसले हुए, वह एडीएम ने ही किए।
फिर चाहे पांच साल पहले एडीएम रहे सुखलाल भारती हों या मौजूदा एडीएम त्रिलोकी सिंह। लेकिन गोंडा शहर के लोगों के लिए यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि दोनों कार्यकालों में उनके शहर को साफ-सुंदर बनाने का कोई एक काम नपाप प्रशासन नहीं कर सका।
27 वार्डों में आज से 10 साल पहले तक 24 बड़े नाले हुआ करते थे। इनसे शहर का सारा गंदा पानी तालाबों के मार्फत बिसुही नदी में चला जाता था। लेकिन आज ज्यादातर नालों पर दुकानों के अलावा मकान खड़े हो गए हैं। इससे घरों का गंदा पानी सड़कों पर ही भरने लगता है।
शहर के किसी भी वार्ड में कचरे के निस्तारण के लिए डस्टबिन की व्यवस्था नहीं है। 10 साल पहले नगर के 27 वार्डों में इसकी व्यवस्था थी। लेकिन अवैध कब्जे के कारण ये सभी गायब हो चुके है। अब लोगों को घरों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा सड़क के किनारे फेंकना पड़ता है। लेकिन हद यह है कि महीनों बाद भी पालिका उसे उठाने की जहमत नहीं उठाती है।
शहर से गंदे पानी के निकासी की कोई व्यवस्था न होने से आज भी यहां मैला खुली नालियों में बहता है। ज्यादातर मोहल्लों में लोगों ने घरों में सेप्टिक टैंक नहीं बनवाए हैं। इसलिए उनके घरों से निकलने वाला मैला नालियों के रास्ते ही नालों में जाता है। तमाम लोगों के घरों में शौचालय नहीं बने हैं। जहां हैं वे देखरेख के अभाव में जर्जर होकर बेकार हो चुके हैं।
पांच साल पहले जहां सूबे की सत्ता पर समाजवादी पार्टी का राज था, तो वहीं अब भाजपा काबिज है। लेकिन दोनों ही सरकारों में रहे जिले के जनप्रतिनिधियों की भूमिका शुरू से ही स्वच्छता मिशन के प्रति उदासीन ही रही है। फिर चाहे वह सूबे की सरकार में पंडित सिंह रहे हों या फिर केन्द्र सरकार में कीर्तिवर्धन, बृजभूषण शरण सिंह। हालांकि, दो महीने पहले बनी सूबे की सरकार में मौजूदा वक्त गोंडा की सातों सीटों पर भाजपा का राज है। बावजूद इसके स्वच्छता अभियान को लेकर कोई ठोस पहल नहीं दिखाई दे रही।
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सिर्फ कागजों में घोड़े दौड़ाने वाले जिले के आला अधिकारियों के लिए ये रिपोर्ट बेहद शर्मनाक है। बीते पांच साल में शहर को सजाने-संवारने के नाम पर 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर दिए गए। पर शहर की सूरत नहीं बदल सकी। इतना बड़ा बजट कहां खर्च हो गया, इसे जिम्मेदार नहीं बता पा रहे हैं।
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शहर के लगभग सभी मोहल्लों में नाली चोक है, तो कहीं नाले का ही पता नहीं है। शहर में न तो कचरे के भंडारण की कोई जगह है और न ही उसके निस्तारण की व्यवस्था। यह हाल सिर्फ शहर के 27 वार्डों की जिम्मेदारी संभाल रही नगर पालिका का ही नहीं है, बल्कि इससे खराब स्थिति तो यहां के स्वास्थ्य महकमे की है।
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आज तक अस्पताली कचरे के निस्तारण की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं की जा सकी है। शहर से गंदे पानी की निकासी के लिए जिस सीवर लाइन का जिक्र बीते पांच वर्षों से हो रहा है, उसका भी कोई अता-पता नहीं है। जबकि यह पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश का ड्रीम प्रोजेक्ट था।
नगर पालिका गोंडा में तैनात सफाईकर्मियों के वेतन पर हर महीने तकरीबन 66 लाख रुपये खर्च होते हैं। बावजूद इसके शहर की साफ-सफाई की व्यवस्था लोगों को मुंह चिढ़ाती नजर आती है।
नगर पालिका में जहां 204 नियमित सफाईकर्मियों की तैनाती है, वहीं 168 सफाईकर्मी ठेके पर काम कर रहे हैं। बावजूद इसके स्थिति जस की तस बनी हुई है। इन सफाईकर्मियों में 50 से ऊपर ऐसे भी है, जो अफसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने से लेकर खाना बनाने तक का काम करते हैं।
शहर के सभी 27 वार्डों को साफ-सुथरा रखने के लिए प्रशासनिक स्तर से कई बार अफसरों की ड्यूटी भी वार्डों में लगाई गई। लेकिन उन्होंने मोहल्लों की बेहतर साफ-सफाई के लिए जो भी रिपोर्ट बनाकर अधिकारियों को दी, उसे हर बार कचरे के डिब्बे में डाल दिया गया।
स्थानीय निकाय के बीते दो कार्यकालों के दौरान 10 में से 8 साल तक नगर पालिका की जिम्मेदारी बतौर प्रशासक एडीएम के ही हाथ में रही है। इस दौरान नगर विकास के जो भी फैसले हुए, वह एडीएम ने ही किए।
फिर चाहे पांच साल पहले एडीएम रहे सुखलाल भारती हों या मौजूदा एडीएम त्रिलोकी सिंह। लेकिन गोंडा शहर के लोगों के लिए यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि दोनों कार्यकालों में उनके शहर को साफ-सुंदर बनाने का कोई एक काम नपाप प्रशासन नहीं कर सका।
27 वार्डों में आज से 10 साल पहले तक 24 बड़े नाले हुआ करते थे। इनसे शहर का सारा गंदा पानी तालाबों के मार्फत बिसुही नदी में चला जाता था। लेकिन आज ज्यादातर नालों पर दुकानों के अलावा मकान खड़े हो गए हैं। इससे घरों का गंदा पानी सड़कों पर ही भरने लगता है।
शहर के किसी भी वार्ड में कचरे के निस्तारण के लिए डस्टबिन की व्यवस्था नहीं है। 10 साल पहले नगर के 27 वार्डों में इसकी व्यवस्था थी। लेकिन अवैध कब्जे के कारण ये सभी गायब हो चुके है। अब लोगों को घरों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा सड़क के किनारे फेंकना पड़ता है। लेकिन हद यह है कि महीनों बाद भी पालिका उसे उठाने की जहमत नहीं उठाती है।
शहर से गंदे पानी के निकासी की कोई व्यवस्था न होने से आज भी यहां मैला खुली नालियों में बहता है। ज्यादातर मोहल्लों में लोगों ने घरों में सेप्टिक टैंक नहीं बनवाए हैं। इसलिए उनके घरों से निकलने वाला मैला नालियों के रास्ते ही नालों में जाता है। तमाम लोगों के घरों में शौचालय नहीं बने हैं। जहां हैं वे देखरेख के अभाव में जर्जर होकर बेकार हो चुके हैं।
पांच साल पहले जहां सूबे की सत्ता पर समाजवादी पार्टी का राज था, तो वहीं अब भाजपा काबिज है। लेकिन दोनों ही सरकारों में रहे जिले के जनप्रतिनिधियों की भूमिका शुरू से ही स्वच्छता मिशन के प्रति उदासीन ही रही है। फिर चाहे वह सूबे की सरकार में पंडित सिंह रहे हों या फिर केन्द्र सरकार में कीर्तिवर्धन, बृजभूषण शरण सिंह। हालांकि, दो महीने पहले बनी सूबे की सरकार में मौजूदा वक्त गोंडा की सातों सीटों पर भाजपा का राज है। बावजूद इसके स्वच्छता अभियान को लेकर कोई ठोस पहल नहीं दिखाई दे रही।