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विलुप्त हो रही लोक परंपराओं को हिंदी ने दी मुस्कान

Fri, 21 Aug 2020 10:12 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 21 Aug 2020 10:12 PM IST
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Hindi gives smile to the extinct folk traditions
गोंडा। बदल रहे परिवेश, रहन-सहन में विलुप्त हो रही अवध की लोक परंपराओं को अक्षुण रखना कठिन है, लेकिन पूरे देश में विख्यात इन लोक परंपराओं को मंच के माध्यम से, लोक कलाओं के माध्यम से, नृत्य के माध्यम से बचाने के लिए भरसक कोशिश जारी है। इन लोक परंपराओं को लिपिबद्ध कर कुछ हिंदी साहित्यकारों ने लोगों को आत्मसात करने के लिए प्रेरित किया है। कला, नृत्य, संगीत आदि माध्यमों से मंचों व अन्य कार्यक्रमों की धूम तो अब नहीं दिखती है, लेकिन अवधी के सुकुमार कवि सतीश आर्य, डॉ. श्री नरायन तिवारी व शिवपूजन शुक्ल ने लोक परंपराओं की शैली को जीवंतता प्रदान किया है।
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भारतीय संस्कृति लोक और शास्त्र दोनों के ताने बाने से बुनी हुई है। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। अवधी लोक संस्कृति सभी लोक संस्कृतियों से मिलकर एक उपक्षेत्र बनाती है। अवधी व अवध की संस्कृति भारतीय संस्कृति की प्राण हैं। अवध की संस्कृति का केंद्र बिंदु अयोध्या है। अयोध्या राम की जन्मभूमि है। वही राम को वनवास देती है, वही उन्हें राजगद्दी पर बैठाती है, वही सीता को निर्वासित करती है और वही राम के साथ सरयू में प्रवेश करती है। अयोध्या को जाने कितनें उलाहने लोकगीतों में दिए गए हैं। बिना राम के अयोध्या में रहने को लोकमन तैयार नहीं।
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रघुवर संग जाब, अब न अवध मा रहि बै।
अवध की मिट्टी में घुले संस्कार को ये लोक परंपराएं परिभाषित करती हैं। बच्चे धमार मचाते हैं, उल्लास में फगुवा गायन होता है, संस्कार गीतों में प्रयोजन व अनुष्ठान के गीत गाए जाते हैं। इसी तरह लोक रागिनी, लोक अंकन और ऋतु चक्र में भी गीतों का गहरा रिश्ता है। हिरनी का गीत सोहर गीत है तो शोक गीत भी है। आंधी, पानी, झगरा, लड़ाई, लाठी, डंडा, चकिया, पहुरुआ, बीछी कूछी, सांप गोजर सहित विभिन्न रीतियों को भी लोक परंपराओं में स्थान मिला हुआ है।
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अवधी लोकगीतों की विविध परंपराएं
अवध में संस्कार गीत हैं जिसमें सोहर, गर्भाधान, जन्म, छठी, बरही, नामकरण, मुंडन यज्ञोवपीत आदि शामिल हैं। विवाह गीत में तिलक, सुहागगीत तथा सुहागीत, गौने के समय बेटी की विदाई और उसके विछोह की पीड़ा होती है। ऋतु गीत में फगुवा, चौताल, डेढ़ताल, कजली, सावन, चौमासा, बारहमासा आदि हैं। जातीय गीत में धोवियों का बिरहा, नाइयों का नउआ झकोर, अहीरों का बिरहा, पचरा, कुम्हारों, तेली व भड़भूजों का गीत, दलितों का हरिकीर्तन है। श्रमगीत में जांत (चक्की) के गीत, निरवाही, रोपनी, कोल्हुई तथा खलिहान के गीत शामिल हैं। प्रणय गीत में नकटा, पूर्वी, विदेसिया, लाचारी, झूमर, गजल आदि। इसी तरह नाच के गीत, मेले के गीत, गारी के गीत भी खूब प्रचलित रहे हैं।
लोक परंपराओं को संरक्षित करने का प्रयास
डॉ. श्री नरायन तिवारी की अवधी लोकगीत पुस्तक में लोक परंपराओं को संरक्षित करने का प्रयास किया गया है। डॉ. तिवारी कहते हैं आज अवधी लोक में लोकगीतों का गाया जाना बिरल हो गया है। आधुनिकता की होड़ में जिस अपसंस्कृति का जन्म हुआ है उसकी धुंध में सहज लोक जीवन भ्रांत हुआ है।
सीता लकड़ी का किहिंन अंजोर संतति मुख देखंई हो।।
ये गीत राम जी की उस पीड़ा को रेखांकित करते हैं जब लक्ष्मण के माथे पर रोचना लगा देखकर राम को वन में अपने पुत्रों के जन्म का समाचार मिलता है। अवधी लोकगीत नारी की व्यथा-कथा के साक्षी हैं। ससुराल में बहन के कष्टों को देखकर भाई जब कहता है-कि सोना और लोहा सुनार और लुहार की भट्ठी में जलते हैं। तब धरती सा धैर्य रखने वाली बहन कहती है कि मेरा दुख जाकर किसी से कहना नहीं। हे मेरे वीरन! मेरी विपत्ति की गठरी गंगा जमुना के बीच बहा देना। तिवारी कहते हैं लोक गीतों की अभिव्यक्ति हर दुख, सुख, पीड़ा, जन्म, मरण, संस्कार, विक्षोह, मिलन सहित उन सभी परंपराओं को रेखांकित करती है। इन सभी को सोहर, उलारा, भोरहरी, गारी, विदाई सहित अन्य गीतों में पिरोया गया है। श्रीनरायन तिवारी ने अवध की लोक परंपराओं को अपनी पुस्तक अवधी भाषा एवं साहित्य का इतिहास में पिरोने का काम किया है। अवध की लोक परंपराओं को जिले के खेमराज सिंह, बिरहा का रस घोलने वाले पूजाराम, साहेबराम, लंबरदार, नारायण रथ, पंडित नारायन शर्मा, विजय कुंवरि, रामतीरथ शर्मा, शेषदत्त, मनीराम की वाचिक परंपरा की रचनाएं संगीत तुलसीदास, द्रोपदी चीरहरण, सत्य हरिश्चंद्र, वीर अभिमन्यु, शकुंतला, भक्त प्रहलाद, संगीत ध्रुवगीत, सीताहरण आदि को लघु नौटंकी का रूप देकर मंच पर उकेरने का प्रयास किया गया।

हिंदी अवधी की मिठास घोल रहे शिवपूजन
तरबगंज के जमथा गांव में जन्में शिवपूजन शुक्ल भी इन्हीं लोक परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। शुक्ल की रचनाएं मांगै थरिया में अंजोरिया, बरसात के लिए, धरती महरानी व चरनवां कै धूर हिंदी अवधी को संरक्षित करने का उत्कृष्ट प्रयास है। चरनवां कै धूर रामकथा पर आधारित अवधी लोक भजन है। इसमें राम के जनम से लेकर श्रीराम के जलसमाधि तक का वर्णन है। इस अवधी अभिव्यंजना के मूल में श्रीराम ही हैं।
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