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फिर बाढ़ से जूझेंगे 150 गांव, बांध के लिए 58 किसानों ने नहीं दी जमीन
Updated Wed, 12 Dec 2018 11:51 PM IST
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फिर बाढ़ से जूझेंगे 150 गांव, बांध के लिए 58 किसानों ने नहीं दी जमीन
गोंडा। बाढ़ का समय अभी नही है, लेकिन इस बार भी बाढ़ से 150 गांव जूझेंगे यह तय हो गया है। कारण लाख कोशिश के बाद भी करनैलगंज के नकहरा गांव के 58 किसानों ने तटबंध निर्माण के लिए अपनी जमीन देने से इन्कार कर दिया है।
किसानों का कहना है कि बांध कटने से एक तो उनके खेत घाघरा में समा गए हैं और अब जो जमीन बची है उसे फिर बांध बनाने के लिए मांगा जा रहा है। अब जमीन देने के बाद आखिर वे लोग कहां जाएंगे।
भूमि अधिग्रहण से प्रशासन व किसानों के बीच बांध निर्माण के दौरान टकराव के आसार बढ़ रहे हैं। ऐसे में इस बार बांध का निर्माण समय से होने की संभावना नही दिख रही है, तय है कि इस बार करनैलगंज के 150 गांवों में फिर बाढ़ की तबाही होगी।
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वर्ष 2005-06 में चरसड़ी तटबंध का निर्माण 11 करोड की लागत से घाघरा के तट से करनैलगंज क्षेत्र के गावों के किनारे-किनारे परसपुर के चरसड़ी तक बना था। उस समय दो बंधों का निर्माण हुआ था।
तत्कालीन सिंचाई राज्य मंत्री योगेश प्रताप सिंह ने दोनों बांध का निर्माण करनैलगंज तहसील के दो सौ से अधिक गावों को बाढ से सुरक्षित किेरने के लिए कराया था। दोनो बांध पर करीब 17 करोड़ रुपए खर्च हुए थे।
कच्चा बांध होने के कारण दो साल बाद से ही बांध में दरार आना शुरु हो गया। स्थिति यह हुई कि बांध को बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए लेकिन वर्ष 2017 में बांध बह ही गया।
उस समय बांध को बचाने के प्रयास तो हुए लेकिन वर्ष 2018 में बांध पूरी तरह टूट भी गया और बह गया। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए विभागीय मंत्रियों को मौके पर भेजा।
शासन ने तय किया कि नया बांध ऐसा तैयार किया जाए कि उसका एलाइनमेंट सीधा हो। अब सिंचाई विभाग ने जो नए रिंग बांध का प्रस्ताव तैयार किया है उसमें नकहरा गांव को लेते हुए तैयार किया जा रहा है।
नकहरा गांव बांध के बगल ही बसा है। इस गांव में लोगों की पुश्तैनी जमीन है और सेकड़ों एकड़ जमीन बांध कटने से गवां चुके किसान अब जमीन किसी भी कीमत पर देने को तैयार नही हैं। बांध के लिए प्रस्ताव को स्वीकृति तभी मिलनी है जब जमीन की उपलब्धता हो जाए।
इसके लिए जिलाधिकारी ने एडीएम के साथ सिंचाई विभाग की टीम को मौके पर भेजा। वहां किसानों से अधिकारी ने सीधे वार्ता कर हल निकालने की कोशिश भी की। बावजूद इसके किसान जमीन देने को तैयार नही हुए हैं।
अब प्रशासन की परेशानी बढ़ी है कि बांध के लिए जमीन का इंतजाम कैसे हो। बांध का निर्माण शासन की प्राथमिकता में है और किसान तैयार ही नही हो रहे हैं। अधिग्रहण के प्रयास पर भी किसान पानी फेर सकते हैं।
फिलहाल किसान बनाम प्रशासन जैसे हालात नकहरा गांव में हो गए हैं। किसानों की मानें तो वे जमीन क्यों दें, एक बार जहां बांध बना था उसी को पक्का क्यों नही करते हैं। अब बार-बार हमें ही क्यों परेशान किया जा रहा है। इस तरह समय एक बार फिर बांध निर्माण की शुरुआत होते नही दिख रही है।
सख्त कदम उठाने में भी प्रशासन के ठिठक रहे कदम
नकहरा में बांध के जमीन के लिए किसानों से वार्ता के दौरान अधिकारियों ने सख्ती की बात तो कही लेकिन अब उनके कदम ठिठक रहे हैं।
किसानों की सहमति के बिना ही जमीन लेने की तैयारी करने में ही प्रशासन में तय नही हो पा रहश है। वैसे माना जा रहा है कि अधिकारी भी जमीन लेने के लिए योजना तैयार कर तो रहे हैं लेकिन किसानों का रुख अभी भांपने में जुटे हैं।
अपर जिलाधिकारी रत्नाकर मिश्र का कहना है कि बांध का निर्माण जनहित में है। इससे बाढ़ की तबाही को रोका जा सकता है। किसानों से जमीन के लिए वार्ता की जा रही है। एक बार सभी के साथ वार्ता हुई है अभी प्रयास जारी है।
सपा नेता व पूर्व मंत्री योगेश प्रताप सिंह का कहना है कि किसानों से जोर जबरदस्ती की गई तो आंदोलन होगा। उन्होंने बताया कि जिस तरह बांध बनाने की तैयारी है उससे गांव के साथ ही साथ स्कूल, सड़क, बिजली, सीसीरोड़, लोगों के घर सब बांध के दायरे में आ रहे हैं। ऐसे बांध के निर्माण का क्या मतलब है। अब तो नदी बाराबंकी की ओर मुड गई है ।
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गोंडा। बाढ़ का समय अभी नही है, लेकिन इस बार भी बाढ़ से 150 गांव जूझेंगे यह तय हो गया है। कारण लाख कोशिश के बाद भी करनैलगंज के नकहरा गांव के 58 किसानों ने तटबंध निर्माण के लिए अपनी जमीन देने से इन्कार कर दिया है।
किसानों का कहना है कि बांध कटने से एक तो उनके खेत घाघरा में समा गए हैं और अब जो जमीन बची है उसे फिर बांध बनाने के लिए मांगा जा रहा है। अब जमीन देने के बाद आखिर वे लोग कहां जाएंगे।
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भूमि अधिग्रहण से प्रशासन व किसानों के बीच बांध निर्माण के दौरान टकराव के आसार बढ़ रहे हैं। ऐसे में इस बार बांध का निर्माण समय से होने की संभावना नही दिख रही है, तय है कि इस बार करनैलगंज के 150 गांवों में फिर बाढ़ की तबाही होगी।
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वर्ष 2005-06 में चरसड़ी तटबंध का निर्माण 11 करोड की लागत से घाघरा के तट से करनैलगंज क्षेत्र के गावों के किनारे-किनारे परसपुर के चरसड़ी तक बना था। उस समय दो बंधों का निर्माण हुआ था।
तत्कालीन सिंचाई राज्य मंत्री योगेश प्रताप सिंह ने दोनों बांध का निर्माण करनैलगंज तहसील के दो सौ से अधिक गावों को बाढ से सुरक्षित किेरने के लिए कराया था। दोनो बांध पर करीब 17 करोड़ रुपए खर्च हुए थे।
कच्चा बांध होने के कारण दो साल बाद से ही बांध में दरार आना शुरु हो गया। स्थिति यह हुई कि बांध को बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए लेकिन वर्ष 2017 में बांध बह ही गया।
उस समय बांध को बचाने के प्रयास तो हुए लेकिन वर्ष 2018 में बांध पूरी तरह टूट भी गया और बह गया। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए विभागीय मंत्रियों को मौके पर भेजा।
शासन ने तय किया कि नया बांध ऐसा तैयार किया जाए कि उसका एलाइनमेंट सीधा हो। अब सिंचाई विभाग ने जो नए रिंग बांध का प्रस्ताव तैयार किया है उसमें नकहरा गांव को लेते हुए तैयार किया जा रहा है।
नकहरा गांव बांध के बगल ही बसा है। इस गांव में लोगों की पुश्तैनी जमीन है और सेकड़ों एकड़ जमीन बांध कटने से गवां चुके किसान अब जमीन किसी भी कीमत पर देने को तैयार नही हैं। बांध के लिए प्रस्ताव को स्वीकृति तभी मिलनी है जब जमीन की उपलब्धता हो जाए।
इसके लिए जिलाधिकारी ने एडीएम के साथ सिंचाई विभाग की टीम को मौके पर भेजा। वहां किसानों से अधिकारी ने सीधे वार्ता कर हल निकालने की कोशिश भी की। बावजूद इसके किसान जमीन देने को तैयार नही हुए हैं।
अब प्रशासन की परेशानी बढ़ी है कि बांध के लिए जमीन का इंतजाम कैसे हो। बांध का निर्माण शासन की प्राथमिकता में है और किसान तैयार ही नही हो रहे हैं। अधिग्रहण के प्रयास पर भी किसान पानी फेर सकते हैं।
फिलहाल किसान बनाम प्रशासन जैसे हालात नकहरा गांव में हो गए हैं। किसानों की मानें तो वे जमीन क्यों दें, एक बार जहां बांध बना था उसी को पक्का क्यों नही करते हैं। अब बार-बार हमें ही क्यों परेशान किया जा रहा है। इस तरह समय एक बार फिर बांध निर्माण की शुरुआत होते नही दिख रही है।
सख्त कदम उठाने में भी प्रशासन के ठिठक रहे कदम
नकहरा में बांध के जमीन के लिए किसानों से वार्ता के दौरान अधिकारियों ने सख्ती की बात तो कही लेकिन अब उनके कदम ठिठक रहे हैं।
किसानों की सहमति के बिना ही जमीन लेने की तैयारी करने में ही प्रशासन में तय नही हो पा रहश है। वैसे माना जा रहा है कि अधिकारी भी जमीन लेने के लिए योजना तैयार कर तो रहे हैं लेकिन किसानों का रुख अभी भांपने में जुटे हैं।
अपर जिलाधिकारी रत्नाकर मिश्र का कहना है कि बांध का निर्माण जनहित में है। इससे बाढ़ की तबाही को रोका जा सकता है। किसानों से जमीन के लिए वार्ता की जा रही है। एक बार सभी के साथ वार्ता हुई है अभी प्रयास जारी है।
सपा नेता व पूर्व मंत्री योगेश प्रताप सिंह का कहना है कि किसानों से जोर जबरदस्ती की गई तो आंदोलन होगा। उन्होंने बताया कि जिस तरह बांध बनाने की तैयारी है उससे गांव के साथ ही साथ स्कूल, सड़क, बिजली, सीसीरोड़, लोगों के घर सब बांध के दायरे में आ रहे हैं। ऐसे बांध के निर्माण का क्या मतलब है। अब तो नदी बाराबंकी की ओर मुड गई है ।