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हाईकोर्ट पहुंचा परिषदीय स्कूलों में किताबें न पहुंचने का मुद्दा
Updated Sat, 15 Sep 2018 10:48 PM IST
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बच्चों को किताबें न मिलने पर हाईकोर्ट ने मांगी रिपोर्ट
गोंडा। बेेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय स्कूलों के बच्चों को छह माह में भी पूरी किताबें न उपलब्ध कराने का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। जिले के सुनील कुमार त्रिपाठी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ पर कार्रवाई की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि प्रदेश के सरकारी प्राइमरी व जूनियर हाईस्कूलों में 6 से 14 आयु वर्ष के 1.77 करोड़ बच्चे पंजीकृत हैं। इनकी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर प्रदेश सरकार हर साल 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का बजट खर्च करती है।
फिर भी अर्धवार्षिक परीक्षा होने को है और अभी तक बच्चों को 25 फीसदी किताबें भी उपलब्ध नही करा सका है। इस मामले में न्यायमूर्ति विक्रमनाथ व राजेश सिंह चौहान ने सुनवाई कर 10 दिन में मामले पर पूरी रिपोर्ट मांगी है।
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एक वर्ष में एक बच्चे 3 लाख रुपये का बजट होता है खर्च
बेसिक शिक्षा में बजट के खर्च का ब्यौरा याची ने पेश किया है। साल भर में सरकारी स्कूल के एक बच्चे पर 3 साल लाख रुपये खर्च किए जाने का दावा पेश करते हुए स्कूल संचालन में शासन स्तर से हो रही लापरवाही उजागर की है।
दावा किया है कि स्कूल सिर्फ भोजनालय बनकर रह गए हैं। वहां एमडीएम के नाम पर बच्चे जुटाए जाते हैं और फिर खाना खिलाया जाता है। किताबें न होने से पढाई का दावा करना बेमानी है।
किताबों की उपलब्धता न होने पर जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही मांग किया है कि इस बार का सत्र तो शून्य हो चुका है। आने वाले वर्ष की तैयारियों पर ही अब बजट खर्च हो।
पेश किया बजट वार खर्च किए जा रहे धनराशि का ब्यौरा
हाईकोर्ट में बजट वार खर्च का ब्यौरा भी हाईकोर्ट में पेश किया है। एमडीएम में एक बच्चे पर एक दिन में 4.63 रुपए और सालभर में 1018.60 रुपये खर्च होता है। इस हिसाब से सालभर में प्रदेश भर के बच्चों पर 18 अरब दो करोड़ 92 लाख 20 हजार रुपए खर्च होता है।
इसी तरह यूनिफार्म और जूता मोजे पर 7 अरब 87 करोड़ 65 लाख रुपये खर्च होता है। 5 लाख 63 हजार शिक्षकों के वेतन आदि पर 3 खरब 15 अरब 42 करोड़ 94 लाख 93 हजार रुपए साल भर खर्च की रिपोर्ट पेश की है।
इस तरह बेसिक शिक्षा पर 50 हजार करोड़ करोड़ से अधिक का खर्च साल भर में होता है। इस हिसाब से एक बच्चे पर 3 लाख 306 रुपए प्रतिवर्ष खर्च किया जाता है। इसके बाद भी स्कूलों की स्थिति यह है कि किताबें आज तक शत प्रतिशत नही पहुंच पाई हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ता सुनील कुमार कहना है कि बेसिक शिक्षा विभाग में बच्चों की शिक्षा से खिलवाड़ हो रहा है। किताबें नही हैं तो शिक्षक और बच्चे क्या करें। आखिर सरकार किताबें क्यों नही उपलब्ध करा पा रही है। सरकारी बजट में बडे स्तर पर गोलमाल हो रहा है।
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गोंडा। बेेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय स्कूलों के बच्चों को छह माह में भी पूरी किताबें न उपलब्ध कराने का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। जिले के सुनील कुमार त्रिपाठी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ पर कार्रवाई की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि प्रदेश के सरकारी प्राइमरी व जूनियर हाईस्कूलों में 6 से 14 आयु वर्ष के 1.77 करोड़ बच्चे पंजीकृत हैं। इनकी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर प्रदेश सरकार हर साल 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का बजट खर्च करती है।
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फिर भी अर्धवार्षिक परीक्षा होने को है और अभी तक बच्चों को 25 फीसदी किताबें भी उपलब्ध नही करा सका है। इस मामले में न्यायमूर्ति विक्रमनाथ व राजेश सिंह चौहान ने सुनवाई कर 10 दिन में मामले पर पूरी रिपोर्ट मांगी है।
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एक वर्ष में एक बच्चे 3 लाख रुपये का बजट होता है खर्च
बेसिक शिक्षा में बजट के खर्च का ब्यौरा याची ने पेश किया है। साल भर में सरकारी स्कूल के एक बच्चे पर 3 साल लाख रुपये खर्च किए जाने का दावा पेश करते हुए स्कूल संचालन में शासन स्तर से हो रही लापरवाही उजागर की है।
दावा किया है कि स्कूल सिर्फ भोजनालय बनकर रह गए हैं। वहां एमडीएम के नाम पर बच्चे जुटाए जाते हैं और फिर खाना खिलाया जाता है। किताबें न होने से पढाई का दावा करना बेमानी है।
किताबों की उपलब्धता न होने पर जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही मांग किया है कि इस बार का सत्र तो शून्य हो चुका है। आने वाले वर्ष की तैयारियों पर ही अब बजट खर्च हो।
पेश किया बजट वार खर्च किए जा रहे धनराशि का ब्यौरा
हाईकोर्ट में बजट वार खर्च का ब्यौरा भी हाईकोर्ट में पेश किया है। एमडीएम में एक बच्चे पर एक दिन में 4.63 रुपए और सालभर में 1018.60 रुपये खर्च होता है। इस हिसाब से सालभर में प्रदेश भर के बच्चों पर 18 अरब दो करोड़ 92 लाख 20 हजार रुपए खर्च होता है।
इसी तरह यूनिफार्म और जूता मोजे पर 7 अरब 87 करोड़ 65 लाख रुपये खर्च होता है। 5 लाख 63 हजार शिक्षकों के वेतन आदि पर 3 खरब 15 अरब 42 करोड़ 94 लाख 93 हजार रुपए साल भर खर्च की रिपोर्ट पेश की है।
इस तरह बेसिक शिक्षा पर 50 हजार करोड़ करोड़ से अधिक का खर्च साल भर में होता है। इस हिसाब से एक बच्चे पर 3 लाख 306 रुपए प्रतिवर्ष खर्च किया जाता है। इसके बाद भी स्कूलों की स्थिति यह है कि किताबें आज तक शत प्रतिशत नही पहुंच पाई हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ता सुनील कुमार कहना है कि बेसिक शिक्षा विभाग में बच्चों की शिक्षा से खिलवाड़ हो रहा है। किताबें नही हैं तो शिक्षक और बच्चे क्या करें। आखिर सरकार किताबें क्यों नही उपलब्ध करा पा रही है। सरकारी बजट में बडे स्तर पर गोलमाल हो रहा है।