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मनरेगा ने किया बेहाल,मजदूरी मिल रही न काम
Updated Sun, 12 Nov 2017 10:18 PM IST
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मनरेगा ने किया बेहाल,मजदूरी मिल रही न काम
गोंडा। शहरों की तरफ गांव के मजदूरों का पलायन रोककर उन्हें गांव में ही सौ दिन का रोजगार उपलब्ध कराने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना(मनरेगा) जिले में बेहाल हो गई है।
इस योजना के तहत काम करने वाले मजदूरों को न तो पिछले कामों की मजदूरी ही मिल सकी है और न आगे काम ही मिल रहा है। इन श्रमिकों की दो वित्तीय वर्षों को मिलाकर 4.38 करोड़ रुपये की मजदूरी फंसी हुई है मगर अधिकारी इससे बेखबर हैं।
मजदूरी न मिलने से इन श्रमिकों की रोजमर्रा की जिंदगी थम गई है और वह रोजी रोटी की तलाश में अन्य प्रांतों की तरफ पलायन करने को विवश हैं। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना के अंतर्गत रोजगार पाने की लालसा से जिले की 1054 ग्राम पंचायतों में करीब 3.50 लाख मनरेगा श्रमिकों ने अपना पंजीकरण करा रखा है।
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शासन की तरफ से इन श्रमिकों को सौ दिन का रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इसके लिए वित्तीय वर्ष की शुरूआत में ही मानव दिवसों के लक्ष्य का निर्धारण भी तय कर दिया गया है। बावजूद इसके जिले में मनरेगा योजना बेहाल हो गई है।
अफसरों की उदासीनता से अधिकतर गांवो में यह योजना पूरी तरह से ठप हो चुकी है। इस योजना से रोजगार की आस लगाए बैठे मनरेगा के श्रमिकों को काम नहीं मिल रहा है। हालत यह है कि अक्तूबर माह तक 25 लाख मानव दिवसों के सृजन का लक्ष्य अभी 10 लाख मानव दिवस पीछे है।
अक्तूबर तक सिर्फ 15 लाख मानव दिवसों का ही सृजन हो सका है। यही स्थिति मजदूरी के भुगतान की भी है। अगर किसी मजदूर को काम मिल भी गया तो मजदूरी समय से मिलेगी इसकी गांरटी नहीं है।
मजदूरी के भुगतान के रिकार्ड के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2016-17 में काम करने वाले श्रमिकों को ही मजदूरी का भुगतान नही हो सका है। इस वित्तीय वर्ष की करीब 2.12 करोड़ रुपये का भुगतान अटका हुआ है।
इसी तरह से वित्तीय वर्ष 201-18 में काम करने वाले मजदूर भी अभी अपनी मजदूरी नहीं पा सके हैं। इस वित्तीय वर्ष में 2.26 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान नहीं पाया है। सीडीओ अपनी समीक्षा के दौरान कई बार ब्लाक के अफसरों को भुगतान की कार्रवाई के लिए चेतावनी दे चुकी हैं बावजूद इसके अफसरों के रवैये में सुधार नही हो रहा है। अफसरों की इस शिथिलता से बेबस मनरेगा श्रमिक रोजी रोटी की तलाश में दूसरे शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं।
चार ब्लाकों मे है सबसे अधिक बकाएदारी
मनरेगा योजना के तहत श्रमिकों के भुगतान के मामले में जिले के चार ब्लाक बेहद फिसड्डी हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में ही कटरा बाजार में 1.03 करोड़ रुपये की मजदूरी बकाया है।
पंडरीकृपाल में 26 लाख, हलधरमऊ में 14 लाख व नवाबगंज में 11 लाख रुपये क भुगतान लंबित है। इसके अलावा चालू वित्तीय वर्ष में भी इन ब्लाकों में 20 लाख रुपये से अधिक का भुगतान लंबित है।
30 ग्राम पंचायतों में मनरेगा लापता
गोंडा। मुख्य विकास अधिकारी की कई चेतवनी के बावजूद जिले में 30 ग्राम पंखयतें ऐसी है जहां से मनरेगा एकदम लापता हो चुकी है। वित्तीय वर्ष के आठ माह बीत चुके है मगर इन ग्राम पंचायतों में अभी मनरेगा के कार्यों की शुरुवात ही नही हो सकी है। जिले के अफसरों की चेतवनी भी यहां के ग्राम प्रधान व कर्मचारियों पर कोई असर नही डाल सकी है।
तीन वित्तीय वर्षों के 12394 कार्य अधूरे
गोंडा। मनरेगा योजना से शुरु कराए गए कार्यों की भौतिक स्थिति भी बेहद खराब है। अफसरों की लापरवाही से अधिकतर कार्य शुरु होने के बाद ही बंद हो गए। वित्तीय वर्ष 2014-15 के 919,वित्तीय वर्ष 2015-16 के 5883 व वित्तीय वर्ष 2016-17 के 5592 कार्य अभी अधूरे हैं। सीडीओ दिव्या मित्तल इन कार्यों को पूरा कराने के लिए कई बार अफसरों को निर्देशित कर चुकी हैं मगर नतीजा सिफर है।
मनरेगा की स्थित वास्तव में बेहद खराब हो गई है। समीक्षा में इसके सुधार के निर्देश दिए गए हैं। बकाया मजदूरी के भुगतान के लिए भी अफसरों को निर्देशित किया गया है। ढिलाई बरतने वाले अफसरों को चेतावनी दी गई है। अगर जल्द ही सुधार नही हुआ तो जिम्मेदार अफसर व कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
वीरपाल, परियोजना निदेशक
गोंडा। शहरों की तरफ गांव के मजदूरों का पलायन रोककर उन्हें गांव में ही सौ दिन का रोजगार उपलब्ध कराने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना(मनरेगा) जिले में बेहाल हो गई है।
इस योजना के तहत काम करने वाले मजदूरों को न तो पिछले कामों की मजदूरी ही मिल सकी है और न आगे काम ही मिल रहा है। इन श्रमिकों की दो वित्तीय वर्षों को मिलाकर 4.38 करोड़ रुपये की मजदूरी फंसी हुई है मगर अधिकारी इससे बेखबर हैं।
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मजदूरी न मिलने से इन श्रमिकों की रोजमर्रा की जिंदगी थम गई है और वह रोजी रोटी की तलाश में अन्य प्रांतों की तरफ पलायन करने को विवश हैं। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना के अंतर्गत रोजगार पाने की लालसा से जिले की 1054 ग्राम पंचायतों में करीब 3.50 लाख मनरेगा श्रमिकों ने अपना पंजीकरण करा रखा है।
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शासन की तरफ से इन श्रमिकों को सौ दिन का रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इसके लिए वित्तीय वर्ष की शुरूआत में ही मानव दिवसों के लक्ष्य का निर्धारण भी तय कर दिया गया है। बावजूद इसके जिले में मनरेगा योजना बेहाल हो गई है।
अफसरों की उदासीनता से अधिकतर गांवो में यह योजना पूरी तरह से ठप हो चुकी है। इस योजना से रोजगार की आस लगाए बैठे मनरेगा के श्रमिकों को काम नहीं मिल रहा है। हालत यह है कि अक्तूबर माह तक 25 लाख मानव दिवसों के सृजन का लक्ष्य अभी 10 लाख मानव दिवस पीछे है।
अक्तूबर तक सिर्फ 15 लाख मानव दिवसों का ही सृजन हो सका है। यही स्थिति मजदूरी के भुगतान की भी है। अगर किसी मजदूर को काम मिल भी गया तो मजदूरी समय से मिलेगी इसकी गांरटी नहीं है।
मजदूरी के भुगतान के रिकार्ड के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2016-17 में काम करने वाले श्रमिकों को ही मजदूरी का भुगतान नही हो सका है। इस वित्तीय वर्ष की करीब 2.12 करोड़ रुपये का भुगतान अटका हुआ है।
इसी तरह से वित्तीय वर्ष 201-18 में काम करने वाले मजदूर भी अभी अपनी मजदूरी नहीं पा सके हैं। इस वित्तीय वर्ष में 2.26 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान नहीं पाया है। सीडीओ अपनी समीक्षा के दौरान कई बार ब्लाक के अफसरों को भुगतान की कार्रवाई के लिए चेतावनी दे चुकी हैं बावजूद इसके अफसरों के रवैये में सुधार नही हो रहा है। अफसरों की इस शिथिलता से बेबस मनरेगा श्रमिक रोजी रोटी की तलाश में दूसरे शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं।
चार ब्लाकों मे है सबसे अधिक बकाएदारी
मनरेगा योजना के तहत श्रमिकों के भुगतान के मामले में जिले के चार ब्लाक बेहद फिसड्डी हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में ही कटरा बाजार में 1.03 करोड़ रुपये की मजदूरी बकाया है।
पंडरीकृपाल में 26 लाख, हलधरमऊ में 14 लाख व नवाबगंज में 11 लाख रुपये क भुगतान लंबित है। इसके अलावा चालू वित्तीय वर्ष में भी इन ब्लाकों में 20 लाख रुपये से अधिक का भुगतान लंबित है।
30 ग्राम पंचायतों में मनरेगा लापता
गोंडा। मुख्य विकास अधिकारी की कई चेतवनी के बावजूद जिले में 30 ग्राम पंखयतें ऐसी है जहां से मनरेगा एकदम लापता हो चुकी है। वित्तीय वर्ष के आठ माह बीत चुके है मगर इन ग्राम पंचायतों में अभी मनरेगा के कार्यों की शुरुवात ही नही हो सकी है। जिले के अफसरों की चेतवनी भी यहां के ग्राम प्रधान व कर्मचारियों पर कोई असर नही डाल सकी है।
तीन वित्तीय वर्षों के 12394 कार्य अधूरे
गोंडा। मनरेगा योजना से शुरु कराए गए कार्यों की भौतिक स्थिति भी बेहद खराब है। अफसरों की लापरवाही से अधिकतर कार्य शुरु होने के बाद ही बंद हो गए। वित्तीय वर्ष 2014-15 के 919,वित्तीय वर्ष 2015-16 के 5883 व वित्तीय वर्ष 2016-17 के 5592 कार्य अभी अधूरे हैं। सीडीओ दिव्या मित्तल इन कार्यों को पूरा कराने के लिए कई बार अफसरों को निर्देशित कर चुकी हैं मगर नतीजा सिफर है।
मनरेगा की स्थित वास्तव में बेहद खराब हो गई है। समीक्षा में इसके सुधार के निर्देश दिए गए हैं। बकाया मजदूरी के भुगतान के लिए भी अफसरों को निर्देशित किया गया है। ढिलाई बरतने वाले अफसरों को चेतावनी दी गई है। अगर जल्द ही सुधार नही हुआ तो जिम्मेदार अफसर व कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
वीरपाल, परियोजना निदेशक