{"_id":"60faddba8ebc3e58344458c2","slug":"11-732-children-suffering-from-malnutrition-silence-in-rehabilitation-center-gonda-news-lko5881304177","type":"story","status":"publish","title_hn":"अति कुपोषण से जूझ रहे 12000 मासूम, पोषण पुनर्वास केंद्र खाली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अति कुपोषण से जूझ रहे 12000 मासूम, पोषण पुनर्वास केंद्र खाली
विज्ञापन
गोंडा मे जिला अस्पताल स्थित एनआरसी पर महिलाओं को पोषण चार्ट दिखाती स्वास्थ्यकर्मी।
- फोटो : GONDA
गोंडा। कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर में बच्चों को अधिक प्रभावित होने की संभावना जताई जा रही है। डॉक्टरों की माने तो कुुपोषित बच्चों पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। जिले में कुपोषण मुक्त अभियान धराशाई हो गया है। जिले में 11,732 बच्चे घर में पड़े अति कुपोषण से जूझ रहे हैं जबकि, जिला अस्पताल में संचालित पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में सिर्फ दो बच्चे भर्ती हैं।
अति कुपोषित बच्चों को सामान्य बच्चों की श्रेणी में लाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन प्रयास सिर्फ कागजों में चल रहे हैं। जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में वर्तमान में 11,732 बच्चों को अति कुपोषित श्रेणी में चयनित किया गया है।
जिला अस्पताल में संचालित पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में सिर्फ दो बच्चे भर्ती हैं। एनआरसी तक पहुंचाने में विभाग के जिम्मेदार रुचि नहीं दिखा रहे हैं। कुपोषण मुक्त जिले की कल्पना के साथ जिला अस्पताल में कई साल पहले एनआरसी का निर्माण किया गया था।
विज्ञापन
कुपोषित बच्चों को एनआरसी में 14 दिन भर्ती किया जाता है। डॉक्टर लगातार बच्चों का चेकअप कर उन्हें जरूरी दवाओं के साथ-साथ पौष्टिक आहार देने की सलाह देते हैं। इसके लिए डायटीशियन की नियुक्ति की गई है, लेकिन खास बात यह है कि कुपोषित बच्चे एनआरसी में नहीं पहुंच पा रहे हैं। वर्तमान में एनआरसी में सिर्फ दो अति कुपोषित बच्चे भर्ती हैं।
नियमानुसार इन बच्चों को महिला बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को एनआरसी में भर्ती कराना चाहिए, लेकिन कर्मचारियों की लापरवाही से बच्चे एनआरसी तक नहीं पहुंच रहे हैं। इसके चलते घटने के बजाए कुपोषित बच्चों की संख्या में इजाफा हो रहा है। यह अपने आप में हैरान करने वाली बाती है।
एनआरसी में 0-5 साल तक के अति कुपोषित बच्चों को भर्ती किया जाता है। बच्चे के साथ रहने वाले परिवार के एक सदस्य को नाश्ते के साथ-साथ दोनों वक्त का खाना और 50 रुपये दिन के हिसाब से क्षतिपूर्ति राशि दी जाती है।
बच्चे का पूरा इलाज फ्री रहता है। बावजूद इसके एनआरसी तक अति कुपोषित बच्चे नहीं पहुंच रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुपोषण को लेकर जिम्मेदार कितने गंभीर हैं।
एनआरसी के मेडिकल आफीसर डॉ अखिलेश त्रिपाठी का कहना है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तो अति कुपोषित बच्चे ट्रेस कर इसकी सूचना आशा कार्यकर्ताओं को देती हैं। वहीं एएनएम, आशा व अन्य स्वास्थ्यकर्मी बच्चों को एएनआरसी तक पहुंचाने में रुचि कम दिखाती। कोरोना संक्रमण काल में पोषण पुनर्वास केंद्र बंद होने से भी प्रभाव पड़ा है।
विज्ञापन
अति कुपोषित बच्चों को सामान्य बच्चों की श्रेणी में लाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन प्रयास सिर्फ कागजों में चल रहे हैं। जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में वर्तमान में 11,732 बच्चों को अति कुपोषित श्रेणी में चयनित किया गया है।
विज्ञापन
जिला अस्पताल में संचालित पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में सिर्फ दो बच्चे भर्ती हैं। एनआरसी तक पहुंचाने में विभाग के जिम्मेदार रुचि नहीं दिखा रहे हैं। कुपोषण मुक्त जिले की कल्पना के साथ जिला अस्पताल में कई साल पहले एनआरसी का निर्माण किया गया था।
विज्ञापन
कुपोषित बच्चों को एनआरसी में 14 दिन भर्ती किया जाता है। डॉक्टर लगातार बच्चों का चेकअप कर उन्हें जरूरी दवाओं के साथ-साथ पौष्टिक आहार देने की सलाह देते हैं। इसके लिए डायटीशियन की नियुक्ति की गई है, लेकिन खास बात यह है कि कुपोषित बच्चे एनआरसी में नहीं पहुंच पा रहे हैं। वर्तमान में एनआरसी में सिर्फ दो अति कुपोषित बच्चे भर्ती हैं।
नियमानुसार इन बच्चों को महिला बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को एनआरसी में भर्ती कराना चाहिए, लेकिन कर्मचारियों की लापरवाही से बच्चे एनआरसी तक नहीं पहुंच रहे हैं। इसके चलते घटने के बजाए कुपोषित बच्चों की संख्या में इजाफा हो रहा है। यह अपने आप में हैरान करने वाली बाती है।
एनआरसी में 0-5 साल तक के अति कुपोषित बच्चों को भर्ती किया जाता है। बच्चे के साथ रहने वाले परिवार के एक सदस्य को नाश्ते के साथ-साथ दोनों वक्त का खाना और 50 रुपये दिन के हिसाब से क्षतिपूर्ति राशि दी जाती है।
बच्चे का पूरा इलाज फ्री रहता है। बावजूद इसके एनआरसी तक अति कुपोषित बच्चे नहीं पहुंच रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुपोषण को लेकर जिम्मेदार कितने गंभीर हैं।
एनआरसी के मेडिकल आफीसर डॉ अखिलेश त्रिपाठी का कहना है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तो अति कुपोषित बच्चे ट्रेस कर इसकी सूचना आशा कार्यकर्ताओं को देती हैं। वहीं एएनएम, आशा व अन्य स्वास्थ्यकर्मी बच्चों को एएनआरसी तक पहुंचाने में रुचि कम दिखाती। कोरोना संक्रमण काल में पोषण पुनर्वास केंद्र बंद होने से भी प्रभाव पड़ा है।