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नागपंचमी पर नहीं सुनाई देती अखाड़ों की गूंज
Updated Tue, 14 Aug 2018 11:56 PM IST
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गाजीपुर। वर्तमान परिवेश में पारंपरिक खेलों पर ग्रहण लगता जा रहा है। नागपंचमी पर्व पर पहले जहां गांव-गांव अखाड़ों में कुश्ती प्रतियोगिता की धूम मचती थी वहीं आज इस खेल का नामो-निशां मिटता जा रहा है। इन प्रतियोगिताओं में हार जीत करने वाले पहलवानों की चर्चा दूर दूर तक होती थी। अब इन अखाड़ों पर लड़ने वाले न तो वह पहलवान रहे और न ही गंवई दांव-पेंच सिखाने वाले। हालांकि कुछ जगहों पर कुश्ती प्रतियोगिताओं का आयोजन कर औपचारिकता निभाई जा रही है।
नागपंचमी पर्व पर शहर के विभिन्न अखाड़ों के साथ ही आंचलिक क्षेत्रों में भी कुश्ती की बड़ी प्रतियोगिताओँ का आयोजन किया जाता था। माहौल ऐसा होता था कि अखाड़ों पर सिर्फ पहलवान ही नहीं समर्थकों की प्रतिष्ठा तक दांव पर लग जाती थी। एक से एक दांव- पेंच देखने को मिलता था। इस दंगल के दौरान अखाड़ों से निकलने वाली आवाजों की गूंज कई गांवों तक फैलती थी। कुश्ती लड़ने के लिए पहलवान काफी पहले से ही तैयारी करने लगते थे। जीत-हार पर उपहार के अलावा नगद ईनाम भी मिलता था। आज यह पारंपरिक खेल लुप्त हो रहा है। इसका प्रमुख कारण युवाओं की दिलचस्पी नहीं होना है। कहीं-कहीं लोग इस परंपरा को जीवित करने की कोशिश में लगे हैं। शहर के गुरुबाग अखाड़े पर इस परंपरा को कायम रखा जाता है। नागपंचमी के दिन यहां कुश्ती प्रतियोगिता होती है लेकिन इस अखाड़े पर पहले जैसी पहलवानों की भीड़ नहीं होती। इसी प्रकार मुहम्मदाबाद के महादेवा अखाड़े तथा कई अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में समय-समय पर कुश्ती दंगल का आयोजन किया जाता है। नागपंचमी पर तो दंगल देखने वाले दूर दराज से आते थे। गुरुबाग अखाड़ा के राधेश्याम पहलवान ने कहा कि इस खेल को महत्व ही नहीं दिया गया जिससे यह लुप्त होता जा रहा है। पहले अखाड़ों से पहलवान निकलते थे। कई प्रकार की प्रतियोगिताएं होती थी। कई अखाड़े वीरान हो गए। अब तो बचे-खुचे पहलवान ही इस परंपरा को निभा रहे हैं। पहलवानी में नाम कमा चुके मुहम्मदाबाद क्षेत्र के झुन्ना यादव ने कहा कि आज के युवा मोबाइल जीवन जी रहे हैं उनसे पहलवानी की उम्मीद ही नहीं की जा सकती। बताया कि कई पहलवानों को उन्होंने दाव-पेंच सिखाए हैं जो आज भी सफल हैं। अफसोस जताया कि कुछ समय बाद मिट्टी वाले अखाड़ों पर कुश्ती देखने को नहीं मिलेगी।
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नागपंचमी पर्व पर शहर के विभिन्न अखाड़ों के साथ ही आंचलिक क्षेत्रों में भी कुश्ती की बड़ी प्रतियोगिताओँ का आयोजन किया जाता था। माहौल ऐसा होता था कि अखाड़ों पर सिर्फ पहलवान ही नहीं समर्थकों की प्रतिष्ठा तक दांव पर लग जाती थी। एक से एक दांव- पेंच देखने को मिलता था। इस दंगल के दौरान अखाड़ों से निकलने वाली आवाजों की गूंज कई गांवों तक फैलती थी। कुश्ती लड़ने के लिए पहलवान काफी पहले से ही तैयारी करने लगते थे। जीत-हार पर उपहार के अलावा नगद ईनाम भी मिलता था। आज यह पारंपरिक खेल लुप्त हो रहा है। इसका प्रमुख कारण युवाओं की दिलचस्पी नहीं होना है। कहीं-कहीं लोग इस परंपरा को जीवित करने की कोशिश में लगे हैं। शहर के गुरुबाग अखाड़े पर इस परंपरा को कायम रखा जाता है। नागपंचमी के दिन यहां कुश्ती प्रतियोगिता होती है लेकिन इस अखाड़े पर पहले जैसी पहलवानों की भीड़ नहीं होती। इसी प्रकार मुहम्मदाबाद के महादेवा अखाड़े तथा कई अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में समय-समय पर कुश्ती दंगल का आयोजन किया जाता है। नागपंचमी पर तो दंगल देखने वाले दूर दराज से आते थे। गुरुबाग अखाड़ा के राधेश्याम पहलवान ने कहा कि इस खेल को महत्व ही नहीं दिया गया जिससे यह लुप्त होता जा रहा है। पहले अखाड़ों से पहलवान निकलते थे। कई प्रकार की प्रतियोगिताएं होती थी। कई अखाड़े वीरान हो गए। अब तो बचे-खुचे पहलवान ही इस परंपरा को निभा रहे हैं। पहलवानी में नाम कमा चुके मुहम्मदाबाद क्षेत्र के झुन्ना यादव ने कहा कि आज के युवा मोबाइल जीवन जी रहे हैं उनसे पहलवानी की उम्मीद ही नहीं की जा सकती। बताया कि कई पहलवानों को उन्होंने दाव-पेंच सिखाए हैं जो आज भी सफल हैं। अफसोस जताया कि कुछ समय बाद मिट्टी वाले अखाड़ों पर कुश्ती देखने को नहीं मिलेगी।
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