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कभी नहीं भूल पाएंगे ये दिन, बच्चे दूध के लिए तड़पे
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जैन मन्दिर स्थित आश्रय स्थल में अपने परिवार के साथ लोग
- फोटो : FIROZABAD
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फिरोजाबाद। गुजरात में मेहनत मजदूरी कर परिवार का पेट भरने वाले जिले के गांव नारखी के 21 लोग रोजगार छीन जाने पर अपने घर लौट आए। 14 मई को गुजरात से चले ये लोग 16 मई की रात को श्री छदामी लाल जैन मंदिर में बनाए गए आश्रय स्थल पर पहुंचे। सुबह यहां से अपने गांव के लिए रवाना हो गए। इन मजदूरों ने कहा कि तीन दिन का सफर उन्हें 14 साल के वनवास जैसा लग रहा था। खुद तो जो मिला सो खा लिया लेकिन बच्चे दूध के लिए तड़पते रहे। तीन दिन में एक दिन तो सिर्फ बिस्किट खाकर गुजारा किया।
सुभाष तिराहा स्थित जैन मंदिर में बनाए गए आश्रय स्थल पर डालचंद्र ने बताया वह परिवार के साथ बड़ोदरा में पत्नी और तीन बच्चों के साथ रहते हैं। बेटी की उम्र करीब छह साल है। 14 मई को घर आने के लिए ट्रेन में बैठे थे। लॉकडाउन के बीच बाजार बंद होने के कारण घर पर राशन के अलावा कुछ बिस्किट के पैकेट रखे थे। रास्ते में बिस्किट के सहारे यहां आए। रास्ते में न तो खाना मिला और न ही पीने के लिए पानी। 15 मई की रात को बनारस आ गए। यहां से बस से 16 मई की रात फिरोजाबाद पहुंचे। फिरोजाबाद आते समय सिरसागंज के पास प्रशासन द्वारा खाने पीने की व्यवस्था की गई थी।
आश्रयस्थल पर रामेश्वर ने बताय कि वह अपनी पत्नी रागश्रीदेवी के साथ गुजरात में रहते हैं। उनकी सात माह की बच्ची है। पत्नी रागश्रीदेवी घर से बोतल में जो दूध लेकर चली थी लेकिन ये रास्ते में खत्म हो गया। भूख के कारण बच्ची का रास्ते में रो रोकर बुरा हाल हो गया। जेब में पैसा होने के बावजूद भूख से तड़प रही बच्ची का पेट तक नहीं भर सके। ऐसे दिन और यह सफर भगवान किसी को न दिखाए। ट्रेन में बैठने से पहले एक बिस्किट का पैकेट और पानी की बोतल दी गई थी। तीन लोगों के बीच एक बिस्किट के पैकेट से क्या होता ?
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सुभाष तिराहा स्थित जैन मंदिर में बनाए गए आश्रय स्थल पर डालचंद्र ने बताया वह परिवार के साथ बड़ोदरा में पत्नी और तीन बच्चों के साथ रहते हैं। बेटी की उम्र करीब छह साल है। 14 मई को घर आने के लिए ट्रेन में बैठे थे। लॉकडाउन के बीच बाजार बंद होने के कारण घर पर राशन के अलावा कुछ बिस्किट के पैकेट रखे थे। रास्ते में बिस्किट के सहारे यहां आए। रास्ते में न तो खाना मिला और न ही पीने के लिए पानी। 15 मई की रात को बनारस आ गए। यहां से बस से 16 मई की रात फिरोजाबाद पहुंचे। फिरोजाबाद आते समय सिरसागंज के पास प्रशासन द्वारा खाने पीने की व्यवस्था की गई थी।
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आश्रयस्थल पर रामेश्वर ने बताय कि वह अपनी पत्नी रागश्रीदेवी के साथ गुजरात में रहते हैं। उनकी सात माह की बच्ची है। पत्नी रागश्रीदेवी घर से बोतल में जो दूध लेकर चली थी लेकिन ये रास्ते में खत्म हो गया। भूख के कारण बच्ची का रास्ते में रो रोकर बुरा हाल हो गया। जेब में पैसा होने के बावजूद भूख से तड़प रही बच्ची का पेट तक नहीं भर सके। ऐसे दिन और यह सफर भगवान किसी को न दिखाए। ट्रेन में बैठने से पहले एक बिस्किट का पैकेट और पानी की बोतल दी गई थी। तीन लोगों के बीच एक बिस्किट के पैकेट से क्या होता ?
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