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विरोधी थे लेकिन साथ बैठते थे ...
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इंद्रजीत कोरी। संवाद
- फोटो : FATEHPUR
अमौली। विधानसभा के चुनावी माहौल में जनप्रतिनिधियों की आर्थिक रसूख वाली नैतिकता विहीन राजनीति समाज में प्रभावी होती जा रही है। जो जितना आर्थिक ढांचे से मजबूत है वह उतना ही राजनीतिक परिदृश्य में अग्रणी भूमिका में है।
चार दशक पहले की राजनीति में सिद्धांतों के साथ देश और समाज के प्रति सेवा समर्पण की झलक दिखती थी। चुनाव में विरोधी भी एक साथ बैठकर चाय पीते थे। आपसी मतभेद थे, लेकिन मनभेद नहीं था।
क्षेत्र के चिल्ली निवासी पांच बार के विधायक एवं पूर्व मंत्री इंद्रजीत कोरी का कहना है कि अब राजनीति व्यापार बन गई है। जिसमे निजी स्वार्थ और निजी विकास का ध्यान रखा जाता है।
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बताया कि पिता स्व.बद्री प्रसाद ने 1932 में दो साल जेल में रहकर अंग्रेजों की यातनाएं सही। माता सुखरानी देवी कांग्रेस से 1957 में विधायक बनी। 1962 और 1967 में पिता विधायक बने।
पिता की मौत के बाद 1968 में वह पहली बार किशनपुर से विधायक बने। उस समय पार्टी की एक जीप से चुनाव लड़ा था। 1969 में दूसरी बार विधायक चुना गया।
उनके सामने जनता दल से जागेश्वर चुनाव लड़े और हारे थे, लेकिन जहां भी मिलते थे हम चाचा कह कर उन्हें प्रणाम करते, तो वह भी बच्चा कह कर पुकारते और सिर पर हाथ फेरते थे। इसके बाद 1980 और 1984 में जीतकर वह समाज कल्याण मंत्री बने। 2012 में घाटमपुर से सपा से विधायक बने।
अमौली के वयोवृद्ध समाज सेवी हरि नारायण दुबे उर्फ नंदन बाबू ने भी पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि 1970 में पूर्व विधायक रामकिशोर वर्मा उर्फ मंत्री जी को हराकर ब्लाक प्रमुख बने, लेकिन साथ बैठ कर विकास की रूपरेखा तय करते थे।
उसी के बाद जिला परिषद के चुनाव में उनकी मदद की और जितवाया था। 1981 में भाजपा से चुनाव मैदान में थे और कांग्रेस से जगदीश नारायण शर्मा लड़ रहे थे।
वह जब भी मिलते थे वह सम्मान करते और आशीर्वाद लेते थे। वर्तमान में तो चुनाव में सारी मर्यादाएं तार तार हो रही हैं। असंसदीय शब्दों के प्रयोग और आर्थिक वर्चस्व ही नेताओं के मुख्य आभूषण दिख रहे।
बंथरा निवासी दो बार के शिक्षक विधायक लवकुश कुमार मिश्रा का कहना है कि पहला चुनाव वह निर्दलीय 1981 में लड़े थे। इसके बाद शर्मा गुट से 1992 और 1998 में दो बार शिक्षक विधायक बने।
पांडेय गुट से चुनाव हारे कौशल किशोर त्रिपाठी के साथ अक्सर बैठक होती थी और साथ-साथ चाय पीते थे। पूर्व विधायक स्व.रामकिशोर वर्मा उर्फ मंत्री का किस्सा बताते हुए कहा कि 1967 के चुनाव में प्रेम दत्त तिवारी कांग्रेस से इनके खिलाफ चुनाव में थे।
प्रचार में हम भी मंत्री जी के साथ थे। जहानाबाद में कांग्रेस कार्यालय सबको लेकर पहुंच गए और चाय पिया। पुराने जनप्रतिनिधियों की राजनीति में सिद्धांत वादी विचार धारा और सामाजिक समरसता की भावनाओं का ही समावेश था, जो अब दूर-दूर तक कहीं नहीं है।
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चार दशक पहले की राजनीति में सिद्धांतों के साथ देश और समाज के प्रति सेवा समर्पण की झलक दिखती थी। चुनाव में विरोधी भी एक साथ बैठकर चाय पीते थे। आपसी मतभेद थे, लेकिन मनभेद नहीं था।
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क्षेत्र के चिल्ली निवासी पांच बार के विधायक एवं पूर्व मंत्री इंद्रजीत कोरी का कहना है कि अब राजनीति व्यापार बन गई है। जिसमे निजी स्वार्थ और निजी विकास का ध्यान रखा जाता है।
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बताया कि पिता स्व.बद्री प्रसाद ने 1932 में दो साल जेल में रहकर अंग्रेजों की यातनाएं सही। माता सुखरानी देवी कांग्रेस से 1957 में विधायक बनी। 1962 और 1967 में पिता विधायक बने।
पिता की मौत के बाद 1968 में वह पहली बार किशनपुर से विधायक बने। उस समय पार्टी की एक जीप से चुनाव लड़ा था। 1969 में दूसरी बार विधायक चुना गया।
उनके सामने जनता दल से जागेश्वर चुनाव लड़े और हारे थे, लेकिन जहां भी मिलते थे हम चाचा कह कर उन्हें प्रणाम करते, तो वह भी बच्चा कह कर पुकारते और सिर पर हाथ फेरते थे। इसके बाद 1980 और 1984 में जीतकर वह समाज कल्याण मंत्री बने। 2012 में घाटमपुर से सपा से विधायक बने।
अमौली के वयोवृद्ध समाज सेवी हरि नारायण दुबे उर्फ नंदन बाबू ने भी पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि 1970 में पूर्व विधायक रामकिशोर वर्मा उर्फ मंत्री जी को हराकर ब्लाक प्रमुख बने, लेकिन साथ बैठ कर विकास की रूपरेखा तय करते थे।
उसी के बाद जिला परिषद के चुनाव में उनकी मदद की और जितवाया था। 1981 में भाजपा से चुनाव मैदान में थे और कांग्रेस से जगदीश नारायण शर्मा लड़ रहे थे।
वह जब भी मिलते थे वह सम्मान करते और आशीर्वाद लेते थे। वर्तमान में तो चुनाव में सारी मर्यादाएं तार तार हो रही हैं। असंसदीय शब्दों के प्रयोग और आर्थिक वर्चस्व ही नेताओं के मुख्य आभूषण दिख रहे।
बंथरा निवासी दो बार के शिक्षक विधायक लवकुश कुमार मिश्रा का कहना है कि पहला चुनाव वह निर्दलीय 1981 में लड़े थे। इसके बाद शर्मा गुट से 1992 और 1998 में दो बार शिक्षक विधायक बने।
पांडेय गुट से चुनाव हारे कौशल किशोर त्रिपाठी के साथ अक्सर बैठक होती थी और साथ-साथ चाय पीते थे। पूर्व विधायक स्व.रामकिशोर वर्मा उर्फ मंत्री का किस्सा बताते हुए कहा कि 1967 के चुनाव में प्रेम दत्त तिवारी कांग्रेस से इनके खिलाफ चुनाव में थे।
प्रचार में हम भी मंत्री जी के साथ थे। जहानाबाद में कांग्रेस कार्यालय सबको लेकर पहुंच गए और चाय पिया। पुराने जनप्रतिनिधियों की राजनीति में सिद्धांत वादी विचार धारा और सामाजिक समरसता की भावनाओं का ही समावेश था, जो अब दूर-दूर तक कहीं नहीं है।

लवकुश कुमार मिश्रा। संवाद- फोटो : FATEHPUR

हरिनारायण दुबे उर्फ नंदन बाबू। संवाद- फोटो : FATEHPUR