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रात बिताने को खटखटाते नाते-रिश्तेदारों की कुंडी

Sat, 27 Sep 2014 05:32 AM IST
Fatehpur
Fatehpur Updated Sat, 27 Sep 2014 05:32 AM IST
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फतेहपुर। सदर अस्पताल का रैन बसेरा बेमकसद साबित हो रहा है। वजूद में आने के बाद से अब तक रैन बसेरा की उपयोगिता नदारद है। मरीज के साथ आने वाले तीमारदार सारा दिन की तीमारदारी के बाद रात विश्राम के लिए नाते रिश्तेदारों की कुंडी खटखटा रहे हैं। जिनके परिचित नहीं हैं, ऐसे तीमारदारों को मजबूरन अस्पताल के बरामदे में ही अधकचरी नींद मारनी पड़ रही है। जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में रैन बसेरा का निर्माण बमुश्किल डेढ़ साल पहले हुआ है। 118 बेड वाले सदर अस्पताल रैन बसेरा बनने के बाद से अभी तक इसकी उपयोगिता सामने नहीं आ सकी है। हरेक दिन यहां पर एक सैकड़ा के करीब मरीज भर्ती रहते हैं। भर्ती मरीजों के साथ आने वाले तीमारदार शाम ढलने के बाद रात विश्राम को लेकर ठिकाना खोजने लगते हैं। जिन मरीज व तीमारदारों के परिचित अथवा पारिवारिक शहर में रहते हैं वह इन चौखटों पर रात के वक्त कुंडी खटखटाते दिखाई देते हैं। वहीं ऐसे मरीज व तीमारदार, जिनका इस शहर में कोई नाते रिश्तेदार नहीं है। ऐसे तीमारदारों को अस्पताल के बरामदे पर नींद मारने को मजबूर होना पड़ रहा है। कई तीमारदारों ने बताया कि रैन बसेरा में ठहरने की बात को यहां तवज्जो नहीं दी जाती है।
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इंसेट
सार्वजनिक स्थान भी ठिकाना
फतेहपुर। सदर अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों के तीमारदार रात गुजारने के लिए सार्वजनिक स्थलों का भी सहारा ले रहे हैं। बुधवार की रात मवई के राजेश कुमार ने अस्पताल के रैन बसेरा में ताला लगा होने की वजह से साथ आए दोस्त के साथ रात का वक्त गुजारने के लिए आदर्श रेलवे स्टेशन पहुंच गए।
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क्या कहते हैं जवाबदेह
‘रैन बसेरा का निर्माण तीमारदारों के रुकने के लिए कराया गया है। जो भी तीमारदार रैन बसेरा के लिए संपर्कसाधता है, उसे यह सुविधा मुहैया कराई जाती है। सच तो यह है कि ज्यादातर तीमारदार मना करने के बावजूद अपने मरीजों के साथ ही रात गुजारते हैं। जबकि मरीज के साथ एक तीमारदार ही रात में रह सकता है’।
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- डॉ. ओपी द्विवेदी, सीएमएस, सदर अस्पताल
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