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Farrukhabad News: लोहिया अस्पताल में संतों को हाथ में ग्लूकोज की बोतल थमाकर वार्ड में भेजा
Thu, 06 Feb 2025 11:26 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फर्रूखाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फर्रूखाबाद
Updated Thu, 06 Feb 2025 11:26 PM IST
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इमरजेंसी से वार्ड में जाते समय हाथ में बोतल पकड़े साधु।
- फोटो : इमरजेंसी से वार्ड में जाते समय हाथ में बोतल पकड़े साधु।
फर्रुखाबाद। डॉ. राममनोहर लोहिया जिला अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती मरीजों संग यदि तीमारदार नहीं है, तो उसे वार्ड में जाते समय खुद ही ग्लूकोज की बोतल पकड़नी होगी। गुरुवार को रामनगरिया में कल्पवास कर रहे दो संतों के बीमार होने पर लोहिया अस्पताल में ऐसा ही किया गया।
कन्नौज जिले के थाना सौरिख के गांव बिलंदपुर निवासी संत महेश चंद्र गिरि (60) और जिले के कमालगंज थाने के गांव दरौरा निवासी प्रदीप गिरि (35) मेला रामनगरिया में कल्पवास कर रहे हैं। कई दिन से खांसी-जुकाम व बुखार था। उन्हें गुरुवार को मेला मेडिकल कैंप से लोहिया अस्पताल जाने को कह दिया गया। इसके बाद दोनों संतों को एंबुलेंस से दोपहर सवा दो बजे लोहिया अस्पताल में भर्ती किया गया।
इमरजेंसी में प्राथमिक उपचार के बाद दोनों संतों को वार्ड में जाने की बात कह दी गई। हद तो यह हो गई कि मरीजों को वार्डों में ले जाने के लिए स्ट्रेचर तो दूर व्हीलचेयर भी मुहैया नहीं कराई गई। बीमारी से परेशान संतों ने बीगो लगाए हुए ही हाथ में बोतल पकड़कर वार्ड तक गए।
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दो वार्ड बॉय तैनात फिर भी मरीज परेशान
कहने को तो इमरजेंसी से वार्ड में शिफ्ट कराने के लिए दो वार्ड ब्वाय 24 घंटे तैनात रहते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह वार्ड ब्वाय मरीजों के काम आते होंगे। जिसकी वजह से मरीजों को खुद ही स्ट्रेचर खींचना पड़ता है। वहीं इमरजेंसी से वार्ड में शिफ्ट होते वक्त भी तीमारदारों को अपने मरीज को खुद लेकर जाना पड़ता है।
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कन्नौज जिले के थाना सौरिख के गांव बिलंदपुर निवासी संत महेश चंद्र गिरि (60) और जिले के कमालगंज थाने के गांव दरौरा निवासी प्रदीप गिरि (35) मेला रामनगरिया में कल्पवास कर रहे हैं। कई दिन से खांसी-जुकाम व बुखार था। उन्हें गुरुवार को मेला मेडिकल कैंप से लोहिया अस्पताल जाने को कह दिया गया। इसके बाद दोनों संतों को एंबुलेंस से दोपहर सवा दो बजे लोहिया अस्पताल में भर्ती किया गया।
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इमरजेंसी में प्राथमिक उपचार के बाद दोनों संतों को वार्ड में जाने की बात कह दी गई। हद तो यह हो गई कि मरीजों को वार्डों में ले जाने के लिए स्ट्रेचर तो दूर व्हीलचेयर भी मुहैया नहीं कराई गई। बीमारी से परेशान संतों ने बीगो लगाए हुए ही हाथ में बोतल पकड़कर वार्ड तक गए।
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दो वार्ड बॉय तैनात फिर भी मरीज परेशान
कहने को तो इमरजेंसी से वार्ड में शिफ्ट कराने के लिए दो वार्ड ब्वाय 24 घंटे तैनात रहते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह वार्ड ब्वाय मरीजों के काम आते होंगे। जिसकी वजह से मरीजों को खुद ही स्ट्रेचर खींचना पड़ता है। वहीं इमरजेंसी से वार्ड में शिफ्ट होते वक्त भी तीमारदारों को अपने मरीज को खुद लेकर जाना पड़ता है।