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मंद पड़ा चरखे से जागा स्वाभिमान, संकट में बुनकर कारीगर
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कमालगंज। स्वदेशी के हथियार से अंग्रेजों के खिलाफ लोगों में स्वाभिमान का जज्बा जगाने वाले चरखे की चाल अब कहीं मंद हो गई है तो कहीं ठहर ही गई है। सूत में तेजी, गांधी आश्रम व अन्य संस्थाओं द्वारा तैयार माल खरीदने से हाथ खींच लेने जैसी समस्याओं के चलते क्षेत्र के गांव बरिया नगला में कई परिवारों में लगे हथकरघा बंद हो गए हैं। परिवार के लोग बेरोजगार हैं। वह सरकार से मदद की उम्मीद लगाए हैं।
क्षेत्र के गांव बरिया नगला, रजीपुर व कस्बे के लोहियानगर, प्रतापनगर मोहल्ले में हथकरघा से चादरें व अन्य सामान बुनने का काम परंपरागत रूप से होता रहा। हथकरघा कारोबार में समस्याएं बढ़ीं तो पहले कस्बे के हथकरघा बंद हुए। बरियानगला के हथकरघा कारीगरों ने चादरों के साथ ही अंगौछा, शर्ट, पोछा लगाने वाले डस्टर आदि की बुनाई शुरू कर दी। लेकिन अब यहां के भी ज्यादातर हथकरघा बंद हो गए हैं। काम बंद होने से कारीगरों के परिवार में आर्थिक संकट बढ़ गया है।
बरिया नगला के संजय ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी महीन सूत पावरलूम व मोटा सूत हथकरघा के लिए आवंटित कराती थीं। राजीव गांधी के समय मोटा सूट भी विदेश जाने लगा। कानपुर के एल्गिन सहित सरकारी सूत मिलें बंद हो गईं। प्राइवेट मिल से सूत मंहगा होता गया। 1995 तक कारपोरेशन वाले सूत देकर माल बनवाते रहे। फिर उन्होंने काम नहीं दिया। खादी ग्रामोद्योग फर्रुखाबाद भी घाटे से बंद हो गया। कारीगरों के लाखों रुपये का फंड अभी भी नहीं मिला।
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भारत नरेश का कहना है कि केंद्र व राज्य सरकार मदद करे तो हथकरघा कारोबार चमक सकता है। सूत पर अनुदान दिया जाए। सूत पर लगने वाली पांच प्रतिशत जीजीएसटी खत्म की जाए। बाजार विकसित किया जाए।
आजीविका मिशन के ब्लाक प्रबंधक अम्बुज रवि व प्रदीप कुमार का कहना है कि बुनकर महिलाओं के भी दो समूह बनवाए गए हैं। इनके माल की बिक्री के लिए उन्नति प्रेरणा महिला संकुल (सीएलएफ) का गठन किया जा चुका है। ऑनलाइन सामान बिक्री के लिए फ्लिपकार्ट व अमेजन जैसी संस्थाओं से टाइअप करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
विपरीत परिस्थितियों में भी रजीपुर में बुनकर गृह उद्योग संस्था 21 लोगों को रोजगार दे रही है। इनमें नौ महिलाएं भी शामिल हैं। कुछ कारीगर बरियानगला व कस्बे से भी काम करने जाते हैं। संस्था द्वारा कई साइज के डस्टर बनाए जाते हैं। संस्था प्रमुख आदेश सिंह ने बताया कि कारीगर काम के हिसाब से 250 से 300 रुपये या अधिक का काम एक दिन में कर सकते हैं। कोरोना काल से कानपुर, लखनऊ, मुंबई आदि में डस्टर बिक्री में मंदी है। दो लाख का माल फंसा हुआ है। गत वर्ष 45 रुपये वाला सूत अब 49 से 50 रुपये प्रति किलो है। जीएसटी बढ़ने की चर्चा है। शासन-प्रशासन से मदद नहीं मिल रही है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना में 5 लाख रुपये ऋण की फाइल बनी थी। लेकिन आर्यावर्त ग्रामीण बैंक रजीपुर में फाइल निरस्त कर दी गई।
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क्षेत्र के गांव बरिया नगला, रजीपुर व कस्बे के लोहियानगर, प्रतापनगर मोहल्ले में हथकरघा से चादरें व अन्य सामान बुनने का काम परंपरागत रूप से होता रहा। हथकरघा कारोबार में समस्याएं बढ़ीं तो पहले कस्बे के हथकरघा बंद हुए। बरियानगला के हथकरघा कारीगरों ने चादरों के साथ ही अंगौछा, शर्ट, पोछा लगाने वाले डस्टर आदि की बुनाई शुरू कर दी। लेकिन अब यहां के भी ज्यादातर हथकरघा बंद हो गए हैं। काम बंद होने से कारीगरों के परिवार में आर्थिक संकट बढ़ गया है।
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बरिया नगला के संजय ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी महीन सूत पावरलूम व मोटा सूत हथकरघा के लिए आवंटित कराती थीं। राजीव गांधी के समय मोटा सूट भी विदेश जाने लगा। कानपुर के एल्गिन सहित सरकारी सूत मिलें बंद हो गईं। प्राइवेट मिल से सूत मंहगा होता गया। 1995 तक कारपोरेशन वाले सूत देकर माल बनवाते रहे। फिर उन्होंने काम नहीं दिया। खादी ग्रामोद्योग फर्रुखाबाद भी घाटे से बंद हो गया। कारीगरों के लाखों रुपये का फंड अभी भी नहीं मिला।
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भारत नरेश का कहना है कि केंद्र व राज्य सरकार मदद करे तो हथकरघा कारोबार चमक सकता है। सूत पर अनुदान दिया जाए। सूत पर लगने वाली पांच प्रतिशत जीजीएसटी खत्म की जाए। बाजार विकसित किया जाए।
आजीविका मिशन के ब्लाक प्रबंधक अम्बुज रवि व प्रदीप कुमार का कहना है कि बुनकर महिलाओं के भी दो समूह बनवाए गए हैं। इनके माल की बिक्री के लिए उन्नति प्रेरणा महिला संकुल (सीएलएफ) का गठन किया जा चुका है। ऑनलाइन सामान बिक्री के लिए फ्लिपकार्ट व अमेजन जैसी संस्थाओं से टाइअप करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
विपरीत परिस्थितियों में भी रजीपुर में बुनकर गृह उद्योग संस्था 21 लोगों को रोजगार दे रही है। इनमें नौ महिलाएं भी शामिल हैं। कुछ कारीगर बरियानगला व कस्बे से भी काम करने जाते हैं। संस्था द्वारा कई साइज के डस्टर बनाए जाते हैं। संस्था प्रमुख आदेश सिंह ने बताया कि कारीगर काम के हिसाब से 250 से 300 रुपये या अधिक का काम एक दिन में कर सकते हैं। कोरोना काल से कानपुर, लखनऊ, मुंबई आदि में डस्टर बिक्री में मंदी है। दो लाख का माल फंसा हुआ है। गत वर्ष 45 रुपये वाला सूत अब 49 से 50 रुपये प्रति किलो है। जीएसटी बढ़ने की चर्चा है। शासन-प्रशासन से मदद नहीं मिल रही है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना में 5 लाख रुपये ऋण की फाइल बनी थी। लेकिन आर्यावर्त ग्रामीण बैंक रजीपुर में फाइल निरस्त कर दी गई।