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Farrukhabad News: बैंक मैनेजर पर लिमिट के नाम पर धोखाधड़ी का आरोप
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फर्रुखाबाद। बैंक मैनेजर पर लिमिट के नाम पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगाकर कपड़ा व्यापारी ने सीजेएम कोर्ट में अर्जी दायर की है। कोर्ट ने इस मामले में पुलिस से आख्या मांगी है।
शहर कोतवाली के मोहल्ला सदवाड़ा स्ट्रीट निवासी कपड़ा व्यापारी रवींद्र मनी साध ने सीजेएम कोर्ट में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मैनेजर के खिलाफ अर्जी दायर की है। इसमें बताया कि वर्ष 1990 में बैंक से लिमिट कराई थी। सिक्योरिटी बतौर खानपुर कारखाने के प्रपत्र बैंक में दिए थे।
वर्ष 2012 में बैंक लिमिट बंद कर दी। इसके बाद सिक्योरिटी के पेपर वापस मांगे। तो बैंक मैनेजर ने बाद में देने की बात कही और दूसरी जमीन के प्रपत्र देने पर ज्यादा लिमिट कराने का भरोसा दिया। वर्ष 2014 में मैनेजर ने 25 लाख की लिमिट करा दी। इस लिमिट में दूसरी जमीन के प्रपत्र लगाए। इसके बाद लिमिट के रुपये जमा कर कारखाने के प्रपत्र मांगे तो मैनेजर ने 50 लाख की लिमिट स्वीकृत करा दी।
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कुछ दिनों के बाद छह लाख की लिमिट और करा दी। कोरोना के दौरान व्यापार ठप हो गया। 80 लाख का कपड़ा एक्सपोर्ट नहीं हो पाया। लिमिट के 64 लाख रुपये दो किस्तों में बैंक में वर्ष 2024 में जमा कर दिए। प्रपत्र मांगे तो मैनेजर ने बताया कि खाता एनपीए हो गया है।
21 लाख की धनराशि बाकी जमा करनी होगी। व्यापारी ने न्यूनतम ब्याज लगाकर रुपये जमा करने की बात कही तो मैनेजर ने गाली गलौज कर भगा दिया और जमीन व कारखाने के बैनाम के प्रपत्र भी वापस नहीं किए। जिसके बाद व्यापारी ने न्यायालय की शरण ली है। (संवाद)
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शहर कोतवाली के मोहल्ला सदवाड़ा स्ट्रीट निवासी कपड़ा व्यापारी रवींद्र मनी साध ने सीजेएम कोर्ट में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मैनेजर के खिलाफ अर्जी दायर की है। इसमें बताया कि वर्ष 1990 में बैंक से लिमिट कराई थी। सिक्योरिटी बतौर खानपुर कारखाने के प्रपत्र बैंक में दिए थे।
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वर्ष 2012 में बैंक लिमिट बंद कर दी। इसके बाद सिक्योरिटी के पेपर वापस मांगे। तो बैंक मैनेजर ने बाद में देने की बात कही और दूसरी जमीन के प्रपत्र देने पर ज्यादा लिमिट कराने का भरोसा दिया। वर्ष 2014 में मैनेजर ने 25 लाख की लिमिट करा दी। इस लिमिट में दूसरी जमीन के प्रपत्र लगाए। इसके बाद लिमिट के रुपये जमा कर कारखाने के प्रपत्र मांगे तो मैनेजर ने 50 लाख की लिमिट स्वीकृत करा दी।
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कुछ दिनों के बाद छह लाख की लिमिट और करा दी। कोरोना के दौरान व्यापार ठप हो गया। 80 लाख का कपड़ा एक्सपोर्ट नहीं हो पाया। लिमिट के 64 लाख रुपये दो किस्तों में बैंक में वर्ष 2024 में जमा कर दिए। प्रपत्र मांगे तो मैनेजर ने बताया कि खाता एनपीए हो गया है।
21 लाख की धनराशि बाकी जमा करनी होगी। व्यापारी ने न्यूनतम ब्याज लगाकर रुपये जमा करने की बात कही तो मैनेजर ने गाली गलौज कर भगा दिया और जमीन व कारखाने के बैनाम के प्रपत्र भी वापस नहीं किए। जिसके बाद व्यापारी ने न्यायालय की शरण ली है। (संवाद)