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उत्पादन की होड़ में गुम हो रही बीहड़ के रानी के दूध की मिठास

Fri, 03 Jul 2020 06:09 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 03 Jul 2020 06:09 PM IST
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Rugged queen's milk sweetness lost in production race
फोटो संख्या 01, 02 व 03 भदावरी प्रजनन केंद्र में बंधी भैंसे - फोटो : ETAWHA
मुनाफे और दुग्ध उत्पादन की होड़ में बीहड़ की रानी कही जाने वाली भदावरी भैंसों की नस्ल जिले में विलुप्त होने की कगार पर है।
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12 फीसदी वसा वाला इनका दूध किसी जमाने में घी उत्पादन का सबसे बड़ा स्रोत था। लेकिन, दूध से होने वाले तात्कालिक मुनाफे के चक्कर में पशुपालक इन्हें दरकिनार करते गए।
स्थित यह है कि अब इनकी संख्या इनके संरक्षण के लिए बनाए गए भदावरी परिक्षेत्र की सरकारी चहारदीवारी तक सिमट कर रह गई है।
भदावरी एवं जमुनापारी परिक्षेत्र के संयुक्त निदेशक डॉ. डीके शर्मा के मुताबिक कम दूध का उत्पादन करने वाली भदावरी भैंसों को किसानों और पशुपालकों ने ऐसा उपेक्षित किया कि इस साल की नीलामी में एक भी भैंस नहीं बिक पाई।
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उनका कहना है कि पशुपालक 8-10 लीटर दूध देने वाली मुर्रा भैंसों को पालने में ज्यादा दिलचप्सी दिखा रहे हैं। लेकिन इन भैंसों के दूध में वसा की मात्रा अधिकतम 6.5 प्रतिशत तक ही है।
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जबकि भदावरी भैंस औसत 5-6 लीटर दूध देेती है, जिसमें वसा की मात्रा 12 फीसदी तक होती है। भदावरी भैंसें 48 डिग्री तापमान को भी आसानी से झेलकर रह सकती हैं।
अन्य नस्ल की भैंसें 40 से ऊपर तापमान होने पर बीमार पड़ने लगती हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान से सटे पंजाब और सिंध इलाके की मुर्रा भैंसें अधिक दूध देने की वजह से पशुपालकों की पहली पसंद बन रही हैं।
जबकि आबोहवा और देखभाल में कम खर्चीली भदावरी भैंसों का पालना उनके लिए फायदे का सौदा हो सकता है। भदावरी की उपेक्षा की वजह से ही शुद्ध देसी घी का उत्पादन कम होता जा रहा है।
डॉ. डीके शर्मा के मुताबिक चकरनगर, हनुमंतपुरा से आगरा और मध्य प्रदेश से सटे इलाके भदावरी भैंसों का सबसे बड़ा केंद्र थे। इस साल करवाए गए सर्वे में पूरे जिले में इस नस्ल की महज 70 भैंसें पाई गईं।
इसमें भी ज्यादातर भैंसों की नस्ल की शुद्धता नहीं बची है। इनके संरक्षण के लिए बने परिक्षेत्र में छोटी बड़ी 168 भैंसें हैं जिनका प्रजनन करवाकर विस्तार किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2017 की नीलामी में 22, वर्ष 2018 में 20 और वर्ष 2019 में 23 भैंसें बिकी थीं। इस साल की नीलामी में एक भी भैंस नहीं बिक पाई।
डॉ. डीके शर्मा के मुताबिक देश के प्रमुख रजवाड़ों में से एक भदावर से इस नस्ल का इतिहास जुड़ा है। चंबल नदी से जुड़े बीहड़ से लेकर मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा तक फैले राज्य में ही यह नस्ल पाई जाती थी।

अंग्रेजी शासन काल में वैज्ञानिक जैक एरेह ने इसकी खोज की। उस समय इसके दूध में 14 फीसदी तक फैट पाया गया था।
इसके बाद कृषि वैज्ञानिक कौर ने 1950 से 1961 तक इस नस्ल पर शोध करके इसे रजवाड़े से जोड़कर भदावरी नाम दिया था। इसके बाद ये भैंसें इटावा की पहचान बनकर उभरीं जो अब खुद विलुप्त हो रही हैं।
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