फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Etawah News ›   Lotus blossomed in the stronghold of SP in 2017

सपा के गढ़ में 2017 में खिला था कमल

Fri, 14 Jan 2022 11:39 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 14 Jan 2022 11:39 PM IST
विज्ञापन
Lotus blossomed in the stronghold of SP in 2017
निवाड़ीकला। सियासत के बाजार में भरथना विधानसभा सीट की चर्चाएं अब जोर पकड़ने लगी है। टिकट के तमाम दावेदारों के चलते प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच यहां एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति बनी हुई है।
विज्ञापन

एक पार्टी के जिलाध्यक्ष से लेकर कई प्रमुख नेता दावेदारी ठोक रहे हैं। वही वर्तमान विधायक भी सीट पक्की समझकर जनता जनार्दन से मिल जुलकर माहौल अपने पक्ष में करने में जुटी है ।
विज्ञापन

ओबीसी बहुल भरथना सुरक्षित सीट सपा का गढ़ मानी जाती रही है। 2017 के चुनाव में भाजपा ने इस पर अपना कब्जा जमा लिया। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी सावित्री कठेरिया ने सपा प्रत्याशी कमलेश कठेरिया को 1968 मतों के अंतर से हराया था।
विज्ञापन
विज्ञापन

बसपा के राघवेंद्र सिंह गौतम (अब सपा में) तीसरे स्थान पर रहे थे। शुरुआत से ही यह सीट सामान्य थी, लेकिन 2012 में परिसीमन के बाद यह सीट एससी के लिए सुरक्षित कर दी गई।
इस सीट पर पहले विधानसभा चुनाव में मेहरबान सिंह कांग्रेस से चुनाव जीते। उसके बाद 1993 से इस सीट पर सपा का कब्जा हो गया और महाराज सिंह विधायक बने।
वर्ष 2001 तक यह तीन कार्यकाल तक यह सीट सपा के कब्जे में ही रही। विधायक महाराज सिंह यादव के निधन के बाद 2002 में हुए चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस ने वापसी की और विनोद यादव विधायक बने।
वर्ष 2007 में इस सीट से सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव विधायक बने।
सीट छोड़ने के बाद 2009 में हुए उपचुनाव में बसपा के शिवप्रसाद यादव (अब भाजपा में) ने इस पर कब्जा जमा लिया। 2012 में फिर से यह सीट सपा की सुखदेवी वर्मा और 2017 में भाजपा की सावित्री कठेरिया ने जीती।
पहली बार भाजपा के हाथ लगी यह सीट
भरथना सीट पर दो उपचुनाव समेत वोटरों द्वारा 19 बार मतदान किया गया। इसमें भाजपा को सिर्फ 2017 में ही जीत हासिल हो सकी। इससे पहले भाजपा प्रत्याशी उप विजेता तक नहीं हो सके थे।
1991 में जनता पार्टी के महाराज सिंह के सामने भाजपा के शिवप्रेम चंद्र शाक्य उप विजेता रहे थे। अब भाजपा अपनी सीट बचा पाएगी या किसी और के झोले में जाएगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन दावेदारों की संख्या को देखते हुए मुकाबला रोमांचक होने वाला है।
पांच बार विधायक रहे महाराज सिंह
आंकड़ों पर अगर गौर करें, तो भरथना सीट पर महाराज सिंह लगातार पांच बार विधायक बने। वर्ष 1985 में वह लोकदल से विधायक बने। 1989 जनता दल से, 1991 जनता पार्टी, 1993-96 सपा से विधायक बने।
बुजुर्ग राम सनेही बताते हैं कि उन दिनों महाराज सिंह का दबदबा था। वह जिस पार्टी से लड़ते थे, जीत उनके कदमों में होती थी।
1993 में थे सबसे ज्यादा प्रत्याशी मैदान में
भरथना विधानसभा में वर्ष 1993 के चुनाव में सबसे ज्यादा प्रत्याशियों ने अपनी किस्मत आजमाई थी। प्रमुख दलों को छोड़ दे तो 33 निर्दलीय समेत कुल 43 प्रत्याशी मैदान में थे।
हालांकि, इस चुनाव में सपा ने जीत हासिल की और कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही थी, वहीं सबसे कम पांच प्रत्याशी 1969 के चुनाव मैदान में थे। तब कांग्रेस के बलराम सिंह यादव ने जीत हासिल की थी।
बोले जानकार---
75 वर्षीय बुजुर्ग राजकुमार बताते है कि पहले की राजनीति और अब की राजनीति में जमीन आसमान का फर्क है। पहले आपसी मनमुटाव नहीं था, सभी नेता पास में बैठकर सुख-दुख में शामिल होते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है।

वहीं, रामसनेही कहते है कि पहले साधारण तरीके से नेता सभी लोगों से मिलते थे। लोग अपनी बात कहने से नहीं चूकते थे, लेकिन अब सिर्फ चापलूसी हर जगह पांव पसारे है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed