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Etah News: मासूमियत में इबादत का जज्बा, बच्चों ने रखा पहला रोजा
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शहर के होली मोहल्ले में रोजा इफ्तार करते लोग। संवाद
एटा। माह-ए-रमजान के पहले दिन बृहस्पतिवार को घरों में रौनक रही। माता-पिता व बड़े-बुजुर्गों को नमाज व इबादत करते देख छोटे बच्चों में भी रोजा रखने का उत्साह साफ झलका। इस्लामी मान्यता के अनुसार सात वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए मजहबी जिम्मेदारियों की शुरुआत मानी जाती है। ऐसे में इन छोटे रोजेदारों में भी तोहीद, नमाज, रोजा, हज व जकात जैसे अरकान में रुझान देखा जा रहा है।
होली मोहल्ला निवासी वसीदाद खान के दोनों बच्चों आएजा खान व नकीब खान ने पहला रोजा रखकर अपनी तुतलाती जुबान में दुआएं दोहराईं। बच्चों ने अपनी छोटी उम्र में जिद के साथ पहला रोजा रखा।
पटियाली गेट निवासी मां अमरीन व अब्बू आफताब इस शरई अदायगी पर फूले नहीं समा रहे। उन्होंने मोहल्ले के बच्चों व रिश्तेदारों को बुलाकर रोजा-इफ्तार कराया और बच्चों का पहला रोजा रखने की खुशी साझा की।
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10 वर्षीय शाइस्ता रोजा रखने की जिद पर थीं। आधे दिन तक भूखे रहने और पानी न पीकर खुद को मजबूत दिखाने के प्रयोगों के बाद आखिरकार घर वालों ने उन्हें पहला रोजा रखने की अनुमति दी। खुशी से शाइस्ता ने अपने पहले रोजे का एलान पूरे मोहल्ले में खुद जाकर किया।
पहला रोजा बच्चों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता। शाम होते-होते वे नए कपड़े पहनकर, गले में फूल-माला और चेहरे पर मुस्कान लिए इफ्तारी का थाल लेकर निकल पड़ते हैं। वे घर-घर जाकर इफ्तार पहुंचाते हैं और फख्र से अपना पहला रोजा रखने की खुशी मनाते हैं। मस्जिदों में भी इफ्तार पहुंचाया जाता है। पड़ोसी, रिश्तेदार और घर के बुजुर्ग इन रोजेदारों की हौसला-अफजाई में रुपये, गिफ्ट व दुआ देते हैं।
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होली मोहल्ला निवासी वसीदाद खान के दोनों बच्चों आएजा खान व नकीब खान ने पहला रोजा रखकर अपनी तुतलाती जुबान में दुआएं दोहराईं। बच्चों ने अपनी छोटी उम्र में जिद के साथ पहला रोजा रखा।
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पटियाली गेट निवासी मां अमरीन व अब्बू आफताब इस शरई अदायगी पर फूले नहीं समा रहे। उन्होंने मोहल्ले के बच्चों व रिश्तेदारों को बुलाकर रोजा-इफ्तार कराया और बच्चों का पहला रोजा रखने की खुशी साझा की।
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10 वर्षीय शाइस्ता रोजा रखने की जिद पर थीं। आधे दिन तक भूखे रहने और पानी न पीकर खुद को मजबूत दिखाने के प्रयोगों के बाद आखिरकार घर वालों ने उन्हें पहला रोजा रखने की अनुमति दी। खुशी से शाइस्ता ने अपने पहले रोजे का एलान पूरे मोहल्ले में खुद जाकर किया।
पहला रोजा बच्चों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता। शाम होते-होते वे नए कपड़े पहनकर, गले में फूल-माला और चेहरे पर मुस्कान लिए इफ्तारी का थाल लेकर निकल पड़ते हैं। वे घर-घर जाकर इफ्तार पहुंचाते हैं और फख्र से अपना पहला रोजा रखने की खुशी मनाते हैं। मस्जिदों में भी इफ्तार पहुंचाया जाता है। पड़ोसी, रिश्तेदार और घर के बुजुर्ग इन रोजेदारों की हौसला-अफजाई में रुपये, गिफ्ट व दुआ देते हैं।