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रुक्मिणी के अवशेष आज भी मौजूद हैं एटा में
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कृष्ण की पत्नि रूकमणि के गांव स्थित पुरा पाषाण काल की प्रतिमा।
- फोटो : ETAH
एटा। मथुरा में जन्मे और गोकुल में पले श्रीकृष्ण की ससुराल भी ज्यादा दूर नहीं बल्कि जिले के कुंडलपुर में ही है। निधौलीकलां क्षेत्र के गांव नूहं खेड़ा में रुक्मिणी के पिता राजा भीष्मक के किले के अवशेष आज भी मौजूद हैं। यहीं से दो किलोमीटर दूर मां अंबिका का मंदिर है। यहीं से श्रीकृष्ण रुक्मिणी को अपने साथ ले गए थे और समीप ही पटना पक्षी विहार स्थित शिव मंदिर में विवाह किया था। किला खंडहर होकर टीले में बदल गया है। यहां आज भी खोदाई के दौरान प्राचीन मूर्तियां, बर्तन और अन्य सामान निकलते रहते हैं। इस टीले को संरक्षित नहीं किया गया तो यह अवशेष विलुप्त हो जाएंगे।
एटा जिला मुख्यालय से 28 और आगरा से 65 किलोमीटर की दूरी पर बसे हैं दो गांव खेड़ा नूहं और नूहं खेड़ा। दोनों को मिलाकर प्रचलित नाम बना नूहं खेड़ा। कभी इन दोनों गांवों को मिलाकर कुंडलपुर नामक ग्राम हुआ करता था। इसमें राजा भीष्मक का किला बना था। इसकी बाहरी दीवार करीब दो किलोमीटर दूर गांव नरहुलि तक हुआ करती थी। जहां मां अंबिका का मंदिर बना है। वर्तमान में राजा भीष्मक का यह किला आधा किलोमीटर के दायरे में टीला भर बनकर रह गया है।
अन्य समकालीन स्थल
गांव नूहं खेड़ा में करीब आठ से दस एकड़ में फैला तालाब भी है। यहीं कुंडा धाम भी बना है। खोदाई के दौरान यहां से शिव परिवार सहित खंडित और साबित मूर्तियां निकलीं हुई हैं। ये सभी यहां-वहां रखी गईं हैं। जिन पर लोग श्रद्धापूर्वक जल और प्रसाद अर्पण करते हैं। गांव में ही जवाहर लाल नेहरू इंटर कॉलेज है, जहां सती माता का मंदिर है। वैवत्सय पुराण में वर्णन है कि रुक्मिणी यहां भी पूजा के लिए जाती थीं।
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दस हजार आबादी
नूहं खेड़ा की आबादी करीब दस हजार के आसपास है। वहीं यहां चार हजार के करीब वोटर हैं। गांव सड़क निधौली-जलेसर सड़क किनारे बसा है, इससे आवागमन के साधन सुलभ हैं। वहीं सभी जाति और बिरादरी के लोग आपसी मेलजोल से रहते हैं।
खोदाई में निकली प्रतिमाओं की प्रमाणिकता
आगरा स्थित पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि फोटो में देखने पर प्रतिमाएं 12वीं और 13वीं शताब्दी की प्रतीत हो रही हैं। फिर भी इन्हें हाथ में लेकर और इनका खुरदरापन देखने के साथ ही टेस्टिंग के बाद पता चल सकेगा कि यह प्रतिमाएं महाभारत कालखंड की हैं।
टीले पर होने लगे कब्जे
पुरातत्व विभाग द्वारा टीले को संरक्षित न किए जाने से इस पर लोगों ने कब्जा कर लिया है। कंडा और भूसा रखने के साथ ही पशु बांधे जा रहे हैं। वहीं पक्का निर्माण भी कराया जा रहा है। अगर इसे संरक्षित नहीं किया गया तो विलुप्त हो जाएगा।
- राजा भीष्मक के पुत्र शिशुपाल के किले को बचपन से इसी स्थिति में देख रहे हैं। यहीं कुंडा धाम और कुंडा तालाब है, जो यहां की पौराणिकता को दर्शाता है। - धीतर (70 वर्षीय) गांव नूहं खेड़ा।
- बचपन से किले को ऐसे ही देख रहे हैं। यहां जब भी खोदाई होती है तो मूर्तियां निकल आती हैं। मंदिर में भी खोदाई से निकलीं मूर्तियां रखी गईं हैं। - राजेंद्र(80 वर्षीय) गांव नूहं खेड़ा।
जांच के बाद पता चल सकेगा कि मूर्तियां कितनी पुरानी हैं
इन पत्थर की मूर्तियों में टेरा कोटा से बना जो सिर है, वह गुप्तकालीन शैली का है। यह दौर चौथी और पांचवीं शताब्दी का रहा है। वहीं अन्य पत्थर की मूर्तियों की बनावट दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी की है। यह मूर्तियां कितनी पुरानी हैं, यह इनका खुरदरापन देखने और जांच के बाद ही पता चल सकेगा। -केए कवुई, उप अधीक्षण पुरातत्वविद्, जयपुर
टीम को भेजकर सर्वे कराया जाएगा
मुझे पता चला है कि एटा के खेड़ा नूह में इस तरह का कोई स्थान है, जहां टीला से मूर्तियां निकली हैं। जल्द ही पुरातत्व विभाग की टीम भेजकर स्थान का सर्वे कराया जाएगा। मूर्तियों का पता लगाया जाएगा कि वह किस शैली की हैं और कितनी पुरानी हैं। -बसंत स्वर्णकार, अधीक्षण पुरातत्वविद्, आगरा
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एटा जिला मुख्यालय से 28 और आगरा से 65 किलोमीटर की दूरी पर बसे हैं दो गांव खेड़ा नूहं और नूहं खेड़ा। दोनों को मिलाकर प्रचलित नाम बना नूहं खेड़ा। कभी इन दोनों गांवों को मिलाकर कुंडलपुर नामक ग्राम हुआ करता था। इसमें राजा भीष्मक का किला बना था। इसकी बाहरी दीवार करीब दो किलोमीटर दूर गांव नरहुलि तक हुआ करती थी। जहां मां अंबिका का मंदिर बना है। वर्तमान में राजा भीष्मक का यह किला आधा किलोमीटर के दायरे में टीला भर बनकर रह गया है।
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अन्य समकालीन स्थल
गांव नूहं खेड़ा में करीब आठ से दस एकड़ में फैला तालाब भी है। यहीं कुंडा धाम भी बना है। खोदाई के दौरान यहां से शिव परिवार सहित खंडित और साबित मूर्तियां निकलीं हुई हैं। ये सभी यहां-वहां रखी गईं हैं। जिन पर लोग श्रद्धापूर्वक जल और प्रसाद अर्पण करते हैं। गांव में ही जवाहर लाल नेहरू इंटर कॉलेज है, जहां सती माता का मंदिर है। वैवत्सय पुराण में वर्णन है कि रुक्मिणी यहां भी पूजा के लिए जाती थीं।
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दस हजार आबादी
नूहं खेड़ा की आबादी करीब दस हजार के आसपास है। वहीं यहां चार हजार के करीब वोटर हैं। गांव सड़क निधौली-जलेसर सड़क किनारे बसा है, इससे आवागमन के साधन सुलभ हैं। वहीं सभी जाति और बिरादरी के लोग आपसी मेलजोल से रहते हैं।
खोदाई में निकली प्रतिमाओं की प्रमाणिकता
आगरा स्थित पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि फोटो में देखने पर प्रतिमाएं 12वीं और 13वीं शताब्दी की प्रतीत हो रही हैं। फिर भी इन्हें हाथ में लेकर और इनका खुरदरापन देखने के साथ ही टेस्टिंग के बाद पता चल सकेगा कि यह प्रतिमाएं महाभारत कालखंड की हैं।
टीले पर होने लगे कब्जे
पुरातत्व विभाग द्वारा टीले को संरक्षित न किए जाने से इस पर लोगों ने कब्जा कर लिया है। कंडा और भूसा रखने के साथ ही पशु बांधे जा रहे हैं। वहीं पक्का निर्माण भी कराया जा रहा है। अगर इसे संरक्षित नहीं किया गया तो विलुप्त हो जाएगा।
- राजा भीष्मक के पुत्र शिशुपाल के किले को बचपन से इसी स्थिति में देख रहे हैं। यहीं कुंडा धाम और कुंडा तालाब है, जो यहां की पौराणिकता को दर्शाता है। - धीतर (70 वर्षीय) गांव नूहं खेड़ा।
- बचपन से किले को ऐसे ही देख रहे हैं। यहां जब भी खोदाई होती है तो मूर्तियां निकल आती हैं। मंदिर में भी खोदाई से निकलीं मूर्तियां रखी गईं हैं। - राजेंद्र(80 वर्षीय) गांव नूहं खेड़ा।
जांच के बाद पता चल सकेगा कि मूर्तियां कितनी पुरानी हैं
इन पत्थर की मूर्तियों में टेरा कोटा से बना जो सिर है, वह गुप्तकालीन शैली का है। यह दौर चौथी और पांचवीं शताब्दी का रहा है। वहीं अन्य पत्थर की मूर्तियों की बनावट दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी की है। यह मूर्तियां कितनी पुरानी हैं, यह इनका खुरदरापन देखने और जांच के बाद ही पता चल सकेगा। -केए कवुई, उप अधीक्षण पुरातत्वविद्, जयपुर
टीम को भेजकर सर्वे कराया जाएगा
मुझे पता चला है कि एटा के खेड़ा नूह में इस तरह का कोई स्थान है, जहां टीला से मूर्तियां निकली हैं। जल्द ही पुरातत्व विभाग की टीम भेजकर स्थान का सर्वे कराया जाएगा। मूर्तियों का पता लगाया जाएगा कि वह किस शैली की हैं और कितनी पुरानी हैं। -बसंत स्वर्णकार, अधीक्षण पुरातत्वविद्, आगरा