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पुरस्कारों की विशिष्ट गरिमा, इन्हें वापस करना पुरस्कार की गरिमा के प्रतिकूल: हरनाथ सिंह

Tue, 08 Dec 2020 11:39 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Tue, 08 Dec 2020 11:39 PM IST
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हरनाथ सिंह । - फोटो : ETAH
एटा। मंगलवार को सुबह-सुबह राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने किसान आंदोलन को लेकर एक पोस्ट की। इसमें लिखा कि राष्ट्रीय पुरस्कारों की अपनी एक विशिष्ट गरिमा है। इन्हें वापस करना पुरस्कार की गरिमा के प्रतिकूल है। पुरस्कार का तिरस्कार समाज और राष्ट्र की आकांक्षा का भी अपमान है। उनकी इस पोस्ट पर समर्थन से ज्यादा विरोध के स्वर मुखर हुए।
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योगेश शर्मा लिखते हैं किसानों के आंदोलन का आंशिक समर्थन करता हूं। सरकार को एमएसपी और एपीएमसी को कानूनी मान्यता देनी चाहिए। एक करोड़ रुपये पराली जलाने पर जुर्माना, पूरा गांव अपनी कमाई बेचकर इतना जुर्माना नहीं दे पाएंगे। किसान को लालाओं के हवाले न किया जाए। अरविंद बहादुरिया ने लिखा 2011 से बीजेपी के नेताओं ने झूठे वादे किए, आज तक उन्हें पूरा नहीं किया। सुनील यादव लिखते हैं हमेशा पुरस्कार परिवार के साथ ही मिलते हैं, जब परिवार ही दिक्कत में हो तो पुरस्कार कैसे। शैलेंद्र सिंह यादव ने कहा कब नींद से जागकर आप किसान हितों की बात संसद में रखेंगे।
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सतीश कुमार ने कहा किसानों के खिलाफ दमनकारी नीति अपनाकर उनका सौदा करना भी देश का अपमान है। सुमित यदुवंशी लिखते हैं बाबूजी कुछ दिन पूर्व आप गांव में चौपाल लगाकर कृषि कानून की खूबियां बयां कर रहे थे। अगर ये सही थीं तो पांच दिसंबर को कृषि मंत्री ने संशोधन की बात क्यों बोली। कानून में खोट था तो माननीय आपने लोगों को गुमराह क्यों किया। प्रतीक यादव ने लिखा किसान देश की मिट्टी है, उनकी मांगों को अनदेखा करना देश की गरिमा का अपमान है।
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विवेक यादव ने तो पूरी बात स्पष्ट कर दी कि एक लीटर पानी 20 रुपये का, एक किलो गेहूं 16 रुपये का, एक किलो धान 12 से 18 रुपये का, आप किसान की तकलीफ समझते तो ऐसा न कहते। अंशुल यादव ने लिखा ऐसे सम्मान का क्या करना, जिसमें अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान का ही सम्मान न हो दादाजी। वहीं सतीश कुमार लिखते हैं बहुत अच्छा बिल है तो सरकार को खुले मंच पर किसानों से बात करनी चाहिए, उनकी शंका दूर करनी चाहिए। रिषभ उपाध्याय ने लिखा कि किसानों की सौ प्रतिशत सही मांग है।
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