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Etah News: संकट में जलेसर का पीतल उद्योग, 25 फीसदी इकाइयां बंद
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जलेसर में घुंघरू घंटी उत्पादन फैक्ट्री में काम करते कारीगर। संवाद
अनिरुद्ध शर्मा
जलेसर। इस्राइल-अमेरिका और ईरान में चल रहे युद्ध के कारण उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक पीतल उद्योग गहरे संकट में है। वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित होने से पीतल के कच्चे माल के दाम तेजी से बढ़े हैं। इस अप्रत्याशित महंगाई ने जलेसर के प्रसिद्ध पीतल उद्योग की कमर तोड़ दी है।
पीतल का स्क्रैप और इंगट जो पहले करीब 600 से 650 रुपये प्रति किलो बिक रहा था, वह अब 750 से 800 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गया है। इससे जलेसर के कारखानों में उत्पादन लगभग 40 से 50 फीसदी गिर गया है। लगातार बढ़ते दामों और माल की किल्लत के चलते कई छोटे कारखानों पर ताले लटक गए हैं। जो कारखाने चल रहे हैं, वे अपनी क्षमता से आधे पर काम करने को मजबूर हैं। जलेसर में पीतल की ढलाई और नक्काशी से जुड़ी करीब 300 से 400 इकाइयां हैं। इनमें से 25 फीसदी से अधिक इकाइयों ने अस्थायी तौर पर काम बंद कर दिया है। संवाद
रोजगार और निर्यात पर असर
इस संकट से रोजगार का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। करीब 10 से 15 हजार कारीगरों और मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया है। लागत बढ़ने के कारण पुराने तय रेटों पर ऑर्डर पूरे करना निर्माताओं के लिए घाटे का सौदा बन गया है। लगभग 30 फीसदी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर या तो होल्ड पर हैं या रद्द हो चुके हैं। कारखाना मालिक तारिक और अन्य लोगों ने चिंता जताई कि अगर स्थिति नहीं सुधरी तो यह उद्योग बर्बादी की कगार पर पहुंच जाएगा।
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बोले लोग...
महीनों पहले जो ऑर्डर पुराने रेट पर बुक किए थे, अब उन्हें तैयार करने में हमें अपनी जेब से पैसा लगाना पड़ रहा है। भट्ठियां चालू रखने के लिए न तो पर्याप्त माल मिल रहा है और न ही खरीदार नए रेट पर माल उठाने को तैयार हैं। - तारिक, कारखाना मालिक
अगर पश्चिमी एशिया में तनाव जल्द कम नहीं होता है, तो जलेसर का यह सदियों पुराना कुटीर उद्योग बर्बादी की कगार पर पहुंच सकता है। कारीगर अब खेती या अन्य दिहाड़ी मजदूरी के विकल्पों की तलाश करने लगे हैं, जिससे हुनर के पलायन का खतरा भी बढ़ गया है। - राहत
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जलेसर। इस्राइल-अमेरिका और ईरान में चल रहे युद्ध के कारण उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक पीतल उद्योग गहरे संकट में है। वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित होने से पीतल के कच्चे माल के दाम तेजी से बढ़े हैं। इस अप्रत्याशित महंगाई ने जलेसर के प्रसिद्ध पीतल उद्योग की कमर तोड़ दी है।
पीतल का स्क्रैप और इंगट जो पहले करीब 600 से 650 रुपये प्रति किलो बिक रहा था, वह अब 750 से 800 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गया है। इससे जलेसर के कारखानों में उत्पादन लगभग 40 से 50 फीसदी गिर गया है। लगातार बढ़ते दामों और माल की किल्लत के चलते कई छोटे कारखानों पर ताले लटक गए हैं। जो कारखाने चल रहे हैं, वे अपनी क्षमता से आधे पर काम करने को मजबूर हैं। जलेसर में पीतल की ढलाई और नक्काशी से जुड़ी करीब 300 से 400 इकाइयां हैं। इनमें से 25 फीसदी से अधिक इकाइयों ने अस्थायी तौर पर काम बंद कर दिया है। संवाद
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रोजगार और निर्यात पर असर
इस संकट से रोजगार का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। करीब 10 से 15 हजार कारीगरों और मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया है। लागत बढ़ने के कारण पुराने तय रेटों पर ऑर्डर पूरे करना निर्माताओं के लिए घाटे का सौदा बन गया है। लगभग 30 फीसदी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर या तो होल्ड पर हैं या रद्द हो चुके हैं। कारखाना मालिक तारिक और अन्य लोगों ने चिंता जताई कि अगर स्थिति नहीं सुधरी तो यह उद्योग बर्बादी की कगार पर पहुंच जाएगा।
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महीनों पहले जो ऑर्डर पुराने रेट पर बुक किए थे, अब उन्हें तैयार करने में हमें अपनी जेब से पैसा लगाना पड़ रहा है। भट्ठियां चालू रखने के लिए न तो पर्याप्त माल मिल रहा है और न ही खरीदार नए रेट पर माल उठाने को तैयार हैं। - तारिक, कारखाना मालिक
अगर पश्चिमी एशिया में तनाव जल्द कम नहीं होता है, तो जलेसर का यह सदियों पुराना कुटीर उद्योग बर्बादी की कगार पर पहुंच सकता है। कारीगर अब खेती या अन्य दिहाड़ी मजदूरी के विकल्पों की तलाश करने लगे हैं, जिससे हुनर के पलायन का खतरा भी बढ़ गया है। - राहत

जलेसर में घुंघरू घंटी उत्पादन फैक्ट्री में काम करते कारीगर। संवाद

जलेसर में घुंघरू घंटी उत्पादन फैक्ट्री में काम करते कारीगर। संवाद