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हक से वंचित सैकड़ों गरीब परिवार
ब्यूरो अमर उजाला, एटा
Updated Sun, 24 Jan 2016 11:26 PM IST
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सोशल मीडिया से लेकर देश के हर कोने में 67वें गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी चल रही है। लेकिन दूसरी ओर समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जिसे अभी तक संवैधानिक हक नहीं मिला। आवास, पेंशन, स्वास्थ्य, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। सरकारी योजनाओं में पात्रों का चयन 2002 की सूची के आधार पर हो रहा है, जबकि इसी सूची में शामिल होने से सैकड़ों परिवार रह गए। इनमें कुछ के नाम तो सिफारिश से जुड़े। जिले में 43814 बीपीएल और 27583 अंत्योदय श्रेणी के परिवार हैं।
पालीथिन के त्रिपाल में ही काटना पड़ रहा जीवन
कासगंज। गंजडुंडवारा ब्लॉक के गांव नवाबगंज नगरिया में वाल्मीकि महिला रामश्री (60) का जीवन मैला साफ करने में बीत रहा है। उसका परिवार खुले आसमान के नीचे पॉलीथिन के त्रिपाल की जर्जर झोपड़ी में रहता है। रामश्री दस सालों से एक आवास का सपना आंखों में संजोकर शासन प्रशासन के नुमाइंदों के बीच मांग करती रही। पति की मौत भी गरीबी के चलते क्षय रोग से हो गई। बीपीएल कार्ड के लिए भी प्रयास करके वह थक गई। रामश्री के हालात सरकारी पात्रता में नहीं हैं। उनके दो बच्चे हैं वह भी कूड़ा करकट बीनते हैं।
विकासखंड अधिकारी कृष्णचंद्र वार्ष्णेय कहते हैं कि 2002 की बीपीएल सूची में उनका नाम नहीं है। जिसके चलते आवास का लाभ उन्हें नहीं मिल पाया है। ग्राम प्रधान विनोद बादल का कहना है कि वह रामश्री के परिवार को लाभ देने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकारी योजनाओं की पात्रता के आधार पर ही।
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पेंशन, राशनकार्ड के लिए तरस रही रामलली
गांव अहरौली के नगला सैयद में कई तीन मंजिला भवन नजर आ जाते हैं, लेकिन इन भवनों के बीच में खुले आसमान के नीचे रहने वाले भी कई परिवार हैं। विधवा महिला रामलली (58) का परिवार भी ऐसा है जिसे किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला है। रामलली घरों में झूठे बर्तन साफ कर अपने परिवार का गुजारा करती है। उसका लड़का भी मजदूरी करता है। यह परिवार पॉलीथिन के छत की झोपड़ी में बरसों से रह रहा है। उसे विधवा पेंशन मिलती है और न ही बीपीएल कार्ड मिला।
खुले आसमान के नीचे गुजर रहा जीवन
ग्राम पंचायत अहरौली के दलित वर्ग के रामचंद्र कड़ेरे का परिवार भी मुफलिसी में जी रहा है। इस परिवार के लोग कच्ची झोपड़ी में रह रहे हैं। खुद रामचंद्र बीमार रहते हैं ऐसे में पत्नी भी मजदूरी नहीं कर पाती। घर की आजीविका के लिए झोपड़ी में ही कुछ सब्जियां रखकर रामचंद्र बेच देता है और उससे ही परिवार चलाता है। उसका एक पुत्र मेहनत मजदूरी करता है, जिसकी दो बेटियां (2) साल और पांच माह की हैं। बीपीएल राशनकार्ड भी नहीं बना है। रामचंद्र की कोई जनप्रतिनिधि, अधिकारी नहीं सुन रहा है। ग्राम प्रधान राजवती का कहना है कि उनकी ग्राम पंचायत में जो लोग खुले आसमान के नीचे रहते हैं, उन्हें छत मुहैया कराने को वह शासन प्रशासन के बीच कोशिश करेंगी।
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पालीथिन के त्रिपाल में ही काटना पड़ रहा जीवन
कासगंज। गंजडुंडवारा ब्लॉक के गांव नवाबगंज नगरिया में वाल्मीकि महिला रामश्री (60) का जीवन मैला साफ करने में बीत रहा है। उसका परिवार खुले आसमान के नीचे पॉलीथिन के त्रिपाल की जर्जर झोपड़ी में रहता है। रामश्री दस सालों से एक आवास का सपना आंखों में संजोकर शासन प्रशासन के नुमाइंदों के बीच मांग करती रही। पति की मौत भी गरीबी के चलते क्षय रोग से हो गई। बीपीएल कार्ड के लिए भी प्रयास करके वह थक गई। रामश्री के हालात सरकारी पात्रता में नहीं हैं। उनके दो बच्चे हैं वह भी कूड़ा करकट बीनते हैं।
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विकासखंड अधिकारी कृष्णचंद्र वार्ष्णेय कहते हैं कि 2002 की बीपीएल सूची में उनका नाम नहीं है। जिसके चलते आवास का लाभ उन्हें नहीं मिल पाया है। ग्राम प्रधान विनोद बादल का कहना है कि वह रामश्री के परिवार को लाभ देने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकारी योजनाओं की पात्रता के आधार पर ही।
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पेंशन, राशनकार्ड के लिए तरस रही रामलली
गांव अहरौली के नगला सैयद में कई तीन मंजिला भवन नजर आ जाते हैं, लेकिन इन भवनों के बीच में खुले आसमान के नीचे रहने वाले भी कई परिवार हैं। विधवा महिला रामलली (58) का परिवार भी ऐसा है जिसे किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला है। रामलली घरों में झूठे बर्तन साफ कर अपने परिवार का गुजारा करती है। उसका लड़का भी मजदूरी करता है। यह परिवार पॉलीथिन के छत की झोपड़ी में बरसों से रह रहा है। उसे विधवा पेंशन मिलती है और न ही बीपीएल कार्ड मिला।
खुले आसमान के नीचे गुजर रहा जीवन
ग्राम पंचायत अहरौली के दलित वर्ग के रामचंद्र कड़ेरे का परिवार भी मुफलिसी में जी रहा है। इस परिवार के लोग कच्ची झोपड़ी में रह रहे हैं। खुद रामचंद्र बीमार रहते हैं ऐसे में पत्नी भी मजदूरी नहीं कर पाती। घर की आजीविका के लिए झोपड़ी में ही कुछ सब्जियां रखकर रामचंद्र बेच देता है और उससे ही परिवार चलाता है। उसका एक पुत्र मेहनत मजदूरी करता है, जिसकी दो बेटियां (2) साल और पांच माह की हैं। बीपीएल राशनकार्ड भी नहीं बना है। रामचंद्र की कोई जनप्रतिनिधि, अधिकारी नहीं सुन रहा है। ग्राम प्रधान राजवती का कहना है कि उनकी ग्राम पंचायत में जो लोग खुले आसमान के नीचे रहते हैं, उन्हें छत मुहैया कराने को वह शासन प्रशासन के बीच कोशिश करेंगी।