{"_id":"66b79f63939a88fe8708e9ed","slug":"civil-case-made-criminal-complaint-canceled-etah-news-c-163-1-sagr1016-121127-2024-08-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Etah News: सिविल मामले को बना दिया आपराधिक, परिवाद निरस्त","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Etah News: सिविल मामले को बना दिया आपराधिक, परिवाद निरस्त
Sat, 10 Aug 2024 10:42 PM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
Updated Sat, 10 Aug 2024 10:42 PM IST
विज्ञापन
एटा। लेनदेन के सिविल प्रकृति के मामले को दबाव बनाने के लिए आपराधिक रूप दे दिया गया। अदालत में परिवाद दायर हुआ। सुनवाई के बाद अदालत ने विधिक प्रावधानों का दुरुपयोग बताते हुए परिवाद निरस्त कर दिया।
कोतवाली देहात क्षेत्र के गांव जिरसमी निवासी मोनू कुमार ने गांव के राजेश पचौरी आदि के विरुद्ध अदालत में परिवाद दर्ज कराया। बताया कि कमेटी पूरी होने पर अपनी 1.50 लाख रुपये की धनराशि मांगने राजेश के पास गया। उन्होंने गालियां देते हुए जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया। छत से ईंट-पत्थर मारना शुरू कर दिए। थाने और एसएसपी को दिए गए प्रार्थना पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
मामले की पूरी सुनवाई के बाद विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट वीरभद्र ने आदेश में कहा कि कमेटी के किसी भी अन्य सदस्य को साक्ष्य में परीक्षित नहीं कराया गया। दो ऐसे गवाह पेश किए गए जो न तो कमेटी के सदस्य हैं और न ही उनके सामने विवाद उत्पन्न हुआ। सुनवाई तथा मामले के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि रुपयों के लेनदेन के विवाद को तोड़-मरोड़कर आपराधिक स्वरूप दिया गया है। जबकि पूरा मामला सिविल प्रकृति (धन वसूली) का है। यह विधिक प्रावधानों के दुरुपयोग का मामला प्रतीत होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
कोतवाली देहात क्षेत्र के गांव जिरसमी निवासी मोनू कुमार ने गांव के राजेश पचौरी आदि के विरुद्ध अदालत में परिवाद दर्ज कराया। बताया कि कमेटी पूरी होने पर अपनी 1.50 लाख रुपये की धनराशि मांगने राजेश के पास गया। उन्होंने गालियां देते हुए जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया। छत से ईंट-पत्थर मारना शुरू कर दिए। थाने और एसएसपी को दिए गए प्रार्थना पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
विज्ञापन
मामले की पूरी सुनवाई के बाद विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट वीरभद्र ने आदेश में कहा कि कमेटी के किसी भी अन्य सदस्य को साक्ष्य में परीक्षित नहीं कराया गया। दो ऐसे गवाह पेश किए गए जो न तो कमेटी के सदस्य हैं और न ही उनके सामने विवाद उत्पन्न हुआ। सुनवाई तथा मामले के तथ्यों से स्पष्ट होता है कि रुपयों के लेनदेन के विवाद को तोड़-मरोड़कर आपराधिक स्वरूप दिया गया है। जबकि पूरा मामला सिविल प्रकृति (धन वसूली) का है। यह विधिक प्रावधानों के दुरुपयोग का मामला प्रतीत होता है।
विज्ञापन