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आठवीं के बाद छात्राओं को छोड़नी पड़ रही पढ़ाई
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एटा। ग्रामीण क्षेत्रों की बालिकाओं को अच्छी शिक्षा मुहैया कराकर उनका भाग्य चमकाने के लिए आठ कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय खोले गए, लेकिन एक दशक बाद भी इनका उच्चीकरण नहीं हुआ है। केवल कक्षा आठ तक की शिक्षा उपलब्ध है। गांवों में आगे की शिक्षा की सुविधा न होने पर उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ रही है।
बालिकों के भविष्य को देखते हुए तीन विद्यालयों में 12वीं तक की पढ़ाई की मंजूरी दी गई। इनमें जलेसर और निधौली कलां क्षेत्रों में स्थित विद्यालयों के हॉस्टल और शैक्षिक ब्लॉकों के निर्माण की जिम्मेदारी समाज कल्याण निर्माण निगम को दी गई। तीन वर्ष बीतने के बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है। वहीं सकीट के विद्यालय को उच्चीकरण कराने के लिए भवन निर्माण का कार्य राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा समिति (रमशा) को जिम्मेदारी दी गई।
इसने पैकफेड को निविदा के माध्यम से कार्य सौंप दिया। संस्था ने हॉस्टल और शिक्षण ब्लॉक का निर्माण कार्य तो पूरा कर दिया लेकिन अब तक हस्तांरित नहीं किया। जबकि 2020 में ही भवन सुपुर्द करना था। भवन बनने के बाद पिछले सत्र की बालिकाओं सहित कुल 100 एडमीशन भी हो गए, जो वर्तमान में इधर-उधर भटक रही हैं।
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केस 1: गांव समसपुर की प्रीति मारहरा के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में पढ़ी। उम्मीद थी किआठवीं करने तक विद्यालय का उच्चीकरण हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और 2019 में आठवीं पास करने के बाद उसे मजबूरी में पढ़ाई छोड़कर घर बैठना पड़ा।
केस 2: पिवारी की रहने वाली काजल आठवीं कक्षा में पढ़ती है। बताती है कि गांव से सरकारी विद्यालय आठ किमी दूर मारहरा में है। पिता किसान हैं, आर्थिक हालात ऐसे नहीं कि निजी विद्यालय की फीस का खर्चा उठा सकें। ऐसे में पढ़ाई छोड़नी ही पड़ेगी।
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बालिकों के भविष्य को देखते हुए तीन विद्यालयों में 12वीं तक की पढ़ाई की मंजूरी दी गई। इनमें जलेसर और निधौली कलां क्षेत्रों में स्थित विद्यालयों के हॉस्टल और शैक्षिक ब्लॉकों के निर्माण की जिम्मेदारी समाज कल्याण निर्माण निगम को दी गई। तीन वर्ष बीतने के बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका है। वहीं सकीट के विद्यालय को उच्चीकरण कराने के लिए भवन निर्माण का कार्य राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा समिति (रमशा) को जिम्मेदारी दी गई।
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इसने पैकफेड को निविदा के माध्यम से कार्य सौंप दिया। संस्था ने हॉस्टल और शिक्षण ब्लॉक का निर्माण कार्य तो पूरा कर दिया लेकिन अब तक हस्तांरित नहीं किया। जबकि 2020 में ही भवन सुपुर्द करना था। भवन बनने के बाद पिछले सत्र की बालिकाओं सहित कुल 100 एडमीशन भी हो गए, जो वर्तमान में इधर-उधर भटक रही हैं।
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केस 1: गांव समसपुर की प्रीति मारहरा के कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय में पढ़ी। उम्मीद थी किआठवीं करने तक विद्यालय का उच्चीकरण हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और 2019 में आठवीं पास करने के बाद उसे मजबूरी में पढ़ाई छोड़कर घर बैठना पड़ा।
केस 2: पिवारी की रहने वाली काजल आठवीं कक्षा में पढ़ती है। बताती है कि गांव से सरकारी विद्यालय आठ किमी दूर मारहरा में है। पिता किसान हैं, आर्थिक हालात ऐसे नहीं कि निजी विद्यालय की फीस का खर्चा उठा सकें। ऐसे में पढ़ाई छोड़नी ही पड़ेगी।