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बदला रंग, बदला ढंग, नहीं बदली अमिट स्याही
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बदला रंग, बदला ढंग, नहीं बदली अमिट स्याही
पहले चुनाव से लेकर अब तक हुए चुनावों में हो चुके कई बदलाव
ईवीएम आने के बाद मतपेटिकाएं गायब, मुहर का किस्सा भी खत्म
हाईटेक होते चुनाव आयोग को अब तक नही मिला स्याही का विकल्प
अमर उजाला ब्यूरो
एटा। लगातार प्रगति कर रहे देश के चुनावों में भी हर बार कुछ न कुछ बदलाव देखे गए हैं। जब देश तकनीक की ओर बढ़ रहा है तो चुनाव आयोग भी हाईटेक हो चला है। देश के पहले चुनाव से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल चुका है। मतपेटियों में वोट डालने का चलन खत्म हो गया है तो प्रचार प्रसार का तरीके में भी काफी बदलाव आया है। इन सबके बीच कोई जो अपना दबदबा कायम किए है तो वह है चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली अमिट स्याही। इसका उपयोग जबसे शुरू हुआ तब से यह आज तक कायम है। अब बिना इसके चुनाव संपन्न होने की कल्पना नहीं की जा सकती। फर्जी वोटिंग रोकने का इसे बड़ा हथियार माना जाता है।
देश में 1951-52 में जब पहली बार चुनाव हुए तब मतदान के लिए प्रत्याशियों के नाम की अलग अलग मतपेटियां हुआ करतीं थी। लोग अपने पंसदीदा प्रत्याशी के मतपेटी में अपना मत डाल देते थे। 1957 के चुनावों में भी लगभग यही प्रक्रिया रही।
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1962 से शुरू हुआ स्याही का उपयोग
चुनाव के दौरान मतदाताओं को लगाई जाने वाली स्याही का पहली बार इस्तेमाल तीसरे आम चुनाव 1962 में किया गया था। इससे पहले हुए चुनावों में स्याही का उपयोग नहीं किया गया था। तीसरे चुनाव में मतदाताओं की पहचान के लिए इसकी शुरूआत की गई थी, जिससे फर्जी वोटिंग न हो सके। इसके बाद से आज तक इस स्याही को लगाने का चलन चलता आ रहा है।
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1999 में आई ईवीएम
मतपेटिकाओं में मत डालने का फार्मूला चुनाव आयोग ने काफी दिन तक चलाया। 1999 के चुनाव में नया प्रयोग किया गया। मतगणना में अधिक समय खर्च होने के चलते ईवीएम लाई गई। इसमें मत डालने का तरीका काफी आसान था। अपने पसंदीदा प्रत्याशी के नाम के सामने लगी बटन को बस दबाना था और आपका मत डल जाता है। यह प्रक्रिया अब तक चल रही है। इस बदलाव के दौरान भी अमिट स्याही लगाने का सिलसिला जारी रहा।
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कुछ खास बातें
1. अमिट स्याही का इस्तेमाल पहली बार तीसरे आम चुनाव में 1962 में किया गया।
2. 1999 में ईवीएम आने पर भी इसका उपयोग जारी रहा।
3. इस अमिट स्याही को निर्वाचन आयोग ही उपलब्ध कराता है।
4. मतदान से पहले इसे मतदान अधिकारियों को सौंपा जाता है।
5. हर मतदान दल के पीठासीन अधिकारी को दी जाती एक शीशी।
6. लगभग 800 मतदाताओं को लगाई जा सकती है एक शीशी स्याही ।
7. जोनल अधिकारी के पास रहती है अतिरिक्त स्याही की शीशी।
8. मतदान समाप्त होने के बाद शीशी में स्याही बचने पर इसे निर्वाचन कार्यालय में जमा कराना होता है।
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पहले चुनाव से लेकर अब तक हुए चुनावों में हो चुके कई बदलाव
ईवीएम आने के बाद मतपेटिकाएं गायब, मुहर का किस्सा भी खत्म
हाईटेक होते चुनाव आयोग को अब तक नही मिला स्याही का विकल्प
अमर उजाला ब्यूरो
एटा। लगातार प्रगति कर रहे देश के चुनावों में भी हर बार कुछ न कुछ बदलाव देखे गए हैं। जब देश तकनीक की ओर बढ़ रहा है तो चुनाव आयोग भी हाईटेक हो चला है। देश के पहले चुनाव से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल चुका है। मतपेटियों में वोट डालने का चलन खत्म हो गया है तो प्रचार प्रसार का तरीके में भी काफी बदलाव आया है। इन सबके बीच कोई जो अपना दबदबा कायम किए है तो वह है चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली अमिट स्याही। इसका उपयोग जबसे शुरू हुआ तब से यह आज तक कायम है। अब बिना इसके चुनाव संपन्न होने की कल्पना नहीं की जा सकती। फर्जी वोटिंग रोकने का इसे बड़ा हथियार माना जाता है।
देश में 1951-52 में जब पहली बार चुनाव हुए तब मतदान के लिए प्रत्याशियों के नाम की अलग अलग मतपेटियां हुआ करतीं थी। लोग अपने पंसदीदा प्रत्याशी के मतपेटी में अपना मत डाल देते थे। 1957 के चुनावों में भी लगभग यही प्रक्रिया रही।
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1962 से शुरू हुआ स्याही का उपयोग
चुनाव के दौरान मतदाताओं को लगाई जाने वाली स्याही का पहली बार इस्तेमाल तीसरे आम चुनाव 1962 में किया गया था। इससे पहले हुए चुनावों में स्याही का उपयोग नहीं किया गया था। तीसरे चुनाव में मतदाताओं की पहचान के लिए इसकी शुरूआत की गई थी, जिससे फर्जी वोटिंग न हो सके। इसके बाद से आज तक इस स्याही को लगाने का चलन चलता आ रहा है।
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1999 में आई ईवीएम
मतपेटिकाओं में मत डालने का फार्मूला चुनाव आयोग ने काफी दिन तक चलाया। 1999 के चुनाव में नया प्रयोग किया गया। मतगणना में अधिक समय खर्च होने के चलते ईवीएम लाई गई। इसमें मत डालने का तरीका काफी आसान था। अपने पसंदीदा प्रत्याशी के नाम के सामने लगी बटन को बस दबाना था और आपका मत डल जाता है। यह प्रक्रिया अब तक चल रही है। इस बदलाव के दौरान भी अमिट स्याही लगाने का सिलसिला जारी रहा।
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कुछ खास बातें
1. अमिट स्याही का इस्तेमाल पहली बार तीसरे आम चुनाव में 1962 में किया गया।
2. 1999 में ईवीएम आने पर भी इसका उपयोग जारी रहा।
3. इस अमिट स्याही को निर्वाचन आयोग ही उपलब्ध कराता है।
4. मतदान से पहले इसे मतदान अधिकारियों को सौंपा जाता है।
5. हर मतदान दल के पीठासीन अधिकारी को दी जाती एक शीशी।
6. लगभग 800 मतदाताओं को लगाई जा सकती है एक शीशी स्याही ।
7. जोनल अधिकारी के पास रहती है अतिरिक्त स्याही की शीशी।
8. मतदान समाप्त होने के बाद शीशी में स्याही बचने पर इसे निर्वाचन कार्यालय में जमा कराना होता है।