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आचरण, स्वभाव, प्रवृत्ति ग्रहों से प्रभावित
Fri, 03 May 2019 12:50 AM IST
राकेश पांडेय
deoria
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Published by: राकेश पांडेय
Updated Fri, 03 May 2019 12:50 AM IST
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कार्यक्रम में मौजूद लोग।
- फोटो : amar ujala
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देवरिया। ज्योतिष विभाग बीएचयू के प्रो. डॉ. सुभाष पांडेय ने कहा कि ग्रहों का स्वरूप और स्वभाव दोनों ही कहीं न कहीं मनुष्य के स्वरूप और स्वभाव के पूरक हैं। हमारा आचरण, स्वभाव व प्रवृत्ति निश्चित ही ग्रहों से प्रभावित है। ज्योतिषीय सूत्रों के आधार पर यदि हम जातक की कुंडली से फल का आदेश करें तो किसी भी प्रकार का अंतर देखने को नहीं मिलेगा। किंतु शास्त्रगत सूत्रों का मूल्यांकन होना आवश्यक है। वह श्री बैकुंठनाथ पवहारी संस्कृत महाविद्यालय बैकुंठपुर में ऋषि भारद्वाज ज्योतिषानुसंधान व जनकल्याण केंद्र की ओर से आयोजित 15 दिवसीय ज्यातिष-वास्तु-कर्मकांड विषयक कार्यशाला में बोल रहे थे।
डॉ. पांडेय ने बताया कि फलादेश के क्रम में 10 प्रमुख नियमों को जानना प्रत्येक ज्योतिषी के लिए आवश्यक है, ग्रहों के उच्च, नीच का विचार, मित्र, सम, शत्रु का विचार व भाव से विचारणीय विषय को ध्यान में रखना प्रमुख है। फल ज्ञान में ग्रहों की दृष्टि व स्थिति दोनों का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर सीधा देखने को मिलता है। चिकित्सा ज्योतिष के माध्यम से आज हम समय से पूर्व रोग का ज्ञान कर सकते हैं व समयानुसार ज्ञान हो जाने पर उस रोग के जनित कारक ग्रह का वेद विहित निदान के द्वारा उस जातक को असाध्यता से बचाया जा सकता है। चिकित्सा ज्योतिष के माध्यम से व्यक्ति को असामयिक मृत्यु से बचाया जा सकता है, शास्त्र रक्षक का कार्य करता है, भक्षक का नहीं। ज्योतिष में तीन विधान उपचार पक्ष में प्रमाणित हैं मणि, मंत्र व औषधि का प्रयोग कर जातक को शुभता की तरफ भेजा जा सकता है। उन्होंने कहा कि रत्न धारण करते समय सावधानी की आवश्यकता है। आजकल के ज्योतिषी दशा, अंतर्दशा देखकर ही रत्न धारण करने को बताते हैं जो शास्त्र सम्मत नहीं है। रत्न धारण लग्नेश, पंचमेश, भाग्येश व दशमेश की स्थिति के हिसाब से धारण कराना ही शुभ कारक होता है। कार्यशाला संयोजक विवेक कुमार उपाध्याय ने डॉ. पांडेय को स्मृति चिह्न प्रदान कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस दौरान डॉ. युगुल किशोर तिवारी, आचार्य ओंकार नाथ पांडेय, डॉ. अजय शुक्ल, सौरभ श्रीवास्तव, रवि प्रकाश मिश्र, उमेश शाही, रवि मधुसूदन चौरसिया, नरेंद्र देव शुक्ल, डॉ वंदना सिंह, डॉ. मदन मोहन पुरोहित आदि मौजूद रहे।
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डॉ. पांडेय ने बताया कि फलादेश के क्रम में 10 प्रमुख नियमों को जानना प्रत्येक ज्योतिषी के लिए आवश्यक है, ग्रहों के उच्च, नीच का विचार, मित्र, सम, शत्रु का विचार व भाव से विचारणीय विषय को ध्यान में रखना प्रमुख है। फल ज्ञान में ग्रहों की दृष्टि व स्थिति दोनों का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर सीधा देखने को मिलता है। चिकित्सा ज्योतिष के माध्यम से आज हम समय से पूर्व रोग का ज्ञान कर सकते हैं व समयानुसार ज्ञान हो जाने पर उस रोग के जनित कारक ग्रह का वेद विहित निदान के द्वारा उस जातक को असाध्यता से बचाया जा सकता है। चिकित्सा ज्योतिष के माध्यम से व्यक्ति को असामयिक मृत्यु से बचाया जा सकता है, शास्त्र रक्षक का कार्य करता है, भक्षक का नहीं। ज्योतिष में तीन विधान उपचार पक्ष में प्रमाणित हैं मणि, मंत्र व औषधि का प्रयोग कर जातक को शुभता की तरफ भेजा जा सकता है। उन्होंने कहा कि रत्न धारण करते समय सावधानी की आवश्यकता है। आजकल के ज्योतिषी दशा, अंतर्दशा देखकर ही रत्न धारण करने को बताते हैं जो शास्त्र सम्मत नहीं है। रत्न धारण लग्नेश, पंचमेश, भाग्येश व दशमेश की स्थिति के हिसाब से धारण कराना ही शुभ कारक होता है। कार्यशाला संयोजक विवेक कुमार उपाध्याय ने डॉ. पांडेय को स्मृति चिह्न प्रदान कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस दौरान डॉ. युगुल किशोर तिवारी, आचार्य ओंकार नाथ पांडेय, डॉ. अजय शुक्ल, सौरभ श्रीवास्तव, रवि प्रकाश मिश्र, उमेश शाही, रवि मधुसूदन चौरसिया, नरेंद्र देव शुक्ल, डॉ वंदना सिंह, डॉ. मदन मोहन पुरोहित आदि मौजूद रहे।
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