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सीबीएसई स्कूलों में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें
Deoria
Updated Wed, 17 Apr 2013 05:30 AM IST
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देवरिया। अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में बच्चाें को पढ़ा रहे अभिभावकों को महंगाई की मार सर्वाधिक झेलनी पड़ रही है। मौजूदा शैक्षणिक सत्र में ऐसे स्कूलों ने बच्चों की ट्यूशन फीस में 5 से 10 प्रतिशत तक वृद्धि कर दी है, वहीं किताबों पर भी 10 से 20 फीसदी तक अधिक खर्च करना पड़ रहा है। इससे सामान्य वर्ग के अभिभावकों पर बच्चों की पढ़ाई भारी पड़ जा रही है।
शहर में संचालित 12 से अधिक अंग्रेजी मीडियम सीबीएसई स्कूलों में एनसीईआरटी की बजाय प्राइवेट प्रकाशन की पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं। कोई बच्चा पुरानी पुस्तकों का प्रयोग न कर सके, इसलिए प्रत्यके वर्ष प्रकाशन या कोर्स बदल दिया जाता है। इस बार अधिकांश सीबीएसई विद्यालयों में लागू किया गया कोर्स नया है लेकिन प्रकाशक पुराना। ऐसे में किताबों के दाम गत वर्ष के मुकाबले 10 से 20 प्रतिशत बढ़े हैं। कॉपियों के मामले में विद्यालय ही लाभ की स्थिति में हैं। किताब दुकानदारों ने विद्यालयों के नाम वाली कॉपियां बिक्री के लिए रखी हैं। इनके दाम लागत से अधिक वसूले जा रहे हैं। सलेमपुर रोड स्थित सोनूघाट में चल रहे एक कान्वेंट स्कूल में कक्षा एक के बच्चों के कोर्स पर 3,000 से 4,000 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। किताबों की कीमत कक्षावार बढ़ती जाती है। यही हाल ओवरब्रिज के पास के कान्वेंट विद्यालय का है। यहां बच्चों की ट्यूशन फीस में बढ़ोत्तरी से आम लोगों के लिए यहां बच्चों का एडमिशन कराना मुश्किल होता है। जेल के पास स्थित कान्वेंट विद्यालय में कुछ किताबें एनसीईआरटी की हैं लेकिन कई ऐसी किताबें प्राइवेट प्रकाशन की लगाई गई है, जिनका मूल्य काफी अधिक है।
विवाद निस्तारण समिति गठित नहीं ः पब्लिक स्कूलों और अन्य शिक्षण संस्थाओं में अभिभावकों व छात्रों का आर्थिक शोषण रोकने और मनमानी फीस वसूली पर अंकुश के लिए उच्च न्यायालय ने सरकार को जिला स्तर पर शैक्षिक विवाद निस्तारण समिति गठन का निर्देश दिया है लेकिन आदेश के सात वर्ष बाद भी आज तक जिले में समिति का गठन नहीं हुआ।
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अधिकांश किताबें एनसीईआरटी की हैं ः जेल रोड के पास स्थित सेंट्रल विद्यालय के प्रधानाचार्य कहते हैं कि मेरे यहां अधिकांश पुस्तकें एनसीईआरटी की ही चलती हैं। कुछ किताबें प्राइवेट प्रकाशन की लगाई गई हैं। ये वही किताबें हैं जो एनसीईआरटी प्रकाशन से नहीं मिलती हैं। इतना तो संस्था को अधिकार है कि वह अपने विवेक से जो अच्छे प्रकाशन हैं, उनकी किताबों को चलाए।
सुलभ न होने के चलते प्राइवेट किताबें चलती हैं ः सीसी रोड पर चल रहे एक कान्वेंट विद्यालय के संचालक का कहना है कि मेरे यहां कई किताबों एनसीईआरटी की हैं। एनसीईआरटी की जो किताबें मार्केट में नहीं उपलब्ब्ध हो पाती हैं उसकी जगह ही अन्य प्रकाशन किताबें पढ़ाई जा रही हैं। जो किताबें चल रही हैं वह इतनी महंगी नहीं हैं कि अभिभावकों पर बोझ बढ़े।
मान्यता सीबीएसई की और किताबें प्राइवेट
शहर में करीब छह विद्यालयों ने सीबीएसई बोर्ड से मान्यता लेकर पढ़ाई शुरू की है। अच्छी शिक्षा के नाम पर यहां अभिभावकों को बच्चों का नामांकन कराने में पसीने बहाने पड़ते हैं। इसके बाद जब किताबों की लिस्ट मिलती है तो उनकी दिक्कतें और बढ़ जाती हैं। अधिकांश विद्यालयों में सीबीएसई की मान्यता के बाद भी एनसीईआरटी की किताबें न चलाकर प्राइवेट प्रकाशन की किताबें चलाई जा रही हैं। ये किताबें काफी महंगी पड़ रही हैं। बेहतर शिक्षा के नाम पर अभिभावक सब कुछ जानते हुए भी महंगी किताबें खरीदने को बाध्य होते हैं।]
अभिभावक बोले
विद्यालय के कानून में बंधना मजबूरी
उमानगर के सेवानिवृत्त शिक्षक पारस मणि कहते हैं कि विद्यालयों में प्रतिस्पर्धा चल रही है। अभिभावक अपने बच्चों को अच्छे विद्यालयों में पढ़ाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में उनके पास पहले तो एडमिशन की मजबूरी होती है। एडमिशन होने के बाद विद्यालय के नियम व कानून भले ही कठिन व मुश्किल होते हैं, उसके नियम में बंधना पड़ता है। विद्यालय जो किताबें कहेगा, उस किताब को खरीदना जरूरी है। कानून की बात करने पर बच्चों का नाम काटने की भी संचालक धमकी देने लगते हैं। इसकी वजह से सब कुछ जानकर चुप रहना पड़ता है।
पाठ्यक्रम बदलने से दिक्कतें होती हैं
देवरिया खास निवासी किरण यादव कहती हैं कि वह गांव से आकर शहर में बच्चों को पढ़ा रही हैं। परिवार का आय 10 हजार है लेकि न बच्चों की पढ़ाई पर 15 हजार मासिक खर्च आ रहा है। तीन बच्चे हैं। तीनों कान्वेंट में पढ़ते हैं। हर साल किताबें व पाठ्यक्रम बदलने के चलते सभी बच्चों के लिए हर साल नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं। पुरानी किताबें रद्दी हो जाती हैं। यदि किताबें नहीं बदलतीं तो शिक्षण सत्र की शुरूआत में तीन से चार हजार की बचत हो जाती।
प्रिंसिपल बोले
कठिन पाठ्यक्रम की किताबें चलती हैं
सोनूघाट स्थित एक कान्वेंट विद्यालय के प्रधानाचार्य ने बताया उनके यहां सीबीएसई बोर्ड की मान्यता है। जो किताबें उनके यहां चलती हैं वह कठिन पाठ्यक्रम की किताबें हैं। आज कल लोग पैसे की तरफ नहीं जा रहे हैं। उन्हें हार्ड कोर्स चाहिए। इसकी वजह से जो किताबेें वे चलाते हैं वह एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के आधार पर हैं लेकिन उनका पाठ्यक्रम ठीक है।
सभी किताबें एनसीईआरटी की हैं
ओवरब्रिज के पास स्थित एक कान्वेंट विद्यालय की प्रधानाचार्य कहती हैं कि यहां जो भी किताबें चलती हैं, एनसीईआरटी प्रकाशन की चलाई जाती हैं। हालांकि मार्केट में एनसीईआरटी की किताबें पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं फिर छात्रों को इसे समय से उपलब्ध करा दिया जाता है। एनसीईआरटी की किताबों का मूल्य भी अन्य प्रकाशनों से कम होने के चलते अभिभावकों पर बोझ कम पड़ता है।
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शहर में संचालित 12 से अधिक अंग्रेजी मीडियम सीबीएसई स्कूलों में एनसीईआरटी की बजाय प्राइवेट प्रकाशन की पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं। कोई बच्चा पुरानी पुस्तकों का प्रयोग न कर सके, इसलिए प्रत्यके वर्ष प्रकाशन या कोर्स बदल दिया जाता है। इस बार अधिकांश सीबीएसई विद्यालयों में लागू किया गया कोर्स नया है लेकिन प्रकाशक पुराना। ऐसे में किताबों के दाम गत वर्ष के मुकाबले 10 से 20 प्रतिशत बढ़े हैं। कॉपियों के मामले में विद्यालय ही लाभ की स्थिति में हैं। किताब दुकानदारों ने विद्यालयों के नाम वाली कॉपियां बिक्री के लिए रखी हैं। इनके दाम लागत से अधिक वसूले जा रहे हैं। सलेमपुर रोड स्थित सोनूघाट में चल रहे एक कान्वेंट स्कूल में कक्षा एक के बच्चों के कोर्स पर 3,000 से 4,000 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। किताबों की कीमत कक्षावार बढ़ती जाती है। यही हाल ओवरब्रिज के पास के कान्वेंट विद्यालय का है। यहां बच्चों की ट्यूशन फीस में बढ़ोत्तरी से आम लोगों के लिए यहां बच्चों का एडमिशन कराना मुश्किल होता है। जेल के पास स्थित कान्वेंट विद्यालय में कुछ किताबें एनसीईआरटी की हैं लेकिन कई ऐसी किताबें प्राइवेट प्रकाशन की लगाई गई है, जिनका मूल्य काफी अधिक है।
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विवाद निस्तारण समिति गठित नहीं ः पब्लिक स्कूलों और अन्य शिक्षण संस्थाओं में अभिभावकों व छात्रों का आर्थिक शोषण रोकने और मनमानी फीस वसूली पर अंकुश के लिए उच्च न्यायालय ने सरकार को जिला स्तर पर शैक्षिक विवाद निस्तारण समिति गठन का निर्देश दिया है लेकिन आदेश के सात वर्ष बाद भी आज तक जिले में समिति का गठन नहीं हुआ।
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अधिकांश किताबें एनसीईआरटी की हैं ः जेल रोड के पास स्थित सेंट्रल विद्यालय के प्रधानाचार्य कहते हैं कि मेरे यहां अधिकांश पुस्तकें एनसीईआरटी की ही चलती हैं। कुछ किताबें प्राइवेट प्रकाशन की लगाई गई हैं। ये वही किताबें हैं जो एनसीईआरटी प्रकाशन से नहीं मिलती हैं। इतना तो संस्था को अधिकार है कि वह अपने विवेक से जो अच्छे प्रकाशन हैं, उनकी किताबों को चलाए।
सुलभ न होने के चलते प्राइवेट किताबें चलती हैं ः सीसी रोड पर चल रहे एक कान्वेंट विद्यालय के संचालक का कहना है कि मेरे यहां कई किताबों एनसीईआरटी की हैं। एनसीईआरटी की जो किताबें मार्केट में नहीं उपलब्ब्ध हो पाती हैं उसकी जगह ही अन्य प्रकाशन किताबें पढ़ाई जा रही हैं। जो किताबें चल रही हैं वह इतनी महंगी नहीं हैं कि अभिभावकों पर बोझ बढ़े।
मान्यता सीबीएसई की और किताबें प्राइवेट
शहर में करीब छह विद्यालयों ने सीबीएसई बोर्ड से मान्यता लेकर पढ़ाई शुरू की है। अच्छी शिक्षा के नाम पर यहां अभिभावकों को बच्चों का नामांकन कराने में पसीने बहाने पड़ते हैं। इसके बाद जब किताबों की लिस्ट मिलती है तो उनकी दिक्कतें और बढ़ जाती हैं। अधिकांश विद्यालयों में सीबीएसई की मान्यता के बाद भी एनसीईआरटी की किताबें न चलाकर प्राइवेट प्रकाशन की किताबें चलाई जा रही हैं। ये किताबें काफी महंगी पड़ रही हैं। बेहतर शिक्षा के नाम पर अभिभावक सब कुछ जानते हुए भी महंगी किताबें खरीदने को बाध्य होते हैं।]
अभिभावक बोले
विद्यालय के कानून में बंधना मजबूरी
उमानगर के सेवानिवृत्त शिक्षक पारस मणि कहते हैं कि विद्यालयों में प्रतिस्पर्धा चल रही है। अभिभावक अपने बच्चों को अच्छे विद्यालयों में पढ़ाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में उनके पास पहले तो एडमिशन की मजबूरी होती है। एडमिशन होने के बाद विद्यालय के नियम व कानून भले ही कठिन व मुश्किल होते हैं, उसके नियम में बंधना पड़ता है। विद्यालय जो किताबें कहेगा, उस किताब को खरीदना जरूरी है। कानून की बात करने पर बच्चों का नाम काटने की भी संचालक धमकी देने लगते हैं। इसकी वजह से सब कुछ जानकर चुप रहना पड़ता है।
पाठ्यक्रम बदलने से दिक्कतें होती हैं
देवरिया खास निवासी किरण यादव कहती हैं कि वह गांव से आकर शहर में बच्चों को पढ़ा रही हैं। परिवार का आय 10 हजार है लेकि न बच्चों की पढ़ाई पर 15 हजार मासिक खर्च आ रहा है। तीन बच्चे हैं। तीनों कान्वेंट में पढ़ते हैं। हर साल किताबें व पाठ्यक्रम बदलने के चलते सभी बच्चों के लिए हर साल नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं। पुरानी किताबें रद्दी हो जाती हैं। यदि किताबें नहीं बदलतीं तो शिक्षण सत्र की शुरूआत में तीन से चार हजार की बचत हो जाती।
प्रिंसिपल बोले
कठिन पाठ्यक्रम की किताबें चलती हैं
सोनूघाट स्थित एक कान्वेंट विद्यालय के प्रधानाचार्य ने बताया उनके यहां सीबीएसई बोर्ड की मान्यता है। जो किताबें उनके यहां चलती हैं वह कठिन पाठ्यक्रम की किताबें हैं। आज कल लोग पैसे की तरफ नहीं जा रहे हैं। उन्हें हार्ड कोर्स चाहिए। इसकी वजह से जो किताबेें वे चलाते हैं वह एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के आधार पर हैं लेकिन उनका पाठ्यक्रम ठीक है।
सभी किताबें एनसीईआरटी की हैं
ओवरब्रिज के पास स्थित एक कान्वेंट विद्यालय की प्रधानाचार्य कहती हैं कि यहां जो भी किताबें चलती हैं, एनसीईआरटी प्रकाशन की चलाई जाती हैं। हालांकि मार्केट में एनसीईआरटी की किताबें पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं फिर छात्रों को इसे समय से उपलब्ध करा दिया जाता है। एनसीईआरटी की किताबों का मूल्य भी अन्य प्रकाशनों से कम होने के चलते अभिभावकों पर बोझ कम पड़ता है।