जीवित प्रमाणपत्र जमा करने में बड़ी दुर्दशा है साहब...

Deoria Updated Tue, 20 Nov 2012 12:00 PM IST
देवरिया। हिलते, कांपते, हाथ में छड़ी और पोते-पोतियों का कंधा पकड़ ट्रेजरी कार्यालय हर रोज उम्र के अंतिम पड़ाव पर चल रहे पेंशनर दस्तक दे रहे हैं। यहां उन्हें अपने जिंदा होने का प्रमाण देने की मजबूरी है। कार्यालय के बाबू को दिखाना पड़ता है कि सांस ले रहे हैं, पैरों पर खड़े है, बैंक को पेंशन की राशि जो भेजी जाती है हम ही आहरित करते हैं ...। ऐसा नहीं हुआ तो दिसंबर माह का पेंशन उन्हें नहीं मिल सकता।
शुक्रवार को भी कलेक्ट्रेट स्थित जिला कोषागार में ये नजारे देखने को मिला। बुजुर्गों का सम्मान सब लोग करते हैं लेकिन यहां पर कोई किसी को नहीं पूछता है। आप कितना भी बड़ा अफसर ही क्यों न रहे हों लेकिन बाबू के काउंटर तक पहुंच जल्द से जल्द दस्तखत कराने के लिए गिड़गिड़ाना ही पड़ता है। फरमान जारी करने वाले अधिकारी और बाबू यह अपने को कभी नहीं सोचते की हमें भी रिटायर होने के बाद पेंशन के लिए इसी तरह ट्रेजरी तक अपने बेटे पोतों के साथ दस्तक देना पड़ेगा। कार्यालय के बाहर बेंच पर खड़े होकर बड़ी संख्या में बुजुर्ग फार्म (आठ) एक भरते हैं। कार्यालय में बैठा बाबू बुजुर्गों को ऊपर से नीचे तक देखता है तब मानता है कि पेंशनर जिंदा है। एक हस्ताक्षर, मुहर और बस साबित हो गया कि सामने खड़े बुजुर्ग जीवित हैं। पिछले माह बैंक पर जाकर पेंशन लिया है। यह जीवित होने का कोई प्रमाण नहीं है। सबसे बड़ी दिक्कत तो फार्म लेने और जमा करने के दौरान धक्का-मुक्की में अंदर संकरे रास्ते से बाबू तक पहुंचने की होती है। इन बुजुर्गों को सरकार के इस निर्मम व्यवस्था के सामने जीवित होने का प्रमाण देना पड़ रहा है। जबकि यह नियम है कि सरकारी विभागों के वे अधिकारी जिनका ट्रेजरी में हस्ताक्षर प्रमाणित है या संबन्धित बैंक फॉर्म लेकर स्वयं ट्रेजरी को भेज देते तो इन वृद्धों को परेशानियों का सामना कर ट्रेजरी नहीं आना पड़ता। जिला कोषागार आए इन वरिष्ठ नागरिकों से अमर उजाला ने बात की तो उनका दर्द छलक पड़ा। सरकार की इस व्यवस्था पर उन्होंने नाराजगी जताई। कईयों ने कहा कि आदेश को बनाने वाले खुद कभी इसके शिकार होंगे। उन्हें भी अपने आने वाला समय का ध्यान देना चाहिए। इस उम्र में ट्रेजरी तक कैसे पहुंचे हैं यह आप खुद देख रहे हैं। साठ वर्ष तक काम करने में इतनी तकलीफ नहीं हुई जो आज पेंशन लेने के लिए हो रहा है।
सरकार खुद कराए जांच
प्लानिंग विभाग में रहे सजांव निवासी 95 वर्षीय राम विलास दुबे कहते हैं कि सरकार हमसे ही क्यों जिंदा होने का प्रमाण मांग रही है। उन्हें तो अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से खुद जांच करा लेनी चाहिए कि ये पेंशनर जिंदा है कि नहीं। आज इतना कष्ट हो रहा है कि पेट का सवाल नहीं होता तो हम यहां नहीं आते। सरकार को हम लोगों के बारे में सोचना चाहिए।
बैंक नहीं भेजता है प्रमाणपत्र
अकटहवां रुद्रपुर के बाल बिहारी पांडेय कहते हैं कि मैं पापा को हर साल लेकर आता हूं। बीमारी और शारीरिक कमजोरी की वजह से चल नहीं पाते हैं। इस वजह से उन्हें यहां तक आने में काफी तकलीफ होती है। इसके लिए हमें खुद अपना घर का काम छोड़कर आना पड़ता है। बैंक से भी जीवित प्रमाणपत्र देने की सुविधा है लेकिन बैंक भेजता ही नहीं है।
रो पड़ी फौजी की पत्नी
महावल मठिया निवासी 84 वर्षीय सुनरी अपनी पतोहू के संग जीवित प्रमाणपत्र दाखिल करने आईं हैं। वह पति के बारे में पूछने पर रो पड़ीं। कहतीं हैं कि पति राम जनम फौज में थे। वे कितने दुश्मनों को मार दिए। आज हमें पेंशन पाने के लिए खुद को जीवित होने का प्रमाण देने यहां तक आना पड़ रहा है। सरकार को इसकी जांच खुद करा लेनी चाहिए।
500 रुपये हो जाता है खर्च
अहिरौली निवासी 98 वर्षीय सहबजादी न चल पातीं हैं और न ही बोल पा रहीं हैं। उसकी पोती गुड़िया उसे किसी तरह ट्रेजरी लेकर आईं हैं। वह कहती हैं कि हमारे बाबा एनसीसी में अफसर थे। उनके मरने के बाद दादी को पेंशन मिलता है। पिछले तीन साल से हम खुद लेकर आ रहेे हैं। घर में दूसरा कोई नहीं है कि लेकर आए। ले आने और ले जाने में 500 रुपये खर्च हो जाता है।
ठंड में ही होना पड़ता है परेशान
कुंडौली निवासी भगवान प्रसाद सिंचाई विभाग में अधिकारी रहे हैं। वे कहते हैं कि जीवित प्रमाणपत्र जमा करने में बड़ी दुर्दशा है। ठंड के समय में ही यह प्रमाणपत्र हर साल लिया जाता है। इसके चलते आने जाने में परेशानियां बढ़ जाती हंै। या तो इसे किसी और मौसम में कराया जाए या फिर सरकार को खुद अधिनस्थ अधिकारियों से इसका सत्यापन करा लेना चाहिए।
सरकार के नियम का पालन किया जाता है। वैसे तो सभी बैंकों को यह निर्देश दिया गया है कि वे खुद पेंशनरों से जीवित प्रमाणपत्र लेकर ट्रेजरी को भेजें लेकिन बैंक ऐसा नहीं करते। इसके अलावा 84 विभागों के अधिकारियों का हस्ताक्षर ट्रेजरी में प्रमाणित है यदि वे भी चाहें तो अपने स्तर से अपने विभाग के कर्मचारियों का जीवित प्रमाणपत्र अपने हस्ताक्षर से कार्यालय के माध्यम से भेजवा सकते हैं लेकिन कोई भी ऐसा नहीं करता है। बुजुर्ग पेंशनरों को सुविधा दी जाती है कर्मचारी या मैं स्वयं बाहर जाकर हस्ताक्षर प्रमाणित करता हूं। वरिष्ठ नागरिकों को हर स्तर से सुविधा दी जाती है।
द्वारिकाधीश मिश्र, वरिष्ठ कोषाधिकारी देवरिया





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