{"_id":"5b1028be4f1c1ba66e8b586d","slug":"61527785662-deoria-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"सात वर्षों से अशोक रहते हैं रोजा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सात वर्षों से अशोक रहते हैं रोजा
Updated Thu, 31 May 2018 10:43 PM IST
विज्ञापन
रोजा रखने वाले अशोक कुशवाहा।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बरियारपुर। जाति-धर्म के नाम पर बंटते समाज में लाहिलपार निवासी अशोक कुशवाहा सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं। मुस्लिम बंधुओं की तरह ही वह भी रमजान में पूरी अकीदत से रोजा रखकर इबादत कर रहे हैं। ऐसी ही श्रद्धा उनकी नवरात्र और हिंदू त्योहारों के प्रति भी है। बकौल अशोक, हर धर्म प्रेम-सौहार्द का संदेश देता है। रोजा उनकी आस्था से जुड़ा है।
देवरिया ब्लॉक के लाहिलपार गांव निवासी अशोक कुशवाहा के गांव में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग रहते हैं। अशोक के मुताबिक सात साल पहले तबियत बहुत खराब हो गई थी। तब काफी उपचार कराया। डॉक्टर और ओझा सबको दिखाया, मगर राहत नहीं मिली। बाद में दोस्त फैयाज अंसारी की सलाह पर फैजाबाद स्थित बाबा मखदूम के दरबार किछौछा शरीफ गया तो राहत मिली। इसके बाद से ही उनकी आस्था हिंदू धर्म के समान ही मुस्लिम धर्म में भी बन गई। तभी से रमजान के पवित्र माह में रोजा रखना शुरू किया। सात वर्षों से यह सिलसिला निरंतर जारी है। आम रोजेदारों की तरह सुबह सेहरी और शाम को इफ्तार करता हूं। ईद, बकरीद, मुहर्रम भी मनाता हूं। उन्होंने बताया कि जिस ईमानदारी और पवित्रता के साथ रमजान में रोजा रखते हैं उसी प्रकार नवरात्र में भी नौ दिनों का व्रत रखकर मां दुर्गा की आराधना करते हैं। लाहिलपार मस्जिद के मौलाना हसमुद्दीन बताते हैं कि अशोक कुशवाहा हिंदू-मुस्लिम एकता के मिसाल हैं। ऐसे लोगों के प्रयासों की बदौलत ही क्षेत्र में सामाजिक सद्भाव मजबूत है।
विज्ञापन
देवरिया ब्लॉक के लाहिलपार गांव निवासी अशोक कुशवाहा के गांव में हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग रहते हैं। अशोक के मुताबिक सात साल पहले तबियत बहुत खराब हो गई थी। तब काफी उपचार कराया। डॉक्टर और ओझा सबको दिखाया, मगर राहत नहीं मिली। बाद में दोस्त फैयाज अंसारी की सलाह पर फैजाबाद स्थित बाबा मखदूम के दरबार किछौछा शरीफ गया तो राहत मिली। इसके बाद से ही उनकी आस्था हिंदू धर्म के समान ही मुस्लिम धर्म में भी बन गई। तभी से रमजान के पवित्र माह में रोजा रखना शुरू किया। सात वर्षों से यह सिलसिला निरंतर जारी है। आम रोजेदारों की तरह सुबह सेहरी और शाम को इफ्तार करता हूं। ईद, बकरीद, मुहर्रम भी मनाता हूं। उन्होंने बताया कि जिस ईमानदारी और पवित्रता के साथ रमजान में रोजा रखते हैं उसी प्रकार नवरात्र में भी नौ दिनों का व्रत रखकर मां दुर्गा की आराधना करते हैं। लाहिलपार मस्जिद के मौलाना हसमुद्दीन बताते हैं कि अशोक कुशवाहा हिंदू-मुस्लिम एकता के मिसाल हैं। ऐसे लोगों के प्रयासों की बदौलत ही क्षेत्र में सामाजिक सद्भाव मजबूत है।
विज्ञापन