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नहीं रहे रुद्रपुर के ‘फिराक’ लालजी
Updated Thu, 09 Nov 2017 10:54 PM IST
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पूर्व प्रधानाचार्य स्वर्गीय लालजी सिंह की फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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रुद्रपुर। ‘पकड़ लो बांह मेरी लड़खड़ा रहा हूं मै, तेरी तलाश में लुत्फ उठा रहा हूं मै, दर्द के पल हैं, या हैं खुशी के ये आंसू, इन्हें लूटाकर आराम पा रहा हूं मैं।’ इन लाइनों को उम्र के अंतिम पड़ाव पर ‘रुद्रपुर के फिराक’ कहे जाने वाले बाबू लालजी सिंह ने लिपिबद्ध किया था। मदनमोहन मालवीय इंटर कॉलेज भाटपाररानी के पूर्व प्रधानाचार्य, कवि और आलोचक बाबू लालजी सिंह का गुरुवार को तड़के सुबह पांच बजे हृदयगति रुकने से निधन हो गया। वह 85 वर्ष के थे।
भाजपा नेता बंधू उपेंद्र नाथ सिंह के पिता लालजी सिंह शिक्षा जगत की महान शख्सियत थे। रुद्रपुर क्षेत्र के ग्राम हौली बलिया के रहने वाले सिंह ने शिक्षक, लेखक, कवि और आलोचक के रूप में वर्षों तक शिक्षा जगत की सेवा की। वह प्राचीन इतिहास पढ़ाते थे, हिंदी में कविता और कहानी लिखते थे, उर्दू में शायरी की और अंग्रेजी के अच्छे समालोचक रहे। इसलिए उन्हें ‘रुद्रपुर के दोआबा का फिराक’ कहा गया। बाबू लालजी सिंह ने पैतृक गांव हौली बलिया में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर लगते ही दरवाजे पर सैकड़ों लोगों की भीड़ उमड़ गई। शिक्षा, संस्कृति और राजनीति से जुड़े लोगों का अंतिम दर्शन को हुजूम उमड़ पड़ा। अंतिम संस्कार करहकोल घाट के गोर्रा नदी के तट पर किया गया। लालजी सिंह ने अपने पीछे छह बेटों का भरा पूरा परिवार छोड़कर गए हैं।
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भाजपा नेता बंधू उपेंद्र नाथ सिंह के पिता लालजी सिंह शिक्षा जगत की महान शख्सियत थे। रुद्रपुर क्षेत्र के ग्राम हौली बलिया के रहने वाले सिंह ने शिक्षक, लेखक, कवि और आलोचक के रूप में वर्षों तक शिक्षा जगत की सेवा की। वह प्राचीन इतिहास पढ़ाते थे, हिंदी में कविता और कहानी लिखते थे, उर्दू में शायरी की और अंग्रेजी के अच्छे समालोचक रहे। इसलिए उन्हें ‘रुद्रपुर के दोआबा का फिराक’ कहा गया। बाबू लालजी सिंह ने पैतृक गांव हौली बलिया में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर लगते ही दरवाजे पर सैकड़ों लोगों की भीड़ उमड़ गई। शिक्षा, संस्कृति और राजनीति से जुड़े लोगों का अंतिम दर्शन को हुजूम उमड़ पड़ा। अंतिम संस्कार करहकोल घाट के गोर्रा नदी के तट पर किया गया। लालजी सिंह ने अपने पीछे छह बेटों का भरा पूरा परिवार छोड़कर गए हैं।
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