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आपदा की मार से कराह रहे दोआबा के किसान
Updated Mon, 04 Sep 2017 11:44 PM IST
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सुरेंद्र वत्स
रुद्रपुर। लगातार तीन साल से आपदा की मार झेल से किसानों की इस बार बाढ़ ने कमर तोड़ दी है। पहले ओलावृष्टि, सूखा और आग का कहर झेल चुके हजारों किसानों को बाढ़ ने कहीं का नहीं छोड़ा। कर्ज के बोझ तले दबे किसानों का बाढ़ ने सिर से छत और मुंह का निवाला छीन लिया। सरकारी आंकड़ें के अनुसार दोआबा के किसानों की बाढ़ से 7246 हेक्टेयर धान और मक्के की फसल बर्बाद हुई है।
दोआबा में 22 अगस्त को आई बाढ़ ने सरेह में लहलाती मक्के और धान की फसल को नष्ट कर किसानों के अरमानों पर पानी फेर दिया। वर्ष 2014 से दैवीय आपदा का प्रकोप झेल रहे किसानों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो गया है। घर में रखा अनाज बाढ़ की पानी से सड़कर बर्बाद हो गया। मकानों के अंदर तक पानी पहुंच जाने से मकानें सलसला कर घंस रही हैं। पानी हटने के बाद किसान मकाने के अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। बाढ़ प्रभावित बेलवा, तिघरा, करहकोल, एकौना, भेड़ी, बकरुआ, नीबा, अनुसा, बैदा गांवों में किसानों की दशा अत्यंत दयनीय हो गई है। यहां पशुओं को खाने के लिए चारा तक नहीं बचा है। इन गांवों के अधिकांश घरों में दस फिट तक पानी पहुंच गया था। लोगों को पेट भरने के लिए दूसरों के रहमोकरम का इंतजार करना पड़ रहा है। किसान सूर्यभान सिंह ने कहा कि आग, ओलावृष्टि और सूखा से अभी किसान उबर भी नहीं पाए थे कि बाढ़ ने ऐसा दर्द दिया कि इससे उबरना मुश्किल हो गया है। राजबहादुर, पूर्णमासी, नंदलाल, सुदामा, सवरु आदि ने कहा कि बाढ़ से किसानों की जिंदगी पूरी तरह तबाह हो गई है। वह अब कही के नहीं रहे सरकारी सहायता के नाम पर हर बार किसानों के साथ अन्याय होता है। सूखा और ओलावृष्टि राहत का धन भी अब तक तमाम किसानों को नहीं मिला है। इस बाबत तहसीलदार ने कहा कि बर्बाद फसलों की रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है। राहत राशि आते ही किसानों में तत्काल वितरित करा दी जाएगी।
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रुद्रपुर। लगातार तीन साल से आपदा की मार झेल से किसानों की इस बार बाढ़ ने कमर तोड़ दी है। पहले ओलावृष्टि, सूखा और आग का कहर झेल चुके हजारों किसानों को बाढ़ ने कहीं का नहीं छोड़ा। कर्ज के बोझ तले दबे किसानों का बाढ़ ने सिर से छत और मुंह का निवाला छीन लिया। सरकारी आंकड़ें के अनुसार दोआबा के किसानों की बाढ़ से 7246 हेक्टेयर धान और मक्के की फसल बर्बाद हुई है।
दोआबा में 22 अगस्त को आई बाढ़ ने सरेह में लहलाती मक्के और धान की फसल को नष्ट कर किसानों के अरमानों पर पानी फेर दिया। वर्ष 2014 से दैवीय आपदा का प्रकोप झेल रहे किसानों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो गया है। घर में रखा अनाज बाढ़ की पानी से सड़कर बर्बाद हो गया। मकानों के अंदर तक पानी पहुंच जाने से मकानें सलसला कर घंस रही हैं। पानी हटने के बाद किसान मकाने के अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। बाढ़ प्रभावित बेलवा, तिघरा, करहकोल, एकौना, भेड़ी, बकरुआ, नीबा, अनुसा, बैदा गांवों में किसानों की दशा अत्यंत दयनीय हो गई है। यहां पशुओं को खाने के लिए चारा तक नहीं बचा है। इन गांवों के अधिकांश घरों में दस फिट तक पानी पहुंच गया था। लोगों को पेट भरने के लिए दूसरों के रहमोकरम का इंतजार करना पड़ रहा है। किसान सूर्यभान सिंह ने कहा कि आग, ओलावृष्टि और सूखा से अभी किसान उबर भी नहीं पाए थे कि बाढ़ ने ऐसा दर्द दिया कि इससे उबरना मुश्किल हो गया है। राजबहादुर, पूर्णमासी, नंदलाल, सुदामा, सवरु आदि ने कहा कि बाढ़ से किसानों की जिंदगी पूरी तरह तबाह हो गई है। वह अब कही के नहीं रहे सरकारी सहायता के नाम पर हर बार किसानों के साथ अन्याय होता है। सूखा और ओलावृष्टि राहत का धन भी अब तक तमाम किसानों को नहीं मिला है। इस बाबत तहसीलदार ने कहा कि बर्बाद फसलों की रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है। राहत राशि आते ही किसानों में तत्काल वितरित करा दी जाएगी।
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