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Chitrakoot News: छप्पर के नीचे होती थी रामलीला
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फोटो 12 सीकेटीपी 01 रामलीला में मंचन करते कलाकार।
राजापुर (चित्रकूट)। जिस रामलीला की नींव खुद गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी जन्मभूमि राजापुर में रखी थी, उसकी गूंज 153 साल बाद भी वैसी ही है। 1872 में शुरू हुई यह रामलीला आज भी नगर की प्रसिद्ध लीला बनी हुई है। पहले लीला छप्पर के नीचे होती थी।
तुलसी इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त शिक्षक रामगणेश पांडेय बताते है कि संवत 1611 में गोस्वामी तुलसी दास ने काशी के रामनगर पहली बार रामलीला कराई थी। इसी संवत में उन्होंने अपनी जन्मस्थली राजापुर गांव में भी रामलीला शुरू कराई थी। तब न लाइट थी, न माइक। कच्चे भवन और छप्पर के नीचे मशाल की रोशनी में भगवान राम की लीला होती थी।
इस परंपरा को आगे बढ़ाया रामजी अग्रवाल ‘तऊवा’, कृष्णदत्त वैद्य, हीरा गुप्ता, बुलाकी जायसवाल, मुरली पांडा और दरोगा सोनी जैसे लोगों ने। रामलीला कमेटी के कार्यवाहक अध्यक्ष सोमनाथ अग्रवाल बताते हैं कि रामजी अग्रवाल ने अपने घर में ही ईंट-चूना पकवाकर स्टेडियम जैसा सीढ़ीनुमा भवन बनवा दिया था, जहां महिलाएं भी बैठकर लीला देखती थीं।
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नगर पंचायत अध्यक्ष संजीव मिश्रा ने बताया कि तीन साल पहले जर्जर भवन को गिराकर उसी स्थान पर नया भवन बनाया गया है। यह भी स्टेडियम की तर्ज पर बना है और महिलाओं के लिए विशेष गैलरी बनाई गई है। आज भी धनुष यज्ञ इसका सबसे बड़ा आकर्षण है। इसमें कानपुर, फतेहपुर, बांदा तक के नामी कलाकार आते हैं और गांव-गांव से भीड़ उमड़ती है।
जीर्ण-शीर्ण मुकुट बने निशानी
रामलीला के पुराने चमकीले मुकुट और वेशभूषा अब इतिहास बन चुके हैं। करीब 15 साल पुराने होने से मुकुट खराब हो गए और वस्त्र अनुपयोगी होने पर यमुना में विसर्जित कर दिए गए। जीर्ण-शीर्ण मुकुट आज भी कमेटी के पास धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं।
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तुलसी इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त शिक्षक रामगणेश पांडेय बताते है कि संवत 1611 में गोस्वामी तुलसी दास ने काशी के रामनगर पहली बार रामलीला कराई थी। इसी संवत में उन्होंने अपनी जन्मस्थली राजापुर गांव में भी रामलीला शुरू कराई थी। तब न लाइट थी, न माइक। कच्चे भवन और छप्पर के नीचे मशाल की रोशनी में भगवान राम की लीला होती थी।
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इस परंपरा को आगे बढ़ाया रामजी अग्रवाल ‘तऊवा’, कृष्णदत्त वैद्य, हीरा गुप्ता, बुलाकी जायसवाल, मुरली पांडा और दरोगा सोनी जैसे लोगों ने। रामलीला कमेटी के कार्यवाहक अध्यक्ष सोमनाथ अग्रवाल बताते हैं कि रामजी अग्रवाल ने अपने घर में ही ईंट-चूना पकवाकर स्टेडियम जैसा सीढ़ीनुमा भवन बनवा दिया था, जहां महिलाएं भी बैठकर लीला देखती थीं।
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नगर पंचायत अध्यक्ष संजीव मिश्रा ने बताया कि तीन साल पहले जर्जर भवन को गिराकर उसी स्थान पर नया भवन बनाया गया है। यह भी स्टेडियम की तर्ज पर बना है और महिलाओं के लिए विशेष गैलरी बनाई गई है। आज भी धनुष यज्ञ इसका सबसे बड़ा आकर्षण है। इसमें कानपुर, फतेहपुर, बांदा तक के नामी कलाकार आते हैं और गांव-गांव से भीड़ उमड़ती है।
जीर्ण-शीर्ण मुकुट बने निशानी
रामलीला के पुराने चमकीले मुकुट और वेशभूषा अब इतिहास बन चुके हैं। करीब 15 साल पुराने होने से मुकुट खराब हो गए और वस्त्र अनुपयोगी होने पर यमुना में विसर्जित कर दिए गए। जीर्ण-शीर्ण मुकुट आज भी कमेटी के पास धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं।