{"_id":"59b816604f1c1be57f8b64ba","slug":"recognizing-the-historical-and-religious-heritage","type":"story","status":"publish","title_hn":" पहचान को मोहताज है ऐतिहासिक व धार्मिक धरोहर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पहचान को मोहताज है ऐतिहासिक व धार्मिक धरोहर
चित्रकूट
Updated Tue, 12 Sep 2017 10:46 PM IST
विज्ञापन
ऐतिहासिक कालिंजर किले में पहुंची चित्रकूट दर्शन यात्रा की टीम।
- फोटो : amarujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। पौराणिक, ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व के स्थल में घूम रही चित्रकूट दर्शन की टीम कालिंजर किला पहुंची। जहां ऐतिहासिक धरोहर की देखरेख में बड़ी लापरवाही पाई गई। भगवान शिव के दर्शन को जुटने वाले श्रद्धालुओं के साथ स्थानीय सुरक्षा में लगे कर्मचारियों का व्यवहार सही नहीं मिला। गाइड भी न होने से किले संबंधी सही जानकारी लोगों को नहीं हो पाती है।
मुख्यालय से सात सितंबर से शुरू हुई यात्रा में शामिल टीम के सदस्यों ने मंगलवार को नीलकंठ महादेव की स्थली के दर्शन किए। यात्रा संयोजक संतोष बंसल ने बताया कि वेद पुराणों के अनुसार चारों युगों में अपना अस्तित्व रखने वाले इस स्थल की महिमा निराली है।
कहते हैं समुद्र मंथन से निकले विष से संसार की रक्षा करने के लिए देवाधिदेव महादेव को विषपान करना पड़ा। इसीलिए इन्हें नीलकंठ कहा जाता है। अजेय दुर्ग के रूप में जाने जाने वाले कालिंजर के किले के निर्माण का इतिहास विवादग्रस्त है लेकिन दूसरी शताब्दी से इसके अस्तित्व में आने की जानकारियां मिलती रही हैं। इतिहासकार फरिस्ता के
विज्ञापन
अनुसार राजा केदार ने सातवीं शताब्दी में इसके निर्माण कराए जाने की बात लिखी है।
राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. टार ने दुष्ययंत और शकुंतला के चार पुत्रों में से किसी एक के द्वारा इसका निर्माण कराए जाने की बात कही है।
यात्रा में शामिल टीम के सदस्यों ने बताया कि धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले इस स्थल का जैसा विकास किया जाना चाहिए था वैसा कम है। पीने के पानी का समुचित प्रबंध न होने,महत्वपूर्ण स्थलों के मानचित्र का अभाव, इन स्थलों तक
पहुंचने तक की सही जानकारी का अभाव है। वैसे तो पुरातत्व विभाग ने इस पूरे दुर्ग को अपने कब्जे में ले रखा है लेकिन किसी टूरिस्ट गाइड के न होने के कारण यहां आए लोगों को इस स्थल के तमाम पहलुओं की जानकारी नहीं मिल पाती।
विज्ञापन
चित्रकूट। पौराणिक, ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व के स्थल में घूम रही चित्रकूट दर्शन की टीम कालिंजर किला पहुंची। जहां ऐतिहासिक धरोहर की देखरेख में बड़ी लापरवाही पाई गई। भगवान शिव के दर्शन को जुटने वाले श्रद्धालुओं के साथ स्थानीय सुरक्षा में लगे कर्मचारियों का व्यवहार सही नहीं मिला। गाइड भी न होने से किले संबंधी सही जानकारी लोगों को नहीं हो पाती है।
मुख्यालय से सात सितंबर से शुरू हुई यात्रा में शामिल टीम के सदस्यों ने मंगलवार को नीलकंठ महादेव की स्थली के दर्शन किए। यात्रा संयोजक संतोष बंसल ने बताया कि वेद पुराणों के अनुसार चारों युगों में अपना अस्तित्व रखने वाले इस स्थल की महिमा निराली है।
विज्ञापन
कहते हैं समुद्र मंथन से निकले विष से संसार की रक्षा करने के लिए देवाधिदेव महादेव को विषपान करना पड़ा। इसीलिए इन्हें नीलकंठ कहा जाता है। अजेय दुर्ग के रूप में जाने जाने वाले कालिंजर के किले के निर्माण का इतिहास विवादग्रस्त है लेकिन दूसरी शताब्दी से इसके अस्तित्व में आने की जानकारियां मिलती रही हैं। इतिहासकार फरिस्ता के
विज्ञापन
अनुसार राजा केदार ने सातवीं शताब्दी में इसके निर्माण कराए जाने की बात लिखी है।
राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. टार ने दुष्ययंत और शकुंतला के चार पुत्रों में से किसी एक के द्वारा इसका निर्माण कराए जाने की बात कही है।
यात्रा में शामिल टीम के सदस्यों ने बताया कि धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले इस स्थल का जैसा विकास किया जाना चाहिए था वैसा कम है। पीने के पानी का समुचित प्रबंध न होने,महत्वपूर्ण स्थलों के मानचित्र का अभाव, इन स्थलों तक
पहुंचने तक की सही जानकारी का अभाव है। वैसे तो पुरातत्व विभाग ने इस पूरे दुर्ग को अपने कब्जे में ले रखा है लेकिन किसी टूरिस्ट गाइड के न होने के कारण यहां आए लोगों को इस स्थल के तमाम पहलुओं की जानकारी नहीं मिल पाती।