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जान जोखिम में डाल काम करते हैं कर्मचारी

Thu, 18 Jun 2015 10:50 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, चित्रकूट
ब्यूरो/ अमर उजाला, चित्रकूट Updated Thu, 18 Jun 2015 10:50 PM IST
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Putting at risk the work crew

बनकट उपकेंद्र हो या कोई अन्य उपकेंद्र, बिजलीकर्मी

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हर जगह जान जोखिम में डालकर काम करते हैं। विभाग से इनको न तो सुरक्षा के जरूरी सामान मिलते हैं और न ही अधिकारी कुछ सुनने को तैयार हैं।

बनकट सब स्टेशन में लगी आग से तीनों बिजलीकर्मी गंभीर रूप से झुलसे हैं। एक एसएसओ की पीठ झुलस गई तो दूसरे के बाल उड़ गए। तीसरे कर्मी के शरीर पर कई जगह झुलसने के निशान हैं।

रामकृपा चिकित्सालय में भर्ती एसएसओ अंबिका प्रसाद ने बताया कि वे रात एक बजे ग्रामीण इलाके की रोस्टिंग कर बैठे थे। लगभग दो बजे अचानक उपकरण बंद होने लगे तो एसएसओ उदितनारायण और कुशल श्रमिक अबुल हसन से कहा, ये क्या हो रहा है? आग की लपटें उठने लगीं तो बाहर की ओर भागा।

याद आया कि दो साथी तो अंदर हैं। इस पर मैं फिर अंदर भागा। उपकरणों के जलने से बना आग का गोला मेरी पीठ पर गिरा और मैं जख्मी हो गया। किसी तरह घिसटकर बाहर निकलकर जान बचाई। अबुल हसन के सिर के बाल पूरी तरह जल गए और खोपड़ी झुलस गई।

नाम न छापने की शर्त पर कुछ कर्मियों ने बताया कि उनको सेफ्टी किट नहीं दी जाती। उपकरण जर्जर हो गए हैं, ऐसे में जान जोखिम में रहती है। पिछले कुछ महीनों में कई बार दुर्घटनाएं हुई हैं। कर्मचारी बताते हैं कि उपकेंद्रों में तैनात शायद ही कोई भाग्यशाली कर्मचारी हो, जो रिटायर्ड होने तक सही सलामत रहा हो।

हर कर्मचारी के शरीर पर जख्म के निशान हैं। सेवानिवृत्त केबिल ज्वाइंटर नवाब हुसैन खां ने बताया कि बिजलीकर्मी पूरी जिंदगी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं। मेरे दोनों हाथ, पैर और शरीर के अन्य हिस्सों में झुलसने के निशान हैं।

बिजली कर्मचारी संघ के खंडीय मंत्री रामलाल पाल ने बताया कि इस संबंध में कई बार बिजली अधिकारियों से बात की। अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि ऊपर से ही कुछ नहीं आता। ज्यादा कुरेदने पर अधिकारी उच्च स्तर पर किए गए पत्र व्यवहार की कापियां दिखाने लगते हैं। बताया कि न तो ग्लब्स, न सुरक्षा वर्दी, न डंडी और न ही अन्य औजार दिए जाते हैं।

इस संबंध में अधीक्षण अभियंता अरुण कुमार सक्सेना से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने मोबाइल नहीं उठाया। अधिकारी बताते हैं कि मेंटेनेंस के नाम पर लगभग डेढ़ लाख रुपये आता है। इसमें से ज्यादातर वाहन के डीजल, स्टेशनरी आदि में खर्च हो जाता है।

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