फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Chitrakoot News ›   Finding history by looking at the mound, pair

टीला देखकर इतिहास का पता लगा लेती है जोड़ी

Tue, 10 Oct 2017 11:04 PM IST
चित्रकूट
चित्रकूट Updated Tue, 10 Oct 2017 11:04 PM IST
विज्ञापन
Finding history by looking at the mound, pair
संडवावीर में उत्खनन में जुटे अनुभवी गोकुल और शिवराम। - फोटो : amarujala
सुधीर अग्रवाल/ मधुरेंद्र प्रताप सिंह
विज्ञापन

चित्रकूट। चाहे बुंदेलखंड हो अथवा पूर्वाचंल पुरातत्व विभाग के अच्छे से अच्छे जानकार दो बुजुर्ग श्रमिकों का लोहा मानता हैै। किताबों में चाहे जो लिखा हो लेकिन जब तक इनकी पारखी नजर ने उत्खनन की सहमति न दी तो सफलता मिलना असंभव सा होता है। अस्थाई होते हुए भी यह दोनों श्रमिक 50 साल से इसी विभाग के लिए स्थाई कर्मचारी की तरह काम कर रहे हैं। दोनों अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में हैं इसके बावजूद उनकी चमकती आंखे और खुदाई के दौरान सधे हाथ चलते देख अधिकारी चकरा जाते हैं। ये जोड़ी टीले की मिट्टी देखकर इतिहास का पता लगा लेती है।
इन दिनों पुरातत्व विभाग की टीम ने गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली राजापुर के संडवावीर में डेरा जमाया है। जिसमें डॉ.शकुंतलादेवी मिश्र पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की टीम के अनुभवी अधिकारी के निर्देश पर उत्खनन का काम चल रहा है। इन सबके बीच दो श्रमिक ही सारे आकर्षण का केंद्र हैं। जब अधिकारी भी कोलरिया कोराव इलाहाबाद निवासी 75 वर्षीय गोकुल और मंजवा कोराव इलाहाबाद निवासी 65 वर्षीय शिवराम इन दोनों से पूंछकर काम करते हैं तो सभी आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि क्या इन श्रमिकों को ज्यादा जानकारी है। दरअसल सोलह आने सच भी यही है कि पुरातत्व विभाग का पूर्वाचंल, इलाहाबाद, कौशांबी और अब बुंदेलखंड क्षेत्र में जहां भी उत्खनन काम चला वहां गोकुल व शिवराम की जोड़ी का ही कमाल दिखा है।
विज्ञापन

उत्खनन टीम में मौजूद डॉ.शकुंतलादेवी मिश्र पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ.अवनीश चंद्र मिश्र और शिविर प्रबंधक वीरेंद्र शर्मा भी बेबाकी से मानते हैं कि इस जोड़ी के बिना विभाग को सफलता नहीं मिली है। जहां भी पुरातत्व से जुड़ा मामला सामने आता है तो अधिकारी पहले गोकुल व शिवराम को लेकर वहां जाते हैं। जब इनकी सहमति मिलती है तभी खुदाई होती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


कौन हैं ये हिट जोड़ी
चित्रकूट। इलाहाबाद के कोराव निवासी गोकुल व शिवराम की पारिवारिक पृष्ठभूमि कोई खास नहीं है। दोनों पढ़े लिखे भी नहीं हैं। इन दोनों का पूरा हरा भरा परिवार है। अमर उजाला से बातचीत में बताया कि जवानी के दिनों में गांव के आस पास ऐतिहासिक इमारतों को देखते थे। वहां जब अधिकारी आते थे उनसे खुदाई आदि काम में मदद लेते थे। उसके बदले में कुछ खर्च मिल जाता था। जिससे उनका रुझान बढ़ा और इसी काम में जुट गए। गोकुल के अनुसार वह 1967 और शिवराम के अनुसार वह 1977 से इस काम में लगा है। यह काम करते करते इतनी जानकारी हो गई है कि मिट्टी व टीले आदि देखकर ही उसके ऐतिहासिक होने की घोषणा कर देते हैं। दोनों ने कहा कि उन्हें इस बात का गर्व है कि अधिकारी उनकी बात का पूरा सम्मान करते हैं। उत्खनन के औजार आदि उपलब्ध कराते हैं।

अलग तरीके से होती खुदाई
चित्रकूट। अनुभवी गोकुल व शिवराम बताते हैं कि आमतौर पर मजदूर फावड़ा चलाकर गड्ढे करना वाला होता है लेकिन इस विभाग का काम अलग तरीके से होता है। कुछ सोने चांदी के जेवर बनाने और सफाई करने वाला जैसा ही काम है। इसमें नाप जोख कर ही खुदाई होती है और चिह्नित स्थल तक ही काम किया जाता है।


पर्याप्त मिलती मजदूरी
चित्रकूट। गोकुल व शिवराम ने बताया कि इस काम में शासन की ओर से निर्धारित मजदूरी ही मिलती है। वह स्थाई कर्मचारी नहीं हैं लेकिन श्रमिक के रूप में जो सुविधाएं होती हैं वह विभाग उपलब्ध कराता है। जब तब यह काम चलता है तो प्रतिदिन औसतन 500 रुपये प्रतिदिन मिलता है। काम न होने पर वह सब गांव में मजदूरी व खेती कर परिवार का भरण पोषण करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed