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बीहड़ में बहादुरी पुलिस को पड़ी भारी
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- जंगल में मुठभेड़ के बाद बरामद डकैतों की सामग्री के साथ मौजूद पुलिस टीम- फाइल फोटो । संवाद
- फोटो : CHITRAKOOT
चित्रकूट। पाठा के बीहड़ों में दस्युओं को मुठभेड़ में मार गिराने की बहादुरी और शोहरत व शाबासी लूटने के बाद पुलिस कानून के शिकंजे में पहले भी फंस चुकी है। इनामी डकैत भालचंद्र के मुठभेड़ मामले में एसपी समेत 17 पुलिस कर्मियों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट के अदालती आदेश ने ऐसे पुराने प्रकरण की याद ताजा कर दी है।
23 अक्टूबर 1993 में भी पुलिस पर यह बीत चुकी है। पुलिस ने बरगढ़ थाना क्षेत्र के छितौनी गांव निवासी छोटेलाल कोल को ददुआ गैंग का सदस्य बताकर मुठभेड़ में मार दिया था। पुलिस ने उसे गैंग सदस्य कल्लू कोल बताया था। मामले ने तूल पकड़ा तो 18 पुलिस कर्मियों के खिलाफ फर्जी मुठभेड़ की रिपोर्ट दर्ज हुई थी। करीब 26 साल बाद अक्टूबर माह में ही फर्जी मुठभेड़ में पुलिस के फंसने का फिर उदाहरण सामने आया है।
पाठा क्षेत्र मेें कोल ेसमुदाय और गरीबों के बीच कई साल तक जागरूकता अभियान चलाने वाले समाजसेवी गोपाल भाई और अधिवक्ता आलोक द्विवेदी ने बताया कि पहाड़ों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों के लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति हमेशा रही है। दिन में पुलिस डकैतों को संरक्षण देने के नाम पर परेशान करती है तो रात में डकैत आकर पुलिस के लिए मुखबिरी के आरोप लगाकर मारते पीटते हैं। अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान के प्रमुख गोपाल भाई बताते हैं 23 अक्टूबर 1993 को बरगढ़ के छितैनी गांव निवासी छोटेलाल कोल को पुलिस ने डाकू ददुआ गैंग से मुठभेड़ के नाम पर मार गिराया था। पता चला कि पुलिस उसे ददुआ गैंग का कल्लू कोल बता रही है। छोटे के परिजन न्याय के लिए भटकते रहे। उनके संस्थान के साथ प्रख्यात समाजसेवी स्वामी अग्निवेश महराज ने भी चित्रकूट में फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ कई दिनों तक धरना प्रदर्शन और आंदोलन किया। फलस्वरूप तत्कालीन मऊ सीओ समेत 18 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। इसकी जांच चलती रही। सरकार की ओर से मृतक छोटेलाल के परिजनों को मुआवजे के तौर पर प्रथम किस्त में 50 हजार रुपये मिले थे। आपसी समझौते से सन 2004-05 में यह मुकदमा सरकार के हस्तक्षेप से खत्म हुआ था।
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(संवाद)
पुलिस ज्यादती की घटनाएं
-गोपाल भाई बताते हैं कि मानिकपुर का नंदवनिया पुरवा में रात में डकैतों और दिन में पुलिस की धमाचौकड़ी रहती थी। इससे परेशान ग्रामीणों ने बस्ती छोड़ दी थी, जो आज भी वीरान पड़ी है।
-बहिलपुरवा थाने का एक सिपाही कोल महिला को जबरन कई साल तक पत्नी बनाकर थाने के पास ही रखे रहा। महिला के परिजन उच्चाधिकारियों के यहां शिकायत करते हार गये थे लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
- 1993-94 में मानिकपुर के रामजतन कोल की शंकरगढ़ में मौत हो गई थी। इसमें पुलिस पर आरोप लगा था कि उसे मानिकपुर से पकड़कर ले गई और मार दिया। इसी साल एक ग्वालिन नामक महिला की मौत के लिए पुलिस को दोषी माना था।
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23 अक्टूबर 1993 में भी पुलिस पर यह बीत चुकी है। पुलिस ने बरगढ़ थाना क्षेत्र के छितौनी गांव निवासी छोटेलाल कोल को ददुआ गैंग का सदस्य बताकर मुठभेड़ में मार दिया था। पुलिस ने उसे गैंग सदस्य कल्लू कोल बताया था। मामले ने तूल पकड़ा तो 18 पुलिस कर्मियों के खिलाफ फर्जी मुठभेड़ की रिपोर्ट दर्ज हुई थी। करीब 26 साल बाद अक्टूबर माह में ही फर्जी मुठभेड़ में पुलिस के फंसने का फिर उदाहरण सामने आया है।
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पाठा क्षेत्र मेें कोल ेसमुदाय और गरीबों के बीच कई साल तक जागरूकता अभियान चलाने वाले समाजसेवी गोपाल भाई और अधिवक्ता आलोक द्विवेदी ने बताया कि पहाड़ों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों के लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति हमेशा रही है। दिन में पुलिस डकैतों को संरक्षण देने के नाम पर परेशान करती है तो रात में डकैत आकर पुलिस के लिए मुखबिरी के आरोप लगाकर मारते पीटते हैं। अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान के प्रमुख गोपाल भाई बताते हैं 23 अक्टूबर 1993 को बरगढ़ के छितैनी गांव निवासी छोटेलाल कोल को पुलिस ने डाकू ददुआ गैंग से मुठभेड़ के नाम पर मार गिराया था। पता चला कि पुलिस उसे ददुआ गैंग का कल्लू कोल बता रही है। छोटे के परिजन न्याय के लिए भटकते रहे। उनके संस्थान के साथ प्रख्यात समाजसेवी स्वामी अग्निवेश महराज ने भी चित्रकूट में फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ कई दिनों तक धरना प्रदर्शन और आंदोलन किया। फलस्वरूप तत्कालीन मऊ सीओ समेत 18 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। इसकी जांच चलती रही। सरकार की ओर से मृतक छोटेलाल के परिजनों को मुआवजे के तौर पर प्रथम किस्त में 50 हजार रुपये मिले थे। आपसी समझौते से सन 2004-05 में यह मुकदमा सरकार के हस्तक्षेप से खत्म हुआ था।
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पुलिस ज्यादती की घटनाएं
-गोपाल भाई बताते हैं कि मानिकपुर का नंदवनिया पुरवा में रात में डकैतों और दिन में पुलिस की धमाचौकड़ी रहती थी। इससे परेशान ग्रामीणों ने बस्ती छोड़ दी थी, जो आज भी वीरान पड़ी है।
-बहिलपुरवा थाने का एक सिपाही कोल महिला को जबरन कई साल तक पत्नी बनाकर थाने के पास ही रखे रहा। महिला के परिजन उच्चाधिकारियों के यहां शिकायत करते हार गये थे लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
- 1993-94 में मानिकपुर के रामजतन कोल की शंकरगढ़ में मौत हो गई थी। इसमें पुलिस पर आरोप लगा था कि उसे मानिकपुर से पकड़कर ले गई और मार दिया। इसी साल एक ग्वालिन नामक महिला की मौत के लिए पुलिस को दोषी माना था।