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भाट परिवारों पर संकट: झाड़ू का पुश्तैनी पेशा छोड़ने को मजबूर

Mon, 08 Jun 2026 12:16 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट Updated Mon, 08 Jun 2026 12:16 AM IST
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Bhat families in crisis: forced to abandon their ancestral broom-making profession
फोटो 07 सीकेटीपी-29- खजूर से झाडू बनाते कारीगर। संवाद - फोटो : शीलादेवी।
चित्रकूट। शिवरामपुर क्षेत्र के कपड़िया मोहल्ले में बसे लगभग एक हजार भाट परिवार पीढ़ियों से खजूर की झाड़ू बनाकर अपनी आजीविका चला रहे हैं। बदलते समय की चाल, बढ़ती महंगाई और बाजार में मशीन से बनी झाड़ुओं की बढ़ती मांग ने इस पारंपरिक रोजगार को संकट में डाल दिया है। आज इन मेहनती हाथों से बनी झाड़ुओं को लागत से भी कम दाम में बेचना पड़ रहा है, जिससे इन परिवारों का गुजारा मुश्किल हो गया है।
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भाट समुदाय के लोग सौ साल से भी अधिक समय से खजूर की पत्तियों से कूंचा (झाड़ू) बनाने का काम करते आ रहे हैं। यह हुनर उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है और इसे सहेजने के लिए वे कड़ी मेहनत करते हैं। हालांकि, आज इस कला को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
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मेहनत ज्यादा, कमाई कम
एक झाड़ू को तैयार करने में लगभग डेढ़ घंटे का समय लगता है। इसकी लागत लगभग 10 से 15 रुपये आती है। इसके लिए खजूर की पत्तियां महोबा, छतरपुर से खरीदकर लाते हैं। इन्हें सुखाकर, छांटकर और फिर बांधकर झाड़ू का रूप दिया जाता है। एक परिवार मुश्किल से 50 झाड़ू बना पाता है, लेकिन बाजार में इन्हें मात्र आठ से 10 रुपये प्रति झाड़ू की कीमत मिलती है।
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बारिश में काम होता ठप
बारिश के तीन महीने इस व्यवसाय के लिए चुनौती हैं। इस दौरान काम पूरी तरह से ठप हो जाता है क्योंकि नमी के कारण खजूर की पत्तियां सड़ जाती हैं। एक बार में 50 से 60 गठ्ठर पत्तियां खरीदने में 10 से 12 हजार रुपये खर्च होते हैं, जो बारिश में खराब होने पर सीधा आर्थिक नुकसान बन जाता है।
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पुश्तैनी काम छोड़ने की मजबूरी

चून्नू भाट बताते हैं कि दो पीढ़ियों से यह काम चला आ रहा है, लेकिन अब लागत बढ़ने और दाम घटने के कारण इसे जारी रखना अत्यंत कठिन है। घर में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और अन्य खर्चे भी हैं। पहले बाजार में इन झाड़ुओं की अच्छी बिक्री होती थी। जो व्यापारी आते भी हैं, वे केवल पांच से सात रुपये दाम लगाते हैं, जो लागत से भी कम है।

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नहीं मिल पा रहा अच्छा बाजार


बच्छराज भाट का कहना है कि बाजार में मशीन से बनी झाड़ुओं की मांग बढ़ने से उनकी बिक्री में भारी गिरावट आई है। इसके साथ ही, उन्हें अच्छा बाजार भी नहीं मिल पा रहा है। पहले इसी काम से उनका परिवार आराम से गुजर-बसर कर लेता था, लेकिन अब यही काम उन्हें एक बोझ लगने लगा है।

फोटो 07 सीकेटीपी-29- खजूर से झाडू बनाते कारीगर। संवाद

फोटो 07 सीकेटीपी-29- खजूर से झाडू बनाते कारीगर। संवाद- फोटो : शीलादेवी।

फोटो 07 सीकेटीपी-29- खजूर से झाडू बनाते कारीगर। संवाद

फोटो 07 सीकेटीपी-29- खजूर से झाडू बनाते कारीगर। संवाद- फोटो : शीलादेवी।

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