वक्त की मार से सिल्वर स्क्रीन हुई बदरंग

Chitrakoot Updated Thu, 08 May 2014 05:30 AM IST
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चित्रकूट। जिले को पर्र्यटक स्थल का दर्जा है। यहां कई तीर्थ क्षेत्र और धाम है। इसके बाद भी जिले में बगैर ‘सुर-ताल’ की जिंदगी गुजर रही है। यहा आने वाले पर्र्यटक सिर्फ धार्मिक स्थलों तक सीमित है। जिला में रुकने के बजाय भागने की सोंचते है। कारण सिर्फ एक ही है। जिले में कोई भी मनोरंजन का साधन नहीं है।
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हालात यह है शहर में अफसरों समेत साधनसंपन्न लोग छुट्टी वाले दिन मनोरंजन के लिए पड़ोसी जिलों में मनोरंजन के लिए परिवार समेत भागते हैं।
मनोरंजन के साधनों के नाम पर सिर्फ जिले में सिर्फ मनोरंजन विभाग ही है। शहर के लोगों का कहना है एक समय ऐसा था जब जिले को जिले का दर्जा भी नहीं मिला था। उस समय शहर में दो फट्टा टाकीज और पांच टाकीज थी। ऐसी कोई टाकीज नहीं होती थी, जहां हाउसफुल का बोर्ड न लगा हो। अतिरिक्त कुर्सियां लगाने पड़ती थी। अचानक पता नहीं क्या हुआ टाकीजों के बंद होने का दौर शुरु हो गया। आखिर में 2009 में शहर की दीपक टाकीज बंद हुई। इसके बाद से शहर बगैर ‘सुर-ताल’ के है। जबकि बाहर से आने वाले पर्र्यटक, जिला के विभागों में तैनात अधिकारी, कर्मी सभी मनोरंजन के साधन तलाशते है। ऐसे में लोग पड़ोसी जिले इलाहाबाद की तरफ रुख करते है। कर्वी शहर में दीपक और मंदाकिनी टाकीज थी। राजापुर तहसील क्षेत्र में शिवम और वशिष्ठ टाकीज, मऊ में एक टाकीज थी। इसके अलावा दो फट्टा टाकीजे थी। जहा मध्यमवर्गीय, ग्रामीण क्षेत्र, मजदूर वर्ग के सभी लोग मनोरंजन के लिए जाते थे।
डिश, सीडी ने कारोबार बिगाड़ा
2009 में बंद हुई दीपक टाकीज के संचालक देवदत्त ने बताया डिश और सीडी का गांव-गांव में चलन हो गया है। ऐसे में लोग टाकीज की तरफ से मुंह फेरने लगे थे। लगातार नुकसान के चलते मजबूर होकर टाकीज बंद करनी पड़ी। पीडब्ल्यू विभाग के अवर अभियंता ब्रजराज सिंह ने बताया अवकाश के दिन दूसरे जिले में परिवार के साथ छुट्टी बिताने जाते है। शाम को वापस लौट आते है। उन्होंने बताया परिवार के साथ शहर में घूमने वाला माहौल भी नहीं है।
मनोरंजन के कोई साधन नहीं
पुलिस लाइन खोह निवासी छात्र महेंद्र सिंह ने कहा शहर में सिनेमा जरुर होना चाहिए। युवा, दूसरे जिले से आए नौकरी पेशा लोगों को इसकी कमी महसूस होती है, लेकिन किया ही क्या जा सकता है। शहर में पार्क और चिड़ियाघर ऐसे कोई भी मनोरंजन के साधन नहीं है। मनोरंजक कर निरीक्षक कन्धई लाल ने बताया जिला में सिनेमा हाल की कमी खलती है। 2008 तक टाकीजों के लाइसेंस रिन्युअल हुए है। सालाना 20 लाख का राजस्व भी आता था। उसके बाद किसी ने सिनेमा हाल के लिए प्रार्थना पत्र तक नहीं दिया है। विभाग की तरफ से प्रयास भी किया गया, लेकिन कोई भी तैयार नहीं है।
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