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फसल चक्र के हिसाब से खेती करने से किसानों को होगा लाभ
Updated Mon, 12 Jun 2017 07:19 PM IST
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उन्नति खेती के लिए फसल चक्र अपनाएं
:- भूमि की उर्वरता बढे़गी, पानी कम लगेगा
:- अदल बदल कर उगाए फसल
अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। बुंदेलखंड क्षेत्र में फसल चक्र के आधार पर खेती करने से भूमि की उर्वरता तो बढ़ेगी ही साथ में सिंचाई के लिए पानी भी कम लगेगा। इसके लिए मौसम के आधार पर बदलकर फसलों की खेती करने से किसानों को अधिक लाभ होगा। यह कहना है गनीवा फार्म के वैज्ञानिक नरेंद्र सिंह का।
उन्होंने बताया कि किसी खेत में लगातार एक ही फसल उगाने के कारण कम उपज प्राप्त होती है। भूमि की उर्वरता घटती है। जबकि फसल चक्र के हिसाब से खेती करने से मृदा उर्वरता बढ़ती है। भूमि में कार्बन-नाइट्रोजन के अनुपात में वृद्धि होती है। भूमि की क्षरीयता मेें सुधार होता है। फसलों का बीमारियों से बचाव होता है, कीटों का नियंत्रण होता है। भूमि में विषाक्त पदार्थ एकत्र नहीं होते।
अधिक मूल्यवान फसलों के साथ चुने गए फसल चक्राें में मुख्य दहलहनी, फसले,चना, मटर, मसूर, अरहर उर्द, मूंग, लोबिया, राजमा आदि का समावेश जरूरी हो गया है। फसल चक्र के निर्धारण में मूलभूत सिद्धांतों का ध्यान रखना जरूरी है जैसे अधिक खाद चाहने वाली फसल के बाद कम पानी चाहने वाली फसलों का उत्पादन, अधिक पानी चाहने वाली फसल के बाद कम पानी चाहने वाली फसल, अधिक निराई गुड़ाई वाली फसल के बाद कम निराई गुड़ाई चाहने वाली फसल लगाए।
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गनीवा फार्म के वैज्ञानिक नरेंद्र सिंह व कृषि विभाग के उप कृषि निदेशक जगदीश नारायण का कहना है कि फसल का समावेश जलवायु क्षेत्र की पारिस्थितियों, सिंचाई की उपलब्धता आदि के अनुरूप करना चाहिए। कम गहराई वाली जड़ की फसल के बाद गहरी जड़ वाली फसल को उगाना चाहिए।
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:- भूमि की उर्वरता बढे़गी, पानी कम लगेगा
:- अदल बदल कर उगाए फसल
अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। बुंदेलखंड क्षेत्र में फसल चक्र के आधार पर खेती करने से भूमि की उर्वरता तो बढ़ेगी ही साथ में सिंचाई के लिए पानी भी कम लगेगा। इसके लिए मौसम के आधार पर बदलकर फसलों की खेती करने से किसानों को अधिक लाभ होगा। यह कहना है गनीवा फार्म के वैज्ञानिक नरेंद्र सिंह का।
उन्होंने बताया कि किसी खेत में लगातार एक ही फसल उगाने के कारण कम उपज प्राप्त होती है। भूमि की उर्वरता घटती है। जबकि फसल चक्र के हिसाब से खेती करने से मृदा उर्वरता बढ़ती है। भूमि में कार्बन-नाइट्रोजन के अनुपात में वृद्धि होती है। भूमि की क्षरीयता मेें सुधार होता है। फसलों का बीमारियों से बचाव होता है, कीटों का नियंत्रण होता है। भूमि में विषाक्त पदार्थ एकत्र नहीं होते।
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अधिक मूल्यवान फसलों के साथ चुने गए फसल चक्राें में मुख्य दहलहनी, फसले,चना, मटर, मसूर, अरहर उर्द, मूंग, लोबिया, राजमा आदि का समावेश जरूरी हो गया है। फसल चक्र के निर्धारण में मूलभूत सिद्धांतों का ध्यान रखना जरूरी है जैसे अधिक खाद चाहने वाली फसल के बाद कम पानी चाहने वाली फसलों का उत्पादन, अधिक पानी चाहने वाली फसल के बाद कम पानी चाहने वाली फसल, अधिक निराई गुड़ाई वाली फसल के बाद कम निराई गुड़ाई चाहने वाली फसल लगाए।
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गनीवा फार्म के वैज्ञानिक नरेंद्र सिंह व कृषि विभाग के उप कृषि निदेशक जगदीश नारायण का कहना है कि फसल का समावेश जलवायु क्षेत्र की पारिस्थितियों, सिंचाई की उपलब्धता आदि के अनुरूप करना चाहिए। कम गहराई वाली जड़ की फसल के बाद गहरी जड़ वाली फसल को उगाना चाहिए।