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Chandauli News: ऊदल को छुड़ाने के लिए आल्हा ने बबुरी वन में की थी महाकाली की तपस्या
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बबुरी स्थित सिद्धिदात्री महाकाली मंदिर। संवाद
बबुरी। भाई को बंदी बनाए जाने की खबर मिली तो आल्हा ने उसे मुक्त कराने का संकल्प लिया। लोक मान्यता के अनुसार, मैहर की मां शारदा से मार्गदर्शन मिलने के बाद आल्हा अपने मंत्री डेभा तिवारी के साथ बबुरी वन पहुंचे और मां महाकाली की तपस्या की।
इसके बाद बब्रुवाहन वंश के राजा से युद्ध कर उसे पराजित किया और भाई ऊदल को मुक्त कराया। आल्हा-ऊदल की वीरता से जुड़ी यह गाथा आज भी बबुरी में लोकगीतों के जरिए सुनाई जाती है। यहां स्थित सिद्धिदात्री मां महाकाली मंदिर के साथ प्राचीन महल और सराय से जुड़ी मान्यताएं भी क्षेत्र के इतिहास को लेकर उत्सुकता बढ़ाती हैं।
मंदिर की स्थापना कराने वाले परिवार के सत्य प्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि करीब एक हजार से बारह सौ वर्ष पहले बबुरी में बब्रुवाहन वंश के राजा का शासन था। लोककथा के मुताबिक, इसी दौरान आल्हा के भाई ऊदल शिकार करते हुए बबुरी के जंगल में पहुंच गए थे। राजा ने उन्हें बंदी बना लिया। इसकी जानकारी मिलने पर आल्हा ने भाई को मुक्त कराने की ठानी। आल्हा ने मैहर की मां शारदा से मार्गदर्शन मांगा था।
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मां शारदा ने उन्हें बबुरी वन में स्थित मां महाकाली की आराधना करने का उपाय बताया। इसके बाद आल्हा अपने मंत्री डेभा तिवारी के साथ बबुरी पहुंचे और तपस्या कर मां का आशीर्वाद प्राप्त किया। मान्यता है कि इसके बाद हुए युद्ध में आल्हा ने राजा को पराजित कर ऊदल को मुक्त कराया।
इस गाथा की झलक क्षेत्र में प्रचलित लोकगीत में भी मिलती है। इसके बोल हैं- “आल्हा ऊदल डेभा तिवारी, पूजन चरनिया तोहार, बबुरी बन क काली।” स्थानीय लोगों के अनुसार, यह लोकगीत पीढ़ियों से प्रचलित है।
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इसके बाद बब्रुवाहन वंश के राजा से युद्ध कर उसे पराजित किया और भाई ऊदल को मुक्त कराया। आल्हा-ऊदल की वीरता से जुड़ी यह गाथा आज भी बबुरी में लोकगीतों के जरिए सुनाई जाती है। यहां स्थित सिद्धिदात्री मां महाकाली मंदिर के साथ प्राचीन महल और सराय से जुड़ी मान्यताएं भी क्षेत्र के इतिहास को लेकर उत्सुकता बढ़ाती हैं।
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मंदिर की स्थापना कराने वाले परिवार के सत्य प्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि करीब एक हजार से बारह सौ वर्ष पहले बबुरी में बब्रुवाहन वंश के राजा का शासन था। लोककथा के मुताबिक, इसी दौरान आल्हा के भाई ऊदल शिकार करते हुए बबुरी के जंगल में पहुंच गए थे। राजा ने उन्हें बंदी बना लिया। इसकी जानकारी मिलने पर आल्हा ने भाई को मुक्त कराने की ठानी। आल्हा ने मैहर की मां शारदा से मार्गदर्शन मांगा था।
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मां शारदा ने उन्हें बबुरी वन में स्थित मां महाकाली की आराधना करने का उपाय बताया। इसके बाद आल्हा अपने मंत्री डेभा तिवारी के साथ बबुरी पहुंचे और तपस्या कर मां का आशीर्वाद प्राप्त किया। मान्यता है कि इसके बाद हुए युद्ध में आल्हा ने राजा को पराजित कर ऊदल को मुक्त कराया।
इस गाथा की झलक क्षेत्र में प्रचलित लोकगीत में भी मिलती है। इसके बोल हैं- “आल्हा ऊदल डेभा तिवारी, पूजन चरनिया तोहार, बबुरी बन क काली।” स्थानीय लोगों के अनुसार, यह लोकगीत पीढ़ियों से प्रचलित है।