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स्वावलंबी बना रही है राखी
ब्यूरो/अमर उजाला, चंदौली
Updated Thu, 20 Aug 2015 02:04 AM IST
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नगर में राखी भाइयों की रक्षा ही नहीं महिलाओं को स्वावलंबी भी बना रही है।
लाठ नंबर दो में डेढ़ दर्जन महिलाएं राखी निर्माण कर अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहीं हैं।
वर्तमान में रेशम के धागे की जगह कार्टून कैरेक्टर वाले फैंसी राखियां अधिक बिक रही है। हालांकि अधिकतर राखियां वाराणसी और दिल्ली सहित अन्य स्थानों पर निर्मित होती हो रही है और बाजार में बिक रही है।
यही नहीं चाइनीज राखियां भी बाजार में छायी हुई है। इस बीच नगर में भी महिलाओं ने इसका निर्माण शुरू कर दिया है।
लाठ नंबर दो में सावित्री महिला हस्तकला केंद्र में चंद्रावती, ज्योति चौधरी, निशा, विजेता, रूपा देवी, सविता चौधरी, शशि कुरील, तपस्या चौधरी, प्रतिमा कुमारी, प्रीति मौर्य आदि प्रतिदिन पांच से सौ राखियां तैयार कर रहीं है।
प्रशिक्षिका ज्योति अग्रवाल ने बताया कि क्वालिटी के आधार पर एक महिला प्रतिदिन सत्तर से सौ रुपये कमा रही है। बताया कि राखी की लागत दो से बीस रुपये में आ रही है। इसे बाजार में बीस से सत्तर रुपये में बेचा जा रहा है। इससे स्थानीय महिलाओं को रोजगार मिल रहा है ।
वहीं लोगों को स्थानीय स्तर पर टिकाऊ राखी मिल रही है।
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लाठ नंबर दो में डेढ़ दर्जन महिलाएं राखी निर्माण कर अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहीं हैं।
वर्तमान में रेशम के धागे की जगह कार्टून कैरेक्टर वाले फैंसी राखियां अधिक बिक रही है। हालांकि अधिकतर राखियां वाराणसी और दिल्ली सहित अन्य स्थानों पर निर्मित होती हो रही है और बाजार में बिक रही है।
यही नहीं चाइनीज राखियां भी बाजार में छायी हुई है। इस बीच नगर में भी महिलाओं ने इसका निर्माण शुरू कर दिया है।
लाठ नंबर दो में सावित्री महिला हस्तकला केंद्र में चंद्रावती, ज्योति चौधरी, निशा, विजेता, रूपा देवी, सविता चौधरी, शशि कुरील, तपस्या चौधरी, प्रतिमा कुमारी, प्रीति मौर्य आदि प्रतिदिन पांच से सौ राखियां तैयार कर रहीं है।
प्रशिक्षिका ज्योति अग्रवाल ने बताया कि क्वालिटी के आधार पर एक महिला प्रतिदिन सत्तर से सौ रुपये कमा रही है। बताया कि राखी की लागत दो से बीस रुपये में आ रही है। इसे बाजार में बीस से सत्तर रुपये में बेचा जा रहा है। इससे स्थानीय महिलाओं को रोजगार मिल रहा है ।
वहीं लोगों को स्थानीय स्तर पर टिकाऊ राखी मिल रही है।