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गुम हो गई होली की लोक पंरपराएं, आधुनिकता हावी
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कंदवा। एकता और भाईचारा के प्रतीक होली के त्योहार में अब पौराणिक प्रथाएं पूरी तरह गौण हो चुकी हैं। इसके स्वरूप और मायने भी बदल चुके हैं। वसंत पंचमी के दिन से शुरू होकर लगातार 40 दिन तक चलने वाला लोक पर्व का त्योहार होली अब महज कुछ घंटों में सिमट कर रह गया है। बुजुर्गों का कहना है कि आधुनिकता की दौड़ में जहां तमाम लोक परंपराओं, विधाओं और संस्कृतियों का लोप हुआ है वहीं पूर्वी भारत का सबसे बड़ा त्योहार होली भी अब सिमटता सा रहा है।
कम्हरिया गांव निवासी रामायण सिंह का कहना है कि बसंत पंचमी के दिन से लगातार 40 दिनों तक लोग ढोल मजीरा की थाप पर पारंपरिक फाग गीत के साथ देर रात तक उत्सव मनाया करते थे। वसंतोत्सव का धुन ऐसा कि क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब एक रंग में रंगने को आतुर रहते थे। अदसड़ निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक त्रिभुवन नारायण सिंह का कहना है कि आधुनिकता की दौड़ में सबसे अधिक नुकसान भारतीय लोक परंपराओं को उठाना पड़ा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण होली का त्योहार है। होली अब महज औपचारिकता के रूप में मनाया जाता है। एक समय था जब होली के हफ्तों बाद बुढ़वा मंगल पर चैता गीत के साथ त्यौहार का समापन माना जाता था। कंजेहरा गांव निवासी श्रीकिशुन यादव का कहना है कि होली के अवसर पर पारंपरिक गीत गाने की प्रथा अब लगभग समाप्त हो रही है। इसकी जगह अब द्विअर्थी और फूहड़ गीतों ने ले लिया है। डेढ़गांवा गांव निवासी रमाशंकर सिंह का कहना है कि एक जमाना था जब होली के माहौल में ऊंच- नीच छोटे-बड़े का भेद मिट जाता था। गांव के चौक के सहन में एक साथ बैठकर झाल मजीरा ढोल के साथ होली गीत का आनंद लिया जाता था। खास बात यह कि गांव की महिलाएं भी प्रेम पूर्वक बैठ कर गीत सुना करती थीं। आज तो होली के नाम पर महिलाओं का घरों से निकलना भी दुरूह हो गया है। युवा पीढ़ी अपनी परम्परा से विमुख होती जा रही है।
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कम्हरिया गांव निवासी रामायण सिंह का कहना है कि बसंत पंचमी के दिन से लगातार 40 दिनों तक लोग ढोल मजीरा की थाप पर पारंपरिक फाग गीत के साथ देर रात तक उत्सव मनाया करते थे। वसंतोत्सव का धुन ऐसा कि क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब एक रंग में रंगने को आतुर रहते थे। अदसड़ निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक त्रिभुवन नारायण सिंह का कहना है कि आधुनिकता की दौड़ में सबसे अधिक नुकसान भारतीय लोक परंपराओं को उठाना पड़ा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण होली का त्योहार है। होली अब महज औपचारिकता के रूप में मनाया जाता है। एक समय था जब होली के हफ्तों बाद बुढ़वा मंगल पर चैता गीत के साथ त्यौहार का समापन माना जाता था। कंजेहरा गांव निवासी श्रीकिशुन यादव का कहना है कि होली के अवसर पर पारंपरिक गीत गाने की प्रथा अब लगभग समाप्त हो रही है। इसकी जगह अब द्विअर्थी और फूहड़ गीतों ने ले लिया है। डेढ़गांवा गांव निवासी रमाशंकर सिंह का कहना है कि एक जमाना था जब होली के माहौल में ऊंच- नीच छोटे-बड़े का भेद मिट जाता था। गांव के चौक के सहन में एक साथ बैठकर झाल मजीरा ढोल के साथ होली गीत का आनंद लिया जाता था। खास बात यह कि गांव की महिलाएं भी प्रेम पूर्वक बैठ कर गीत सुना करती थीं। आज तो होली के नाम पर महिलाओं का घरों से निकलना भी दुरूह हो गया है। युवा पीढ़ी अपनी परम्परा से विमुख होती जा रही है।
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