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ऐसे कैसे बचेगा पर्यावरण, कम होती जा रही हरियाली

Sun, 05 Jun 2016 01:03 AM IST
ब्यूरो/ अमरउजाला, चंदौली
ब्यूरो/ अमरउजाला, चंदौली Updated Sun, 05 Jun 2016 01:03 AM IST
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how can we serve environment in this way
अलीनगर से पर्यावरण रैली को हरी झंडी दिखाकर रवाना करते समाजसेवी महेश जायसवाल। अमर उजाला
सरकारी, गैर सरकारी और सामाजिक संगठनों की अपील तथा कोशिश के बावजूद जनपद की हरियाली साल दर साल घट रही है। काशी वन्य जीव प्रभाग के वन क्षेत्र में सघन वनों का रकबा घट रहा है। बांधों के कारण मैदानी क्षेत्रों में बहने वाली नदियां सूख गई है। भूगर्भीय जल के कृषि उपयोग से पानी का संकट गहराता जा रहा है। अवैध खनन से पहाड़ नंगे होते          जा                 रहे हैं। 
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जनपद के पर्यावरण का सबसे सुदृढ़ केंद्र काशी वन्य जीव प्रभाग के 76 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला वन क्षेत्र है। पिछले तीन दशकों से इस वन क्षेत्र से वन संपदा के अवैध दोहन का सिलसिला थामे नहीं थम रहा है। इमारती लकड़ियों की तस्करी के साथ ही प्रतिदिन दर्जनों ट्रक जलावन के लिए काटी जाने वाली लकड़ियों के चलते वन क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। हालत यह है कि संपूर्ण वन क्षेत्र का 33 प्रतिशत क्षेत्र वर्ष 1980 में सघन वन क्षेत्र था जो अब घटकर बीस प्रतिशत से भी नीचे आ गया है। फारेस्ट सर्वे आफ इंडिया द्वारा किए गए सेटेलाइट मैपिंग में वर्ष 2008 में यह तथ्य उजागर हुआ।  वन क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण का सिलसिला भी कम नहीं हो रहा है। पहाड़ों पर भी लगातार हथौड़े चल रहे हैं। 
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वन क्षेत्र सिकुड़ने की वजह से मानसून भी साथ छोड़ रही है। मूसाखांड, नौगढ़, चंद्रप्रभा जैसे जलाशय सूख चुके हैं तथा कर्मनाशा, चंद्रप्रभा, मरूई नदिया बेपानी हो चुकी है। कृषि में भूगर्भजल के उपयोग से भूगर्भ जलस्तर में गिरावट आयी है। वनों में पानी व आहार की कमी से वन्य प्राणी और मानव के बीच संघर्ष भी शुरू हो गया है। इस विषम स्थिति से निपटने के नाम पर सिर्फ गोष्ठियां, सेमिनार हो रही है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद परशुराम सिंहकहते हैं कि जल, जंगल जमीन को बचाने के लिए सभी को प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के संस्कार बच्चों में डालने पर   जोर दिया।  
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