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Chandauli News: किले संग मिट्टी में दफन हो रहा चंद्रकांता का रहस्य

Sun, 24 Sep 2023 12:35 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 24 Sep 2023 12:35 AM IST
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Chandrakanta's secret being buried in the soil along with the fort
पीडीडीयू नगर। अय्यारों की साजिशों, तिलस्मी अजूबों और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा नौगढ़ का किला अब मिट्टी में दफन हो रहा है और उसके साथ ही दफन हो रही है राजकुमारी चंद्रकांता की अमर प्रेम कहानी और उसका रहस्य। कभी हाथी,घोड़े और सैनिकों से गुलजार रहने वाला यह किला आज समय की मार से उजाड़ पड़ा हुआ है। किले की सुंदर प्राचीर और अद्भुत कलाकृतियां धरती की कोख में समा गई हैं,छत शेष बची है जिसपर वन विभाग ने गेस्ट हाउस बना दिया है। आम आदमी यहां नहीं जा सकता। विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता और नौगढ़ के राजकुमार वीरेंद्र की प्रेम कहानी आज भी वनांचल के लोगों के जुबानी है। जिसे लोग बड़ी दिलचस्पी से कहते और सुनते हैं। अगर पहल किया जाय तो यह किला पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है। जिससे रोजगार के बड़े अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
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गेरुवतवा पर्वत के दक्षिण-पूर्व में स्थित नौगढ़ किले के उत्तर-पूर्वी भाग में कर्मनाशा नदी बहती है। किला भट्टियों के अवशेषों के साथ-साथ धातु और खनिज कचरे से भरा हुआ है। इसे चंद्रकांता कोठी के नाम भी जाना जाता है। किले में आज भी वह सुरंग साफ देखी जा सकती है जो लोगों के अनुसार विजयगढ़ जाती थी। विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता और नौगढ़ के राजकुमार वीरेंद्र सिंह की अमर प्रेम कहानी का गवाह यह किला चंद्रकांता से जुड़ी किंवदंतियों के लिए प्रसिद्ध है। लगभग 3000 वर्ष पूर्व के अवशेष इस स्थल के प्राचीन इतिहास की गवाही देते हैं। जिसमें एकाध आज भी वन विभाग के गेस्ट हाउस के बाहर लगे हैं।
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चंद्रकांता तत्कालीन मिर्जापुर (अब सोनभद्र) के विजयगढ़ के महाराजा जय सिंह और रानी रत्नगर्भा की एकलौती पुत्री थीं। जबकि राजकुमार वीरेंद्र सिंह तत्कालीन वाराणसी जनपद (अब चन्दौली) के नौगढ़ राज्य के अधिपति सुरेंद्र सिंह के पुत्र थे। बचपन से ही चंद्रकांता और वीरेंद्र सिंह के बीच प्रेम की कोपलें फूटी थी। जो समय बीतने के साथ-साथ परवान चढ़ती गई लेकिन दोनों के प्रेम कहानी के बीच तमाम तरह के अवरोध थे। विजयगढ़ के महराजा जय सिंह अपने वीरेंद्र सिंह को अपने पुत्र शक्ति सिंह का हत्यारा मानते थे। इसको लेकर ही कई युद्ध हुए, चंद्रकांता और वीरेंद्र सिंह का मिलन हुआ या नहीं यह कोई नहीं जानता। आज नौगढ़ का ऐतिहासिक किला मिट्टी में दफन हो रहा है। वन विभाग ने इसके छत पर गेस्ट हाउस बनाकर इसका नाम चंद्रकांता वन विश्राम गृह रखा है। जहां वीआईपी आकर विश्राम करते हैं, आम आदमी के लिए यह बंद रहता है।
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इनसेट---
चंद्रकांता के लिए लगती थी लाइन, उर्दू के लोगों ने सीखी हिंदी
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यूं तो चंद्रकांता की प्रेम कहानी वनांचल के बच्चे-बच्चे की जुबानी थी लेकिन इसे अपने शब्दों से जीवंत किया वरिष्ठ साहित्यकार देवकीनंदन खत्री ने। देवकीनन्दन खत्री का काशी नरेश ईश्वरीप्रसाद नारायण सिंह से अच्छा संबंध था। उन्होंने चकिया और नौगढ़ के जंगलों के ठेके लिये। इस दौरान वे नौगढ़ के बीहड़ जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों की खाक छानते रहते थे। जब उनसे जंगलों के ठेके छिन गये तब इन्हीं जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों के खंडहरों की पृष्ठभूमि में थोड़ी कल्पनाओं को मिश्रित कर उन्होंने चन्द्रकान्ता उपन्यास की रचना की। उस जमाने में अधिकतर लोग उर्दू भाषा-भाषी ही थे। चन्द्रकान्ता उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ लोगों ने केवल इस उपन्यास को पढ़ने के लिए हिंदी सीखी। इसी लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए दूसरा उपन्यास चन्द्रकान्ता सन्तति लिखा जो चन्द्रकान्ता की अपेक्षा कई गुणा रोचक था। इन उपन्यासों को पढ़ते वक्त लोग खाना-पीना भी भूल जाते थे। इसका प्रकाशन सन 1888 में वाराणसी के लहरी प्रेस से हुआ था। इसे खरीदने के लिए प्रेस के बाहर लोगों की लाइन लगती थी। इसी कहानी पर नीरजा गुलेरी ने टीवी धारावाहिक चंद्रकांता बनाई जो भारतीय टेलीविजन के इतिहास में सबसे बड़े ब्लॉकबस्टर में से एक बन गया।
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कोट---
चंद्रकांता की कहानी भले पुरानी हो पर आज भी लोग इसे बड़ी दिलचस्पी से सुनते हैं। सरकार लगातार ऐसे ऐतिहासिक स्थलों को विकसित कर पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। पर नौगढ़ के किले पर किसी की नजर नहीं है, अगर इस किले को भी पर्यटकों के लिए खोल दिया जाए तो पर्यटन के साथ ही रोजगार बढ़ेगा। चंद्रकांता की कहानी ऐसी है कि लोग खींचे चले आएंगे।-डॉ.केशरी नारायण त्रिपाठी, वरिष्ठ साहित्यकार,चंदौली

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महराजा बनारस स्टेट की यह आखिरी सीमा थी। जहां राजपरिवार आखेट के लिए आया करता था। इसके बाद महराजा ने ही इसे वन विभाग को संरक्षण के लिए सौंपा था। जिसके बाद जर्जर किले को संरक्षित करने के लिए ही उसकी छत पर गेस्ट हाउस बनाया गया है। जहां हमेशा सुरक्षा गार्ड आदि रहते हैं। इस गेस्ट हाउस का नाम चंद्रकांता वन विश्राम गृह रखा गया है। किला नीचे दब चुका है लेकिन इसे बाहर से देखने के लिए भी काफी लोग आते हैं।-पीके सिंह,वन क्षेत्राधिकारी, नौगढ़
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