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भटक रहे अशोक चक्र विजेता के परिवार वाले
चंदौली अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 30 Sep 2015 01:10 AM IST
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गोवा की आजादी में जान की बाजी लगाने के लिए अशोक चक्र पाने वाले नौ सेना
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के जवान स्वर्गीय बेचन सिंह मौर्य के बेटे और बहू परेशान हैं।
न तो गांव में शहीद की प्रतिमा स्थापित हो सकी और न ही परिवार के सदस्यों को आर्थिक सहायता ही मिली।
बरहनी विकास खंड अंतर्गत भतीजा गांव निवासी बेचन सिंह मौर्य नौ सेना में थे।
इनके साथ गांव के ही राम व्यास तिवारी भी सेना में शामिल रहे। वर्ष 1961 में पुर्तगालियों के कब्जे से गोवा को आजाद कराने के लिए सेना ने कार्रवाई की।
नौ सेना ने किले को घेर लिया। इसके बाद सेना की ओर से बेचन सिंह मौर्य और रामव्यास तिवारी किला पर भारतीय तिरंगा लहराने के लिए आगे बढ़े। इसी बीच दुश्मन खेमा से हैंड ग्रेनेड फेंका गया, जो बेचन सिंह मौर्य के सीने पर लगी और वहीं वे ढेर हो गए।
बेचन के अदम्य साहस और वीरता का सम्मान करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। इस दौरान यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने भतीजा रोड का नाम स्वर्गीय बेचन सिंह मौर्य स्मृति रोड रखने की घोषणा की थी।
बेचन सिंह की मौत के बाद एक मात्र एक वर्षीय बेटे धर्मदेव को पालने की जिम्मेदारी बेचन सिंह की पत्नी कलावती देवी पर आ गई। पेंशन के सहारे धर्मदेव का लालन पालन हुआ और घर खर्च चलता रहा। सरकारी उपेक्षा की वजह से भतीजा रोड का नाम नहीं बदला जा सका। धर्मदेव को नौकरी नहीं मिली।
गांव में बेचन सिंह की प्रतिमा भी स्थापित नहीं हो सकी। कलावती की वर्ष 2001 में मौत के बाद घर में मिलने वाली पेंशन बंद हो गई और धर्मदेव के सामने भुखमरी की स्थिति आ गई।
आज धर्मदेव अपनी पत्नी, चार पुत्री और दो पुत्रों का परिवार ढाई बीघा खेती के सहारे चला रहा है। इस संबंध में धर्मदेव ने बताया कि कई बार गांव में मूर्ति स्थापित करने के लिए सरकार से गुहार लगाई लेकिन सहायता नहीं मिली।
न तो गांव में शहीद की प्रतिमा स्थापित हो सकी और न ही परिवार के सदस्यों को आर्थिक सहायता ही मिली।
बरहनी विकास खंड अंतर्गत भतीजा गांव निवासी बेचन सिंह मौर्य नौ सेना में थे।
इनके साथ गांव के ही राम व्यास तिवारी भी सेना में शामिल रहे। वर्ष 1961 में पुर्तगालियों के कब्जे से गोवा को आजाद कराने के लिए सेना ने कार्रवाई की।
नौ सेना ने किले को घेर लिया। इसके बाद सेना की ओर से बेचन सिंह मौर्य और रामव्यास तिवारी किला पर भारतीय तिरंगा लहराने के लिए आगे बढ़े। इसी बीच दुश्मन खेमा से हैंड ग्रेनेड फेंका गया, जो बेचन सिंह मौर्य के सीने पर लगी और वहीं वे ढेर हो गए।
बेचन के अदम्य साहस और वीरता का सम्मान करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। इस दौरान यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने भतीजा रोड का नाम स्वर्गीय बेचन सिंह मौर्य स्मृति रोड रखने की घोषणा की थी।
बेचन सिंह की मौत के बाद एक मात्र एक वर्षीय बेटे धर्मदेव को पालने की जिम्मेदारी बेचन सिंह की पत्नी कलावती देवी पर आ गई। पेंशन के सहारे धर्मदेव का लालन पालन हुआ और घर खर्च चलता रहा। सरकारी उपेक्षा की वजह से भतीजा रोड का नाम नहीं बदला जा सका। धर्मदेव को नौकरी नहीं मिली।
गांव में बेचन सिंह की प्रतिमा भी स्थापित नहीं हो सकी। कलावती की वर्ष 2001 में मौत के बाद घर में मिलने वाली पेंशन बंद हो गई और धर्मदेव के सामने भुखमरी की स्थिति आ गई।
आज धर्मदेव अपनी पत्नी, चार पुत्री और दो पुत्रों का परिवार ढाई बीघा खेती के सहारे चला रहा है। इस संबंध में धर्मदेव ने बताया कि कई बार गांव में मूर्ति स्थापित करने के लिए सरकार से गुहार लगाई लेकिन सहायता नहीं मिली।