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प्रतिवर्ष विश्व में टीबी से सात मीलियन लोगों की होती है मौत
Updated Sat, 24 Mar 2018 11:48 PM IST
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मुगलसराय। टीबी पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इस रोग की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रति वर्ष सात मिलियन लोग इसकी चपेट में आकर मरते हैं। पूरे विश्व में नौवां ऐसा रोग है, जिससे सबसे अधिक लोग इसकी चपेट में आते हैं। कहा कि जागरूक होने और नियमित इलाज से इसके प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है। ये बातें विश्व टीबी दिवस पर पूर्व मध्य रेलवे मंडल चिकित्सालय सभागार में आयोजित गोष्ठी में वरिष्ठ चिकित्सक डॉ.आरके मिश्र ने कही।
उन्होंने कहा कि डाट्स से इसका इलाज पूरी तरह संभव है। जरूरत है तो सिर्फ नियमित जांच के बाद उचित इलाज कराने की। कहा कि पूरे देश में डाट्स केंद्रों पर जांच और इलाज पूरी तरह मुफ्त है। बताया कि दो हफ्ते से अधिक किसी को खांसी आ रही हो तो तुरंत उसकी जांच की जानी चाहिए। यह जांच आम तौर पर सभी डाट्स केंद्रों पर मुफ्त में उपलब्ध है। इसी तरह वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सीएस झा ने कहा कि इस टीबी एक विशेष प्रकार के जीवाणु से होता है। यह ज्यादातर फेपड़ों पर असर करता है। यह किसी उम्र के लोगों को हो सकती है। क्षय रोग का संक्रमण पीड़ित व्यक्ति के थूक में होता है। जब वह कहीं खांसता है अथवा थूकता है तो हवा के जरिए जीवाणु आस पास में फैल जाते हैं। 24 मार्च को 1882 को डॉ. राबर्ट कोच ने टीबी के जीवाणु की खोज की थी। इसी वजह से आज के दिन वर्ल्ड टीबी डे मनाते हैं। कहा कि वर्ष 1998 में नए डाट्स से इलाज शुरू किया गया है। इसके तहत पूरे देश में एक ही दवा रोगियों को लक्षण के आधार पर दी जाती है। इस मौके पर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वीके दुबे, डॉ. संजय आर्या, डॉ. स्वीटी रहे।
उन्होंने कहा कि डाट्स से इसका इलाज पूरी तरह संभव है। जरूरत है तो सिर्फ नियमित जांच के बाद उचित इलाज कराने की। कहा कि पूरे देश में डाट्स केंद्रों पर जांच और इलाज पूरी तरह मुफ्त है। बताया कि दो हफ्ते से अधिक किसी को खांसी आ रही हो तो तुरंत उसकी जांच की जानी चाहिए। यह जांच आम तौर पर सभी डाट्स केंद्रों पर मुफ्त में उपलब्ध है। इसी तरह वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सीएस झा ने कहा कि इस टीबी एक विशेष प्रकार के जीवाणु से होता है। यह ज्यादातर फेपड़ों पर असर करता है। यह किसी उम्र के लोगों को हो सकती है। क्षय रोग का संक्रमण पीड़ित व्यक्ति के थूक में होता है। जब वह कहीं खांसता है अथवा थूकता है तो हवा के जरिए जीवाणु आस पास में फैल जाते हैं। 24 मार्च को 1882 को डॉ. राबर्ट कोच ने टीबी के जीवाणु की खोज की थी। इसी वजह से आज के दिन वर्ल्ड टीबी डे मनाते हैं। कहा कि वर्ष 1998 में नए डाट्स से इलाज शुरू किया गया है। इसके तहत पूरे देश में एक ही दवा रोगियों को लक्षण के आधार पर दी जाती है। इस मौके पर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वीके दुबे, डॉ. संजय आर्या, डॉ. स्वीटी रहे।
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